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गपशप :  ‘१२ साल का विकास या १२ साल की प्रचार यात्रा?.. आंकड़ों के महल में आम आदमी की झोपड़ी क्यों?’

राजन पारकर

राजनीति में एक कहावत है – ‘आईना वही दिखाता है जो सामने खड़ा हो।’ लेकिन आज देश की आर्थिक तस्वीर का आईना कुछ और ही कहानी सुना रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के १२ वर्षों के नेतृत्व पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विकास, परिवर्तन और उपलब्धियों की लंबी सूची गिनाई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत की आम जनता भी उसी विकास को महसूस कर रही है, जिसकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की जा रही है? लेकिन चमकती तस्वीरों के पीछे छिपी अर्थव्यवस्था की हकीकत बहुत कुछ बतलाती है
‘भाषणों में भारत विश्वगुरु बन गया, मगर रसोईघर में महंगाई अभी भी गुरुमंत्र दे रही है!’ गरीबी खत्म हुई या गरीबी की परिभाषा बदल दी गई? कहा गया कि करीब २५ करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला गया। लेकिन सवाल यह है कि अगर करोड़ों लोग आर्थिक रूप से मजबूत हो गए हैं तो मुफ्त अनाज योजनाओं पर निर्भरता इतनी बड़ी क्यों है? गरीबी हटाने के आंकड़े कागजों पर चमक रहे हैं, लेकिन गांवों में किसान की आंखों में कर्ज, बेरोजगारी और बाजार भाव की चिंता क्यों दिखाई देती है? गरीबी का प्रमाणपत्र बदल देने से गरीब की जिंदगी नहीं बदलती।
महिला सशक्तीकरण : संख्या बड़ी, संघर्ष भी बड़ा
लखपति दीदी, उज्ज्वला योजना और जनधन खाते जैसी योजनाओं का उल्लेख किया गया। लेकिन असली सवाल यह है कि कितनी महिलाओं की आय स्थायी रूप से बढ़ी? सिर्फ खाते खुल जाने से आर्थिक आजादी नहीं आती, खाते में पैसा और हाथ में रोजगार भी चाहिए। ‘बैंक में खाता खुल गया, लेकिन घर का चूल्हा अभी भी महंगाई से पूछ रहा है – गैस कहां है?
ळझ्घ् की सफलता लेकिन बेरोजगारी का भुगतान कौन करेगा?
डिजिटल क्रांति में भारत ने दुनिया में नाम बनाया, यह उपलब्धि है। लेकिन डिजिटल भुगतान से पेट नहीं भरता, रोजगार चाहिए। मोबाइल से पैसा भेजने की सुविधा बढ़ गई, लेकिन नौकरी पाने के लिए संघर्ष करने वाले करोड़ों युवाओं का सवाल आज भी वही है।
मेक इन इंडिया और उद्योग : निवेश आया या सिर्फ उद्घाटन?
मेक इन इंडिया, सेमीकंडक्टर और उत्पादन योजनाओं का उल्लेख हुआ। लेकिन उद्योगों के साथ रोजगार की संख्या कितनी बढ़ी, यह भी बताया जाना चाहिए। क्योंकि फैक्ट्री का शिलान्यास और युवाओं को नौकरी – दोनों में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
महाराष्ट्र के बड़े प्रोजेक्ट : विकास या घोषणाओं की बारात?
अटल सेतु, कोस्टल रोड, मेट्रो, विमानतळ, बंदरगाह जैसी परियोजनाएं निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं। लेकिन मुंबई-महाराष्ट्र के आम नागरिक का सवाल है – ‘सड़कें चमक रही हैं, लेकिन जीवन कितना आसान हुआ?’
बढ़ती महंगाई, घरों की कीमत, ट्रैफिक, रोजगार और सामान्य परिवार का बजट भी विकास का हिस्सा है।
विकास की गाड़ी तेज है लेकिन टिकट किसके पास है?
देश को आगे बढ़ना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन लोकतंत्र में सिर्फ उपलब्धियां गिनाना काफी नहीं होता, जनता के सवालों के जवाब भी देने पड़ते हैं। क्योंकि इतिहास में सिर्फ भाषण नहीं बचते, जनता का अनुभव बचता है। ‘सरकार ने विकास का ऐसा पोस्टर लगाया है कि दीवार ही नजर आ रही है, लेकिन उस दीवार के पीछे खड़ा आम आदमी दिखाई नहीं दे रहा।’ सवाल विरोध का नहीं, जवाबदेही का है। विकास का स्वागत है लेकिन विकास की परिभाषा में आम आदमी को भी शामिल करना होगा।
भारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, लेकिन आम आदमी की जेब कितनी बड़ी?
भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा गर्व की बात है। लेकिन अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने के साथ प्रति व्यक्ति आय, रोजगार और जीवन स्तर भी बढ़ना चाहिए। अगर देश की जीडीपी बढ़ रही है लेकिन युवाओं के हाथ में नौकरी नहीं, किसानों को उचित मूल्य नहीं और छोटे व्यापारियों पर दबाव बढ़ रहा है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। बड़ी अर्थव्यवस्था का उत्सव मनाते समय छोटी होती जेबों की आवाज भी सुननी होगी।

 

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