मुख्यपृष्ठस्तंभमहाराष्ट्रनामा: ‘जो मर गया, उसे भी चैन नहीं!'

महाराष्ट्रनामा: ‘जो मर गया, उसे भी चैन नहीं!’

राजन पारकर

अजितदादा को गए महीनों बीत गए, लेकिन राजनीति की दुकान में उनकी स्मृतियां अभी भी ‘हॉट सेलिंग प्रोडक्ट’ बनी हुई हैं। कुछ नेताओं को लगता है कि यदि जीवित नेता से लाभ न मिले तो मृत नेता पर बयान देकर ही सुर्खियां बटोर ली जाएं। बारामती के एक नगरसेवक महाशय ने तो संवेदनहीनता का ऐसा प्रदर्शन किया कि पार्टी को उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा। राजनीति में विचारों की गरीबी जब चरम पर पहुंचती है, तब शब्दों की गुंडागर्दी शुरू होती है। मृत व्यक्ति पर टिप्पणी करके वीरता दिखाने वाले ऐसे लोग उस छात्र जैसे होते हैं जो परीक्षा खत्म होने के बाद उत्तर पुस्तिका पर बहादुरी दिखाता है। पार्टी ने हकालपट्टी की, यह अच्छी बात है; लेकिन सवाल यह है कि ऐसे ‘राजनीतिक रत्न’ पैदा कहां होते हैं और वर्षों तक पनपते कैसे हैं?
‘मलेशिया से पाकिस्तान तक आरोपों का इंटरनेशनल एक्सप्रेस!’
नासिक का एक प्रकरण सामने आया नहीं कि कुछ नेताओं ने सीधे मलेशिया, पाकिस्तान, अंतर्राष्ट्रीय साजिश, फंडिंग, नेटवर्क, रैकेट और न जाने कितने देशों की टिकट एक साथ कटवा दी। आरोपों की यह रॉकेट सेवा इतनी तेज है कि जांच एजेंसियां अभी स्टेशन पर ही खड़ी हैं और नेता सीधे अंतरिक्ष में पहुंच चुके हैं। यदि हर आरोप ही सत्य होता, तो भारत में अदालतों की जरूरत ही नहीं रहती। प्रेस कॉन्फ्रेंस ही सर्वोच्च न्यायालय बन जाती। आजकल राजनीति में प्रमाण बाद में आते हैं, सनसनी पहले आती है। जनता को भी अब समझना चाहिए कि हर दिन किसी नए ‘इंटरनेशनल षड्यंत्र’ का उद्घाटन करने वाले नेता अक्सर अगले दिन किसी दूसरे षड्यंत्र की तलाश में निकल पड़ते हैं।
‘एक निर्दलीय के लिए इतना प्रेम, तो अपने नगरसेवकों पर अविश्वास कितना?’
नासिक की राजनीति का दृश्य बड़ा मनोरंजक है। आधिकारिक उम्मीदवार मौजूद है, सैकड़ों कार्यकर्ता मौजूद हैं, दर्जनों नगरसेवक मौजूद हैं, लेकिन पूरा सत्ता तंत्र एक निर्दलीय उम्मीदवार के पीछे ऐसे दौड़ रहा है जैसे बरसों बाद खोया हुआ रिश्तेदार मिल गया हो। मंत्रियों की बैठकें, समझाइश, मनुहार, दोस्ती, विनती और संयम के प्रवचन—सब कुछ जारी है। जनता पूछ रही है कि यदि अपने ही जनप्रतिनिधियों पर भरोसा होता तो इतनी भागदौड़ की जरूरत पड़ती क्या? राजनीति में जब संख्या कम पड़ती है, तब सिद्धांतों की जगह मित्रता, आग्रह और ‘विशेष संवाद’ का महत्व अचानक बढ़ जाता है। यह दृश्य वैसा ही है जैसे कोई कप्तान अपनी पूरी टीम पर भरोसा छोड़कर मैच जीतने के लिए दर्शक दीर्घा में बैठे व्यक्ति को मैदान में उतारने की कोशिश करे। एक तरफ मृत नेताओं के नाम पर बयानबाजी, दूसरी तरफ हर घटना में अंतर्राष्ट्रीय साजिश खोजने की प्रतियोगिता, और तीसरी तरफ अपने ही सहयोगियों को मनाने के लिए सत्ता के दिग्गजों की परिक्रमा। जनता महंगाई, बेरोजगारी और विकास के प्रश्न पूछ रही है, जबकि नेता राजनीतिक रंगमंच पर नए-नए किरदार निभाने में व्यस्त हैं। ‘यह लोकतंत्र कम और नाटक मंडली अधिक दिखाई देती है; फर्क सिर्फ इतना है कि यहां टिकट जनता खरीदती है और मनोरंजन नेताओं को मिलता है!’

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