छाते-रेनकोट की प्रदर्शनी तक सिमटा पुनर्वास
स्थायी रोजगार पर प्रशासन मौन
द्रुप्ति झा /मुंबई
दिव्यांगजनों के पुनर्वास को अक्सर सिर्फ कागजी और दिखावटी माना जाता है, क्योंकि योजनाओं के धरातल पर उतरने में भारी कमी है। कई सरकारी पहलों के बावजूद, जमीनी स्तर पर सुविधाओं तक दिव्यांगजनों की वास्तविक पहुंच और उनके सशक्तीकरण के दावों पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। फिर एक बार दिव्यांग पुनर्वास योजना महज एक मजाक बन कर रहे गई। मुंबई की मेयर रितु तावडे, महिला एवं बाल कल्याण समिति की चेयरपर्सन मीनल तुर्डे और मनपा आयुक्त अश्विनी भिड़े ने मंगलवार को मनपा मुख्यालय में दिव्यांगों द्वारा बनाए गए छातों और रेनकोट की प्रदर्शनी का दौरा किया। प्रशासन द्वारा इस आयोजन को एक उपलब्धि रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। इस प्रदर्शनी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मनपा के प्रयास दिव्यांगों को स्थायी रोजगार देने के बजाय केवल अल्पकालिक प्रदर्शनियों और फोटो खिंचवाने तक ही सीमित हैं।
मेयर रितु तावडे ने दिव्यांगों के कौशल और दृढ़ता की सराहना की और महज तीन छाते खरीदकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। द नेशनल एसोसिएशन ऑफ डिसेबल्ड एंटरप्राइजेज’ के सहयोग से आयोजित इस प्रदर्शनी में भाग लेने वाले उद्यमी विक्रम मोरे जैसे कई दिव्यांगों को लंबे समय से स्थायी बाजार और वित्तीय सहायता की दरकार है, जिस पर प्रशासन पूरी तरह मौन है।
अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के दौरों के बावजूद, दिव्यांग उद्यमियों के लिए यह प्रदर्शनी सिर्फ एक और वार्षिक रस्म बनकर रह गई है। जब तक मनपा इन कारीगरों को नियमित रोजगार और व्यापक बाजार उपलब्ध नहीं कराती, तब तक ऐसी प्रदर्शनियों के जरिए किया जाने वाला जन जागरूकता का दावा पूरी तरह खोखला और बेअसर साबित होगा।
सराहना नहीं, सहारे की दरकार
दिव्यांग उद्यमियों का कहना है कि उन्हें मंच और प्रशंसा से ज्यादा स्थायी रोजगार, विपणन व्यवस्था और आर्थिक सहयोग की जरूरत है। हर साल लगने वाली प्रदर्शनियां कुछ दिनों की चर्चा तो बटोरती हैं, लेकिन इसके बाद अधिकांश कारीगर फिर से सीमित संसाधनों और अनिश्चित भविष्य के भरोसे रह जाते हैं।
