तौसीफ कुरैशी
लोकतंत्र की लड़ाइयां केवल नारों से नहीं जीती जातीं, उन्हें मैदान में उतरकर लड़ना पड़ता है। जनता का मनोबल भाषणों से नहीं, जीत से बनता है। राजनीति में कुछ जीतें सीटों से बड़ी होती हैं, क्योंकि वे यह संदेश देती हैं कि सत्ता अजेय नहीं है। आज विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जनता के मन से यह डर निकालना कि भारतीय जनता पार्टी को हराया नहीं जा सकता। `इंडिया’ गठबंधन की बैठक में राहुल गांधी ने विपक्षी एकता पर जोर दिया। यह बात बिल्कुल सही है। लेकिन एकता का अर्थ केवल बैठकें, तस्वीरें और संयुक्त बयान नहीं है। एकता का सबसे बड़ा प्रमाण चुनावी मैदान में दिखाई देता है। जहां जीत की संभावना हो, वहां पूरी ताकत झोंकनी होगी। हाल के चुनावों में कांग्रेस की आलोचना हुई कि उसके बड़े नेता असम और बंगाल से ज्यादा समय केरल में दे रहे थे। लेकिन राजनीति में परिणाम सबसे बड़ा तर्क होता है। कांग्रेस ने केरल जीता और उस जीत ने राष्ट्रीय राजनीति में उसका आत्मविश्वास बढ़ाया। उसी आत्मविश्वास के साथ राहुल गांधी अपने सहयोगियों से अधिक स्पष्ट और मजबूत भाषा में बात कर सके। अब आने वाले विधानसभा चुनावों में भी यही रणनीति जरूरी है। पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में विपक्ष के लिए अवसर मौजूद हैं। हिमाचल प्रदेश में वापसी की संभावना है। गुजरात में यदि विपक्ष २०१७ जैसी लड़ाई लड़ पाया तो भाजपा के सबसे मजबूत किलों में भी दरार पड़ सकती है। यह समय संसाधनों को बिखेरने का नहीं, उन्हें केंद्रित करने का है। सबसे दिलचस्प स्थिति उत्तर प्रदेश की है। भाजपा की राजनीति आज भी बड़े पैमाने पर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के सहारे चल रही है। यही कारण है कि राजनीतिक बहस का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। विरोधियों के खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणियां और परिवारों को निशाना बनाना राजनीतिक आत्मविश्वास का नहीं, बल्कि घबराहट का संकेत है। सत्ता को विपक्ष की ताकत का अंदाजा है, इसलिए उसकी प्रतिक्रिया भी उतनी ही तीखी होती जा रही है। लेकिन सवाल भाजपा से ज्यादा विपक्ष का है। विशेष रूप से सपा कंपनी और अखिलेश यादव का। उत्तर प्रदेश की लड़ाई दिल्ली, पटना या कोलकाता से नहीं लड़ी जा सकती। यह लड़ाई लखनऊ की सड़कों, गांवों और कस्बों में लड़नी होगी।
जंग की आग में झुलसती जनता
युद्ध सिर्फ मिसाइलों से नहीं लड़े जाते। युद्ध धारणाओं से भी लड़े जाते हैं। इंसानियत का दुश्मन मासूमों का कातिल संघियों का फादरलैंड इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष को दुनिया रोज देख रही है। टीवी चैनलों पर नक्शे बनते हैं, विशेषज्ञ आते हैं, दावे किए जाते हैं। लेकिन हर युद्ध की तरह इस युद्ध में भी दो लड़ाइयां चल रही हैं। एक मैदान में और दूसरी लोगों के दिमाग में। पश्चिमी दुनिया ने दशकों तक खुद को अजेय शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया लेकिन अब उसकी रुस और चीन ने मिलकर हवा निकाल दी है। दिखावे को अमेरिका लोकतंत्र का प्रहरी था, यूरोप आधुनिकता का प्रतीक दर्शाया जाता था और इजरायल पश्चिमी शक्ति का अग्रिम मोर्चा बताया जाता था, पर हाल यह निकला कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर बदलती दिखाई देती है। रुस ने यूक्रेन युद्ध के जरिए पूरे यूरोप की आर्थिक कमजोरी उजागर कर दी। हकीकत में पूरा यूरोप झूठ का लबाधा ओढ़कर दुनिया पर राज कर रहा था, जिसकी अब हवा निकल गई है। पूरा यूरोप पत्थरों के शहर में तब्दील होगा। ऊर्जा संकट ने दिखाया कि आधुनिक सभ्यताएं भी गैस और तेल के सामने असहाय हो सकती हैं। महंगाई ने आम नागरिकों का जीवन कठिन किया। अमेरिका के भीतर राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा। इसी पृष्ठभूमि में ईरान-इजराइल संघर्ष को देखा जाना चाहिए। यह सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है। यह उस विश्व व्यवस्था की परीक्षा भी है, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी थी। सवाल यह नहीं कि कौन-सी मिसाइल ज्यादा दूर तक जाती है। सवाल यह है कि आने वाले दशक में दुनिया की शक्ति का केंद्र कहां होगा। चीन, रूस, तुर्की और कई क्षेत्रीय शक्तियां एक ऐसी दुनिया की कल्पना कर रही हैं, जिसमें पश्चिम का एकाधिकार समाप्त हो। दूसरी ओर अमेरिका और उसके सहयोगी अपने प्रभाव को बनाए रखना चाहते हैं। इस संघर्ष का परिणाम चाहे जो हो, एक बात स्पष्ट है दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है। अब कोई एक शक्ति सबको आदेश नहीं दे सकती। युद्ध की असली कीमत सैनिक नहीं चुकाते, जनता चुकाती है। महंगाई, बेरोजगारी और असुरक्षा के रूप में। इसलिए किसी भी युद्ध को सिर्फ राष्ट्रवाद की आंख से नहीं, मानवता की आंख से भी देखना चाहिए। सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा। सवाल यह है कि जब युद्ध खत्म होगा, तब आम आदमी के हिस्से में क्या बचेगा?
सत्यमेव जयते…!
