सूफी खान
कई बार अपने देश इंटरेस्ट, इकबाल, इकोनॉमिक जरूरतें और कुछ खास समीकरण विदेश नीति की दिशा को तय करती हैं। सऊदी, तुर्की और पाकिस्तान ने डिफेंस डील की जिसे इस्लामिक नाटो कहा जा रहा है। कहा जा रहा है कि एक बड़ी और ताकतवर सेना रखने वाला मुस्लिम बहुत देश मिस्र भी इसमें शामिल होगा। लेकिन ऐसा नहीं होगा। जी हां मिस्र इस डिफेंस डील का हिस्सा नहीं बन सकता, बल्कि उसने इससे किनारा करने में ही भलाई समझी।
अरब मीडिया के मुताबिक, मिस्र को पाकिस्तान ने न्योता भी दिया था कि वह सऊदी और तुर्की के साथ मक्का रक्षा समझौते में शामिल हो, लेकिन उसने ऐन मौके पर इनकार कर दिया। एक्सपर्ट कहते हैं कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह मिस्र इजरायल का पड़ोसी है। तुर्की की सीमा इजरायल से नहीं लगती, सऊदी और इजरायल भी काफी दूर हैं और पाकिस्तान तो साउथ एशिया का देश है। लेकिन इन्होंने मुस्लिम देश होने के नाते इस्लाम और वैचारिक जुड़ाव के चलते ये डिफेंस डील की।
लेकिन मिस्र के साथ ऐसा नही है, मिस्र की सरहद और एक बड़ा सिनाई इलाका इजरायल से लगता है। दरअसल, साल १९६७ में हुई ६ अरबी देशों के साथ जंग जिसमें मिस्र भी शामिल था, में इजरायल ने मिस्र सिनाई पेनेनसुला पर कब्जा कर मिस्र को इकोनॉमी के मोर्चे पर खस्ताहाल कर दिया था। जिसे लंबी कूटनीतिक प्रक्रिया के बाद मिस्र ने बढ़ी मुश्किल से वापस पाया। तब से इजरायल और मिस्र के बीच शांति है। मिस्र इस बने बनाए सिस्टम को खत्म करने का जोखिम नहीं उठा सकता, क्योंकि सिनाई की स्थिरता उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा की पहली शर्त है।
इतना ही नहीं मिस्र में स्वेज नहर है, जो मेडिटेरियन सी और रेड सी को जोड़ती है। ये नहर एशिया और यूरोप के बीच समुद्री कारोबार के लिए बेहद अहम है। अगर किसी डिफेंस डील से इजरायल पर खतरा बनता है और इजरायल और मिस्र में तनाव होता तो मिस्र की इकोनॉमी, कारोबार और खासतौर से टूरिज्म बुरी तरह से प्रभावित हो जाता। इसलिए उसने ऐसी किसी किसी डील से किनारा करना ही बेहतर समझा।
सच तो यही है कि विदेश नीति भावनाओं, विचारधाराओं और धार्मिक समानताओं से नहीं बल्कि राष्ट्रीय हितों की कठोर वास्तविकताओं से अपनी दिशा निर्धारित करती है। ऐसा लगता है कि मिस्र ने इस सच्चाई को महसूस कर लिया है और तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ इस्लामिक नाटो जैसी किसी भी डील में शामिल होने से खुद को अलग कर लिया है।
