राजा जनक ने अपने यज्ञ में मुनियों सहित श्री रामचंद्रजी का पूजन किया। श्री राम ने धनुष को चढ़ा दिया और उसे अनायास ही तोड़ डाला। तदनंतर महाराज जनक ने अपनी अयोनिजा कन्या सीता को, जिस के विवाह के लिए पराक्रम ही शुल्क निश्चित किया गया था, श्री रामचंद्रजी को समर्पित किया। श्री राम ने भी अपने पिता राजा दशरथ आदि गुरुजनों के मिथिला में पधारने पर सबके सामने सीता का विधिपूर्वक पाणि ग्रहण किया। उस समय लक्ष्मण ने भी मिथिलेश-कन्या उर्मिला को अपनी पत्नी बनाया। राजा जनक के छोटे भाई कुशध्वज थे। उनकी दो कन्याएं थीं- श्रुतकीर्ति और मांडवी। इनमें मांडवी के साथ भरत ने और श्रुतकीर्ति के साथ शत्रुघ्न ने विवाह किया। तदनंतर राजा जनक से भलीभांति पूजित हो श्री राम ने वसिष्ठ आदि महर्षियों के साथ वहां से प्रस्थान किया। मार्ग में जमदग्नि नंदन परशुराम को जीत कर वे अयोध्या पहुंचे। वहां जाने पर भरत और शत्रुघ्न अपने मामा राजा युधाजित की राजधानी को चले गए।
