सना खान
देश में शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना था, लेकिन आज कई जगह यह एक ‘बाजार’ में बदलती नजर आ रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा चिन्हित लगभग ३२ फर्जी विश्वविद्यालय इस संकट की गंभीरता को उजागर करते हैं। ऐसी संस्थाएं जो बिना मान्यता के डिग्री देने का दावा करती हैं, लेकिन जिनका कोई वास्तविक मूल्य नहीं होता। यह समस्या सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा चिंताजनक है।
सपनों का सौदा
मीरा रोड की २२ वर्षीय छात्रा ने सोशल मीडिया के विज्ञापन देखकर ऑनलाइन मैनेजमेंट कोर्स में दाखिला लिया। ‘१०० प्रतिशत प्लेसमेंट’ और ‘इंटरनेशनल डिग्री’ के वादे पर परिवार ने १.५ लाख रुपए फीस भरी। कोर्स पूरा होने के बाद न नौकरी मिली, न मान्य डिग्री। शिकायत करने पर संस्थान का ऑफिस भी बंद मिला। ऐसी कई घटनाओं में छात्रों की मेहनत और पैसा दोनों दांव पर लग रहे हैं।
सिस्टम की खामियां
समस्या अब फर्जी विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है। कई एडटेक प्लेटफॉर्म और अनधिकृत संस्थान संदिग्ध वैधता वाले कोर्स बेच रहे हैं। आकर्षक विज्ञापनों और प्लेसमेंट के वादों के बावजूद निगरानी कमजोर है। ळउण् की चेतावनियों का भी जमीनी असर सीमित है। जानकारी के अभाव में छात्र मान्यता जांचे बिना दाखिला ले लेते हैं। सख्त निगरानी और कार्रवाई के बिना यह धंधा बढ़ता रहेगा।
भरोसे का संकट
शिक्षा व्यवस्था की नींव भरोसे पर टिकी है। लेकिन फर्जी संस्थानों के बढ़ते जाल से यह भरोसा कमजोर हो रहा है। हर साल चेतावनियां और सूचियां जारी होने के बावजूद हालात नहीं बदलते। साफ है कि समस्या सूचना की नहीं, सख्त कार्रवाई की है।
आगे का रास्ता
सिर्फ जागरूकता नहीं, मजबूत और जवाबदेह व्यवस्था जरूरी है, जिसमें फर्जी संस्थानों पर तुरंत कार्रवाई, एडटेक प्लेटफॉर्म की सख्त जांच और छात्रों को पारदर्शी जानकारी मिले। शिक्षा को बाजार बनने से रोकना होगा, वरना डिग्री के साथ छात्रों का भरोसा भी बिकता रहेगा।
