मुख्यपृष्ठस्तंभमहाराष्ट्रनामा: मित्रता की मिठास में सत्ता की कड़वाहट!

महाराष्ट्रनामा: मित्रता की मिठास में सत्ता की कड़वाहट!

राजन पारकर

-महायुति की थाली में अब अलग-अलग पकवान!’

महाराष्ट्र की राजनीति भी क्या गजब का रंगमंच बन गई है! कल तक जो एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर सत्ता की यात्रा कर रहे थे, वही आज विधान परिषद चुनाव आते ही एक-दूसरे को आंख दिखाने लगे हैं। शंभुराज देसाई का भाजपा को दी गई चुनौती कोई साधारण बयान नहीं, बल्कि गठबंधन की दीवारों पर पड़ती दरारों की आवाज है। ‘हमें भी अलग विचार करना पड़ेगा’ — इस एक वाक्य ने राजनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है। सत्ता की गाड़ी में बैठने के लिए सब साथ आते हैं, लेकिन सीटों की गिनती शुरू होते ही हर कोई अपना-अपना वैâलकुलेटर निकाल लेता है। चुनाव आते ही दोस्ती की परिभाषा बदल जाती है और गठबंधन का गणित कविता नहीं, पूरा हिसाब-किताब बन जाता है। ‘राजनीति में रिश्ते भी किराए के मकान जैसे होते हैं, जरूरत खत्म तो नोटिस हाथ में!’
‘डिनर की राजनीति: अब लोकतंत्र की
बैठकें भी खाने की मेज पर तय होंगी!’
विधान परिषद चुनाव के पहले भाजपा का ‘डिनर पे चर्चा’ कार्यक्रम भी महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। नगरसेवकों को बुलाना, संवाद करना, रणनीति बनाना — यह सब लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन व्यंग्य की नजर से देखें तो ऐसा लगता है कि अब चुनावी निष्ठा भी खाने की प्लेट के साथ परोसी जा रही है। संख्याबल मजबूत होने के बाद भी सावधानी, बैठकें, संपर्क अभियान… यह बताता है कि राजनीति में भरोसा भी अब ईएमआई पर चल रहा है। जनता सोच रही है-‘पहले नेता जनता से मिलने जाते थे, अब नेता अपने ही नेताओं को मनाने के लिए बुला रहे हैं!’ सत्ता की कुर्सी इतनी नाजुक हो गई है कि चार पैर होने के बावजूद हर कोई उसे पकड़कर बैठा है।
‘आरक्षण का सवाल बनाम सत्ता का खेल:
राजनीति की गाड़ियां तेज!’
मनोज जरांगे पाटील ने गॅजेट, मराठा समाज के मुद्दों और सरकार की भूमिका को लेकर अपना संघर्ष जारी रखा है। समाज के प्रश्नों की यात्रा लंबी है, लेकिन राजनीति की यात्रा हमेशा तेज होती है। यहां घोषणा तुरंत होती है, लेकिन निर्णय की फाइलें वर्षों तक रास्ता खोजती रहती हैं। एक तरफ सत्ता के गलियारों में बैठकें, रणनीतियां और चुनावी समीकरण बन रहे हैं, तो दूसरी तरफ सामान्य नागरिक अपने मूल प्रश्नों के जवाब तलाश रहा है। ‘नेताओं के पास कुर्सी बचाने का समय है, लेकिन जनता के सवालों को जवाब मिलने का समय कब आएगा?’ सत्ता के इस खेल में कभी दोस्त दुश्मन बनते हैं, कभी विरोधी साथ बैठते हैं। कुर्सी की राजनीति में रंग बदलना पुरानी परंपरा है, लेकिन जनता के मुद्दे आज भी उसी जगह खड़े हैं। एक तरफ गठबंधन की बैठकें हैं, दूसरी तरफ समाज की उम्मीदें। एक तरफ सत्ता की प्लेटें सज रही हैं, दूसरी तरफ आम आदमी की थाली में सवाल पड़े हैं। कुर्सी का खेल चलता रहेगा… मगर महाराष्ट्र की जनता कब तक दर्शक बनकर तालियां बजाती रहेगी?

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