मुख्यपृष्ठसमाचाररुख-ए-सियासत: धरना किसका, लोकतंत्र किसका?

रुख-ए-सियासत: धरना किसका, लोकतंत्र किसका?

तौसीफ कुरैशी

वह सड़क पर खड़ा होकर सत्ता से जवाब मांग सकता है। वह कह सकता है कि जनादेश तुम्हें शासन का अधिकार देता है, जनता को चुप कराने का नहीं। इसलिए लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद में कम और सड़क पर ज्यादा होती है। दिल्ली में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का प्रदर्शन था।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह नहीं है कि पांच साल में एक बार वोट डाल दिया जाए। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वोट देने के बाद भी नागरिक सवाल पूछ सकता है। वह सड़क पर खड़ा होकर सत्ता से जवाब मांग सकता है। वह कह सकता है कि जनादेश तुम्हें शासन का अधिकार देता है, जनता को चुप कराने का नहीं। इसलिए लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद में कम और सड़क पर ज्यादा होती है। दिल्ली में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का प्रदर्शन था। उससे पहले दावे बड़े-बड़े थे। कहा गया कि व्यवस्था के खिलाफ जनसैलाब उमड़ेगा। कहा गया कि देश का दबा हुआ गुस्सा राजधानी की सड़कों पर दिखाई देगा। कुछ लोगों ने इसे नई राजनीति का जन्म बताया। कुछ ने इसे पुराने राजनीतिक प्रयोग का नया संस्करण कहा। लेकिन जब दिन आया तो तस्वीर वैसी नहीं थी, जैसी बनाई गई थी। चार-पांच हजार लोगों की भीड़ जुटी। कार्यक्रम हुआ। भाषण हुए। नारे लगे। फिर लोग अपने-अपने घर लौट गए। लोकतंत्र में ऐसा होना कोई असामान्य बात नहीं है। हर आंदोलन सफल नहीं होता और हर दावा सच साबित नहीं होता। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असल कहानी वहां से शुरू होती है, जहां सवाल उठते हैं। यह वही दिल्ली है जहां किसानों के आंदोलन के समय सड़कों पर कीलें गाड़ी गई थीं। यह वही दिल्ली है, जहां पहलवान बेटियां न्याय मांगते हुए धरने पर बैठी थीं। यह वही दिल्ली है, जहां कई बार विपक्षी नेताओं को रास्ते में रोक लिया गया, हिरासत में ले लिया गया या किसी इलाके में घुसने तक नहीं दिया गया। तब प्रशासन ने कहा था कि कानून-व्यवस्था का प्रश्न है। सुरक्षा का प्रश्न है। भीड़ नियंत्रण का प्रश्न है। इस बार न कीलें दिखीं, न वैसी बैरिकेडिंग दिखी, न वैसी बेचैनी दिखाई दी विवेकानंद फाउंडेशन से तार जुड़े होने के आरोप लग रहे हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या हर आंदोलन के लिए नियम एक जैसे हैं? क्या हर विरोध प्रदर्शन को एक ही नजर से देखा जाता है? या फिर विरोध की स्वतंत्रता का मूल्य इस बात से तय होता है कि विरोध किसके खिलाफ है और किसके लिए सुविधाजनक है? लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं होता। बल्कि सवाल न पूछना लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है। राजनीतिक गलियारों में पहले से चर्चा थी कि यह कहीं अन्ना आंदोलन की तरह किसी नए राजनीतिक प्रयोग की भूमिका तो नहीं है। इतिहास इसलिए याद रखा जाता है ताकि वर्तमान को समझा जा सके। अन्ना आंदोलन को याद कीजिए देश के लाखों युवाओं को बताया गया था कि राजनीति गंदी है और कुछ ईमानदार लोग आकर इसे साफ कर देंगे। भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा। व्यवस्था बदल जाएगी। नया भारत बनेगा। लेकिन पंद्रह साल बाद पीछे मुड़कर देखिए। क्या भ्रष्टाचार समाप्त हो गया? क्या राजनीति अचानक नैतिक हो गई? क्या सत्ता का चरित्र बदल गया? या सिर्फ चेहरे बदले? जो युवा उस समय रामलीला मैदान और जंतर-मंतर में खड़े थे, उनमें से बहुत से आज भी यह सवाल पूछते हैं कि उनके उत्साह और आदर्शवाद का इस्तेमाल आखिर किसके लिए हुआ था। जनता मूर्ख नहीं होती। वह देर से समझती है, लेकिन समझती जरूर है। शायद यही कारण है कि इस बार वैसी भीड़ नहीं आई। शायद लोगों ने नारे से पहले नारे के पीछे खड़े लोगों को देखना शुरू कर दिया है। शायद वे जानना चाहते हैं कि आंदोलन किसके लिए है, किसके खिलाफ है और अंतत: उसका राजनीतिक लाभ किसे मिलने वाला है। यह भी संभव है कि जनता थकी हुई हो। यह भी संभव है कि लोगों को भरोसा न रहा हो। और यह भी संभव है कि आंदोलन की जमीन उतनी मजबूत न हो जितनी मंच से दिखाई जा रही थी। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल वही है जो शुरुआत में था। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सबके लिए बराबर है या नहीं? क्योंकि अगर कानून की किताब एक है लेकिन उसका इस्तेमाल अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग तरीके से होता है तो समस्या सिर्फ किसी एक संगठन की नहीं रह जाती। तब सवाल लोकतंत्र की आत्मा तक पहुंच जाता है। किसी संगठन को ‘बी टीम’ कहना आसान है। किसी आंदोलन को प्रायोजित बताना भी आसान है। लेकिन लोकतंत्र आरोपों से नहीं चलता। लोकतंत्र तथ्यों से चलता है। किसी भी संगठन की असली पहचान उसके नारों से नहीं बनती। उसकी पहचान उसके धन के स्रोतों, उसके नेतृत्व, उसके राजनीतिक व्यवहार और कठिन समय में उसके द्वारा लिए गए निर्णयों से बनती है। कॉकरोच का प्रदर्शन अपेक्षित भीड़ नहीं जुटा पाया। लेकिन उसने एक बार फिर यह अवसर दिया है कि हम लोकतंत्र के आईने में खुद को देखें। क्योंकि लोकतंत्र की ताकत सत्ता की ऊंचाई से नहीं मापी जाती। लोकतंत्र की ताकत इस बात से मापी जाती है कि विरोध की आवाज कितनी स्वतंत्र है, सवाल पूछने वाला कितना सुरक्षित है और सत्ता आलोचना को कितना सहन कर सकती है। आखिर लोकतंत्र का अर्थ यही तो है कि सड़क पर खड़ा नागरिक भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जितना सत्ता के गलियारों में बैठा शासक। बाकी, भीड़ का आकार इतिहास तय नहीं करता। इतिहास यह तय करता है कि सच किसके साथ था। और लोकतंत्र में अंतत: वही टिकता है जिसके साथ सच खड़ा हो। सत्यमेव जयते।

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