हरिगोविंद विश्वकर्मा
चमचासन भारतीय योग की महान परंपरा का नवीनतम और सबसे उपयोगी आसन है। इसका आविष्कार कब हुआ, यह तो पता नहीं। कई योगाचार्य मानते हैं कि चमचासन का आविष्कार आजाद भारत में हुआ। यानी यह इकलौता आसन है, जिसकी खोज भारतीयों ने की। योग पर रिसर्च करने वाले कई विद्वानों का दावा है कि इसकी खोज नेहरू युग में ही हो गई थी। लेकिन नेहरू ने जानबूझकर इसे लोकप्रिय नहीं होने दिया। वह चमचासन करने वालों को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे। लिहाजा, चमचासन भूमिगत साधना बना रहा। यही वजह है कि स्वतंत्र भारत में कई दशक तक चमचासन के लोकप्रिय होने की रफ्तार धीमी थी। एक बार तो चमचासन के विलुप्त होने का खतरा भी पैदा हो गया था। लेकिन कहते हैं न, अच्छी चीज को ज्यादा दिनों तक दबा नहीं सकते।
चमचागीरी ने पिछले दशक में सारे रिकॉर्ड तोड़े
धीरे-धीरे चमचासन अपनी जगह बनाने लगा। उसके लोकप्रिय होने की रफ्तार धीमी ही सही, लेकिन बढ़ने लगी। समय के साथ इसकी तरक्की संतोषजनक हो गई। पिछले एक दशक में तो इसकी लोकप्रियता ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। आजकल तो चमचासन अच्छी तरह फल-फूल रहा है। हर जगह चमचासन किया जा रहा है। गांव हो, शहर हो या दफ्तर या फिर संसद, हर जगह चमचासन हो रहा है। यहां तक कि देश से लेकर विदेश तक पूरे आत्मविश्वास के साथ चमचासन किया जा रहा है।
सभी आसनों को छोड़ा पीछे
उम्मीद है कि आजादी के सौ वर्ष पूरे होते-होते चमचासन भयानक लोकप्रिय हो जाएगा। पद्मासन, शीर्षासन और शवासन को पीछे छोड़ देगा। लोग गर्व से चमचासन किया करेंगे। वैसे तो प्राचीन भारतीय ग्रंथों में ८४ लाख आसनों का जिक्र मिलता है, लेकिन इनमें से ८४ आसन ही प्रमुख माने जाते हैं। इस हिसाब से चमचासन भारतीय योग परंपरा का ८५वां आसन है। कुछ विद्वान इसे आधुनिक युग का सबसे महत्वपूर्ण आसन भी मानते हैं, क्योंकि दूसरे आसनों से केवल शरीर स्वस्थ होता है, जबकि चमचासन से करियर स्वस्थ होता है।
हालांकि, आरंभ में लोगों को चमचासन करने में थोड़ी झिझक होती थी। उन्हें लगता था कि कोई देख लेगा तो क्या कहेगा। कालांतर में उन्होंने बड़े-बुजुर्गों से प्रेरणा ली। बड़े-बुजुर्ग देश-विदेश, मंच-टीवी स्टूडियो, कहीं भी चमचासन करते हैं। उनके चेहरे पर न शर्म होती है, न संकोच। जो काम बड़े-बुजुर्ग इतनी सहजता से कर सकते हैं, उसे करने में आम आदमी को भला वैâसी शर्म! लिहाजा, समय बदला और लोग खुलेआम चमचासन करने लगे। चमचासन पर रिसर्च करने वालों का मानना है कि इसके ढेर सारे फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे बॉस खुश रहता है। बॉस सोचता है कि यह आदमी भले काम न करे, लेकिन चमचासन बहुत अच्छी तरह करता है। हर बॉस को ऐसे ही लोगों की जरूरत रहती है। इसलिए चमचासन करने वालों को वह अपने आसपास रखता है और जो लोग चमचासन नहीं करते, उनसे सुरक्षित दूरी बनाए रखता है।
ढेर सारे हैं फायदे
चमचासन करने वालों को प्रमोशन पहले मिलता है। हर दफ्तर में ऐसे लोग पाए जाते हैं। काम नहीं करते हैं, केवल बॉस की चमचागीरी करते हैं। हर बात पर इस तरह मुस्कुराते हैं जैसे उन्हें जीवन का परम सत्य मिल गया। बॉस छींक दे तो कह देते हैं, ‘सर, क्या अद्भुत छींक थी!’ बॉस देर से आए तो कहते हैं, `सर, समय तो आपके हिसाब से चलता है।’ बॉस कोई साधारण-सी बात कह दे तो उसे प्रबंधन का महान सिद्धांत घोषित कर देते हैं। चमचासन केवल नौकरी में ही लाभ नहीं देता। राजनीति में तो इसका महत्व और भी ज्यादा है। चमचासन करने वाला रातोंरात राष्ट्रीय प्रवक्ता, सलाहकार या संसद का दावेदार बन जाता है। योग्यता, अनुभव और विचारधारा जैसी चीजें बाद में आती हैं। पहले यह देखा जाता है कि व्यक्ति कितनी देर तक चमचासन कर सकता है। जो लोग नियमित चमचासन करते हैं, वे खुश रहते हैं। उनकी आर्थिक हालत बेहतर होती है। उन्हें कभी अकेलापन महसूस नहीं होता। वे हमेशा किसी न किसी प्रभावशाली व्यक्ति के पास पाए जाते हैं। चेहरे पर स्थायी मुस्कान रहती है। रीढ़ की अनुपस्थिति के बावजूद उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। योग गुरु कहते हैं कि आने वाले समय में वही लोग सफल होंगे, जो नियमित चमचासन करेंगे। बाकी लोग योग्यता, ईमानदारी, नैतिकता और आत्मसम्मान जैसी दकियानूसी बातों में उलझे रहेंगे।
दरअसल, योग मनुष्य को झुकना सिखाता है। लेकिन चमचासन उससे एक कदम आगे है। यह मनुष्य को इतना झुका देता है कि वह सीधा खड़ा होना ही भूल जाता है। और जिस देश में सीधा खड़ा होना भूल जाना ही सफलता की पहली शर्त बन जाए, वहां चमचासन केवल एक आसन नहीं रह जाता। वह जीवनशैली बन जाता है।
