मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका: बीएसएनएल की कीमती अचल संपत्तियों पर किसकी टेढ़ी नजर?

पॉलिटिका: बीएसएनएल की कीमती अचल संपत्तियों पर किसकी टेढ़ी नजर?

के.पी. मलिक

-बीएसएनएल सीएमडी चयन प्रक्रिया पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) केवल एक सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनी नहीं है, बल्कि देश की डिजिटल संप्रभुता, रणनीतिक संचार और ग्रामीण भारत की कनेक्टिविटी का एक महत्वपूर्ण स्तंभ भी है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने बीएसएनएल के पुनरुद्धार के लिए तीन लाख करोड़ रुपए से अधिक के विभिन्न वित्तीय सहायता पैकेजों और पूंजी निवेश की घोषणा की। उद्देश्य स्पष्ट था कि बीएसएनएल को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना, ४ जी और ५जी सेवाओं में प्रतिस्पर्धी बनाना और निजी कंपनियों के मुकाबले मजबूत विकल्प के रूप में खड़ा करना। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इतने बड़े निवेश के अनुरूप परिणाम सामने आए हैं?
क्या ४ जी रोलआउट अपेक्षित गति से हुआ?
सरकार ने बीएसएनएल को एक लाख से अधिक ४जी साइटों के विस्तार का लक्ष्य दिया था। जानकारी के मुताबिक, लक्ष्य के अनुरूप समयबद्ध रोलआउट नहीं हो पाया और कई स्थानों पर नेटवर्क क्षमता तथा कवरेज भी अपेक्षित स्तर की नहीं है। विशेष रूप से दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में प्रगति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि दावे सच हैं तो यह सिर्फ तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय डिजिटल नीति का भी विषय है। दूसरी ओर, यदि प्रबंधन के पास रोलआउट में देरी के तकनीकी, आपूर्ति शृंखला, स्वदेशी तकनीक या अन्य व्यावहारिक कारण हैं तो उन्हें सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। पारदर्शिता ही ऐसे विवादों का सबसे प्रभावी उत्तर है।
सीएमडी चयन प्रक्रिया पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
बीएसएनएल के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल सामने आए हैं। सूत्र बताते हैं कि पहले की चयन प्रक्रिया में किसी उम्मीदवार को उपयुक्त नहीं माना गया, उसके बाद पात्रता मानदंडों और चयन प्रक्रिया में बदलाव हुए। अक्टूबर २०२४ में बीएसएनएल के सीएमडी पद के लिए पीईएसबी के माध्यम से मानक पात्रता मानदंडों के अनुसार, भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई। बड़ी संख्या में उम्मीदवारों ने आवेदन किया और १२ उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया।
जानकारी के मुताबिक, रॉबर्ट जे. रवि उस समय संयुक्त सचिव (ज्वाइंट सेक्रेटरी) स्तर के अधिकारी होने के कारण शॉर्टलिस्ट नहीं हो सके, क्योंकि सीएमडी पद के लिए अतिरिक्त सचिव (एडिशनल सेक्रेटरी) स्तर की पात्रता आवश्यक थी। २७ मार्च २०२५ को हुए साक्षात्कार में सभी १२ उम्मीदवारों को ‘कोई भी उपयुक्त नहीं पाया गया’ (नो वन फाउंड फिट) बताते हुए अस्वीकार कर दिया गया। पैनल में योग्य उम्मीदवार होने के बावजूद उन्हें इसलिए नहीं चुना गया, क्योंकि मंत्रालय का शीर्ष नेतृत्व किसी विशेष उम्मीदवार को ही इस पद पर देखना चाहता था? सार्वजनिक क्षेत्र के शीर्ष पदों पर नियुक्तियों में सिर्फ निष्पक्षता ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि निष्पक्षता दिखाई भी देनी चाहिए।
क्या लाभ वास्तविक है
या लेखांकन का प्रभाव?
