रोहित माहेश्वरी / लखनऊ
उत्तर प्रदेश की सियासी सरगर्मी को बढ़ाते हुए समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर अब तक का सबसे बड़ा वैचारिक हमला बोला है। उन्होंने आगाह किया कि यदि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा दोबारा सत्ता में आती है, तो यह राज्य का आखिरी लोकतांत्रिक चुनाव साबित हो सकता है। सपा प्रमुख का यह बयान महज एक चुनावी नारा नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर एक गंभीर राजनीतिक चेतावनी है। अखिलेश यादव ने सत्तापक्ष पर केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED और ण्ँघ्) के दुरुपयोग का सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि विपक्ष को डराने और पार्टियों को तोड़ने के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने भाजपा की नीतियों को ‘मुंह से स्वदेशी और मन से विदेशी’ करार देते हुए आर्थिक और विदेश मोर्चों पर भी सरकार को घेरा। संपादकीय दृष्टि से देखें तो यह बयान आगामी चुनाव को सिर्फ सत्ता की जंग नहीं, बल्कि ‘लोकतंत्र बनाम तानाशाही’ की वैचारिक लड़ाई में बदलने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
ओवैसी का यूपी में गठबंधन का दांव
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर किया गया ताजा एलान राज्य की सियासत में नई बहस छेड़ गया है। बहराइच दौरे के दौरान ओवैसी ने घोषणा की है कि वे राज्य में भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए एक मजबूत भाजपा-विरोधी मोर्चा बनाने को तैयार हैं। हालांकि, ऊपरी तौर पर बेहद आक्रामक दिखने वाले इस रुख को राजनीतिक विश्लेषक और विपक्षी दल एक अलग चश्मे से देख रहे हैं। उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में यह सवाल हमेशा तैरता रहा है कि ओवैसी का चुनावी मैदान में उतरना वास्तव में किसे फायदा पहुंचाता है। इतिहास गवाह है कि जब भी ओवैसी की पार्टी हिंदी बेल्ट के राज्यों में पूरी ताकत से चुनाव लड़ती है, तो इसका सीधा असर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे मुख्य विपक्षी दलों के पारंपरिक मतों पर पड़ता है। मतों का यह बिखराव अंतत: सत्ताधारी दल के पक्ष में चुनावी गणित को आसान बना देता है। यही वजह है कि विपक्षी खेमा अक्सर उन पर परोक्ष रूप से सत्ताधारी दल की मदद करने का आरोप लगाता रहा है।
यूपी चुनाव का असमय चक्रव्यूह और राजनीतिक विवशता
उत्तर प्रदेश की सियासत में निर्धारित समय से पूर्व, इसी साल नवंबर-दिसंबर २०२६ में विधानसभा चुनाव कराने की सुगबुगाहट महज एक प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक नफा-नुकसान का खेल है। तकनीकी तौर पर फरवरी २०२७ में होने वाले राष्ट्रीय जनगणना के दूसरे चरण और बोर्ड परीक्षाओं के आपसी टकराव को इस जल्दबाजी का कारण बताया जा रहा है, क्योंकि एक ही समय पर प्रशासनिक अमले और लाखों शिक्षकों को दोनों मोर्चों पर तैनात करना असंभव है। किंतु, संपादकीय चश्मे से देखें तो इस प्रशासनिक ढाल के पीछे सत्तापक्ष की एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति साफ झलकती है।
