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महाराष्ट्रनामा: देश चल रहा है या तमाशा?

राजन पारकर

ब्रेक, बवंडर और बम-जनता के हिस्से में सिर्फ डर!
आज का भारत अजीब मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ बसें ब्रेक के भरोसे नहीं, बल्कि ड्राइवर की घबराहट के भरोसे दौड़ रही हैं। दूसरी तरफ मौसम विभाग आसमान से सौ किलोमीटर की रफ्तार से आफत उतरने की चेतावनी दे रहा है। और तीसरी तरफ ई-मेल के सहारे बम धमाकों की धमकियां देकर कुछ सिरफिरे पूरे प्रशासन को नचा रहे हैं। जनता पूछ रही है, आखिर इस देश में सुरक्षित क्या है? सड़क, मौसम या शासन?
ब्रेक फेल नहीं, समझ फेल!
दादर की बेस्ट बस दुर्घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मशीनों से ज्यादा खतरनाक इंसानी लापरवाही होती है। ड्राइवर ने कहा- ‘ब्रेक फेल थे।’ आरटीओ ने कहा– ‘ब्रेक बिल्कुल ठीक थे।’ अब सवाल यह है कि अगर ब्रेक ठीक थे तो फिर किसका दिमाग फेल हुआ था? तकनीक को दोष देना आसान है। मशीनें जवाब नहीं देतीं। लेकिन जब जांच ने बता दिया कि बस के ब्रेक पूरी तरह कार्यरत थे, तब यह दुर्घटना केवल हादसा नहीं रह जाती, बल्कि प्रशिक्षण, जिम्मेदारी और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिन्ह बन जाती है। आज अगर एक्सीलरेटर और ब्रेक में फर्क समझने की नौबत जांच एजेंसियों को बतानी पड़े, तो फिर करोड़ों रुपए की आधुनिक बसें खरीदने का क्या फायदा? बस इलेक्ट्रिक हो गई, लेकिन व्यवस्था की सोच अब भी बैलगाड़ी युग में अटकी हुई दिखाई देती है।
आसमान से आफत का अल्टीमेटम
उधर मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि अगले कुछ घंटों में ६० से १०० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तूफानी हवाएं चल सकती हैं। यह प्रकृति का नोटिस है। लेकिन विडंबना देखिए, हमारे यहां मौसम की चेतावनी से ज्यादा राजनीतिक बयान तेजी से उड़ते हैं। सड़कें पहली बारिश में डूब जाती हैं, पेड़ गिर जाते हैं, बिजली गायब हो जाती है और प्रशासन हर साल ऐसे चौंकता है जैसे मानसून पहली बार भारत आया हो। हर वर्ष वही कहानी.. बादल आते हैं, नाले भरते हैं, सिस्टम बह जाता है, और फिर समीक्षा बैठकों का मौसम शुरू हो जाता है। लगता है कि तूफान प्रकृति नहीं लाती, बल्कि हमारी तैयारी की पोल खोलने आता है।
बम की धमकी और सुरक्षा का नाटक
पुणे महानगरपालिका, विधान भवन और आरएसएस मुख्यालय को बम से उड़ाने की धमकी मिली। तुरंत पुलिस दौड़ी… श्वान पथक दौड़ा… बॉम्ब स्क्वॉड दौड़ा… अधिकारी दौड़े… सिर्फ अपराधी नहीं दौड़ा। यह डिजिटल युग का नया आतंक है। कोई कहीं बैठकर एक ई-मेल भेजता है और पूरा सरकारी तंत्र अलर्ट मोड में आ जाता है। सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सवाल यह भी है कि ऐसे तत्व बार-बार व्यवस्था की नाक में दम वैâसे कर देते हैं? अगर धमकी झूठी निकले तो यह प्रशासन की ऊर्जा की बर्बादी है। अगर सच्ची निकले तो यह सुरक्षा व्यवस्था की असफलता है। दोनों ही स्थितियों में जनता का विश्वास घायल होता है।
जनता का निष्कर्ष
एक तरफ सड़क पर ब्रेक का भरोसा नहीं। दूसरी तरफ मौसम का भरोसा नहीं। तीसरी तरफ सुरक्षा का भरोसा नहीं। और ऊपर से नेता दावा करते हैं कि सब कुछ नियंत्रण में है। जनता कहती है – साहब, अगर यही नियंत्रण है तो फिर अव्यवस्था किसे कहते हैं? देश को भाषणों से नहीं, जवाबदेही से चलाना होगा। वरना एक दिन इतिहास लिखेगा कि इस दौर में समस्याएं कम नहीं थीं, लेकिन उन्हें स्वीकार करने का साहस उससे भी कम था।

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