ये भी जानकारी मिली है कि बीएसएनएल के वित्तीय प्रदर्शन को बेहतर दिखाने के लिए कुछ लेखांकन निर्णयों का सहारा लिया गया। इनमें लंबित देनदारियों का समायोजन, कुछ आय मदों का लेखा-उपचार तथा अन्य वित्तीय व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी सार्वजनिक कंपनी के वित्तीय विवरण वैधानिक ऑडिट, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) तथा अन्य नियामकीय प्रक्रियाओं के अधीन होते हैं इसलिए यदि किसी को वित्तीय प्रस्तुतीकरण पर संदेह है तो उसका परीक्षण स्वतंत्र ऑडिट और नियामकीय जांच के माध्यम से होना चाहिए, न कि केवल सार्वजनिक आरोपों के आधार पर।
मानव संसाधन नीति में विरोधाभास?
बीएसएनएल की मानव संसाधन नीति भी बहस का विषय बनी हुई है, जिसमें तकनीकी कार्यों के लिए अनुबंध के आधार पर महाप्रबंधकों (जीएम) की भर्ती को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। एक ओर बीएसएनएल अतिरिक्त कर्मचारी होने का हवाला देकर अपने अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर भेजने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अनुबंध पर नए वरिष्ठ अधिकारियों की भर्ती कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि यह मानव संसाधन नीति में विरोधाभास को दर्शाता है।
यदि वास्तव में विशेष तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत है तो सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह आवश्यकता किन क्षेत्रों में है और आंतरिक क्षमता विकास की योजना क्या है? वर्ष २०२४ में निकाले गए विज्ञापन में बैंकिंग क्षेत्र के उम्मीदवारों के लिए बोर्ड स्तर का अनुभव आवश्यक था, जबकि २०२६ के विज्ञापन में इसे घटाकर बोर्ड से एक स्तर नीचे कर दिया गया। साथ ही बैंकिंग क्षेत्र के उम्मीदवारों के लिए केवल एक वर्ष का अनुभव पर्याप्त रखा गया, जबकि अन्य बाहरी उम्मीदवारों के लिए दो वर्ष का अनुभव आवश्यक था। अधिकतम आयु सीमा भी बढ़ाकर ५९ वर्ष कर दी गई। सवाल है कि यह बदलाव संयोगवश हुआ या किसी विशेष उद्देश्य से?
परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण बनाम नेटवर्क विस्तार
बीएसएनएल के पास देशभर में अत्यंत मूल्यवान भूमि और अचल संपत्तियां हैं। इन परिसंपत्तियों का विवेकपूर्ण मुद्रीकरण किसी भी सार्वजनिक कंपनी की वैध व्यावसायिक रणनीति हो सकता है। लेकिन इसके तरीके और प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं। तर्क है कि बीएसएनएल करीब कर्जमुक्त कंपनी है और वह बाजार से पूंजी जुटाने तथा परिसंपत्तियों के बेहतर उपयोग के माध्यम से नेटवर्क विस्तार कर सकती है। उससे प्राप्त धन आधुनिक नेटवर्क, ५जी, फाइबर और डिजिटल अवसंरचना के विस्तार में लगाया जाता है तो यह दीर्घकालिक निवेश माना जाएगा। लेकिन यदि इसका उपयोग केवल अल्पकालिक वित्तीय प्रदर्शन सुधारने के लिए हो, तो उस पर नीति स्तर पर चर्चा होना स्वाभाविक है।
बीएसएनएल को किस प्रकार का नेतृत्व चाहिए?
आज बीएसएनएल सिर्फ एक प्रशासक नहीं, बल्कि दूरदर्शी व्यावसायिक नेतृत्व की मांग करता है। ऐसा नेतृत्व जो तकनीकी नवाचार, बाजार आधारित वित्तपोषण, ग्राहक सेवा, निर्णय लेने की गति और कर्मचारियों के मनोबल इन सभी क्षेत्रों में समान रूप से मजबूत हो। देश में निजी दूरसंचार कंपनियां लगातार नेटवर्क विस्तार, नई तकनीकों और ग्राहक अनुभव में निवेश कर रही हैं। ऐसे में बीएसएनएल के लिए निर्णयों में देरी, अस्पष्ट रणनीति या नेतृत्व संबंधी अनिश्चितता प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान का कारण बन सकती है।
दरअसल, बीएसएनएल का भविष्य सिर्फ सरकारी सहायता पर निर्भर नहीं रह सकता। उसे एक स्पष्ट व्यावसायिक रणनीति, पारदर्शी नेतृत्व, समयबद्ध तकनीकी विस्तार और पेशेवर प्रबंधन की आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि वह बीएसएनएल के पुनरुद्धार की वर्तमान स्थिति पर एक विस्तृत श्वेत पत्र जारी करे, जिसमें ४जी रोलआउट, ५जी रोडमैप, वित्तीय स्थिति, परिसंपत्ति मुद्रीकरण, मानव संसाधन नीति और शीर्ष नियुक्तियों की प्रक्रिया पर तथ्यात्मक जानकारी सार्वजनिक की जाए।
सूत्रों और कंपनी से जुड़े कुछ जानकारों द्वारा बीएसएनएल के वित्तीय प्रदर्शन तथा प्रबंधन की कार्यशैली को लेकर कई गंभीर दावे किए जा रहे हैं, जिनकी स्वतंत्र जांच और सत्यापन आवश्यक है। आरोप है कि एमटीएनएल की आय को बीएसएनएल के राजस्व में शामिल किया गया, जबकि उससे संबंधित व्यय को उसी अनुपात में समायोजित नहीं किया गया, जिससे लाभ का आंकड़ा वास्तविकता से बेहतर दिखाई दे सकता है।
यह भी दावा किया जा रहा है कि लंबे समय से लंबित विक्रेता देनदारियों को राइट-ऑफ कर लेखांकन के माध्यम से लाभ बढ़ाकर प्रदर्शित किया गया। वहीं एक रुपया में सिम बेचने की नीति पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि सिम की खरीद, विपणन और वितरण की वास्तविक लागत इससे कहीं अधिक है। भारतनेट परियोजना का कार्य नामांकन के आधार पर बीएसएनएल को मिलने से एंटरप्राइज बिजनेस के राजस्व में वृद्धि का दावा किया जा रहा है, ४जी रोलआउट के लिए सरकार द्वारा आवंटित करीब १३,५०० करोड़ रुपए की वैâपेक्स राशि में से विक्रेताओं को समय पर पूरा भुगतान नहीं किया गया और शेष राशि कंपनी के पास रखी गई। प्रबंधन पर निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी होने तथा कुछ बोर्ड निदेशकों के विरुद्ध सतर्कता संबंधी कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। अगर तकनीकी के मामले में देखें तो सरकार द्वारा निर्धारित १ लाख २६ हजार ४जी साइटों के लक्ष्य के मुकाबले करीब ९७ हजार साइटें ही स्थापित हो सकीं।
बहरहाल, यह सिर्फ वित्तीय प्रबंधन या तकनीकी निष्पादन का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन, कॉरपोरेट गवर्नेंस और जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल है। इसलिए इन सभी आरोपों की निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच होना आवश्यक है, ताकि यदि आरोप निराधार हैं तो प्रबंधन की विश्वसनीयता बहाल हो सके और यदि इनमें सच्चाई है तो समय रहते आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई की जा सके। करदाताओं के हजारों करोड़ रुपए से पुनर्जीवित की जा रही कंपनी के प्रति जनता का यह अधिकार है कि उसे सिर्फ सफलता के दावे ही नहीं, बल्कि वास्तविक प्रगति का पारदर्शी लेखा-जोखा भी मिले। लोकतंत्र में सार्वजनिक उपक्रमों की विश्वसनीयता सिर्फ उनके नफे-नुक्सान के आंकड़ों से नहीं, बल्कि उनकी जवाबदेही, पारदर्शिता और सुशासन से तय होती है। बीएसएनएल की वास्तविक सफलता भी इसी कसौटी पर परखी जाएगी।

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