-जब अमेरिका और ईरान दोनों अपनी फजीहत को फतह बताने लगे
मनमोहन सिंह
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की बिसात पर कभी-कभी दोनों खिलाड़ी इस कदर उलझ जाते हैं कि खेल में कोई नहीं जीतता, लेकिन शह और मात के इस खेल में दोनों ही पक्ष जनता के सामने अपनी पीठ थपथपाने से बाज नहीं आते। ईरान और अमेरिका के बीच मौजूदा परमाणु गतिरोध और कूटनीतिक रस्साकशी पर दो कहावतें बिल्कुल सटीक बैठती हैं, ‘गिरे तो भी टांग ऊपर’ और ‘फिसल पड़े तो हर गंगे’। यानी जब मजबूरी में कोई काम करना ही पड़ जाए या जब पैर फिसल कर बदनामी तय हो, तो उसे किसी पवित्र कृत्य या रणनीतिक जीत का रूप दे देना। आज यह दोनों ही देशों की मजबूरी बन चुका है।
अमेरिका और ट्रंप: फिसल पड़े तो ‘हर गंगे’
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आज घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चौतरफा दबाव में हैं। इस कूटनीतिक युद्ध को अमेरिका में ही ‘बेवजह का विवाद’ माना जा रहा है और जनता टैक्सपेयर्स के अरबों डॉलर इस तनाव पर फूंकने को लेकर सवाल खड़े कर रही है। रही-सही कसर इजरायल ने पूरी कर दी है, जो इस समय ट्रंप प्रशासन की बात मानने को तैयार नहीं है और अपने स्वतंत्र आक्रामक रुख पर अड़ा है।
ऐसे में जब ट्रंप सोशल मीडिया पर यह दावा करते हैं कि ‘ईरान पूरी तरह झुक गया है और अमेरिकी किसानों से अनाज खरीदेगा,’ तो यह साफ तौर पर ‘फिसल पड़े तो हर गंगे’ का मामला दिखता है। इजरायल पर नियंत्रण खोने और घरेलू स्तर पर साख को लगे धक्के की फजीहत से ध्यान भटकाने के लिए ट्रंप इस बेहद सीमित और एस्क्रो अकाउंट वाले समझौते को ‘महाविजय’ की तरह पेश कर रहे हैं।
ईरान: ‘गिरे तो भी टांग ऊपर’ की जिद
दूसरी तरफ ईरान की हालत अंदरूनी तौर पर बेहद नाजुक है। देश में गृहयुद्ध जैसे हालात हैं और वहां की जनता, विशेषकर युवा और महिलाएं, दकियानूसी इस्लामिक कानूनों के खिलाफ सड़कों पर खड़ी हैं। इस अंदरूनी कमजोरी और अमेरिकी प्रतिबंधों की मार से बचने के लिए ईरान को परमाणु निरीक्षणों पर पर्दे के पीछे समझौता करना पड़ा।
लेकिन अपनी अवाम और कट्टरपंथियों के सामने साख बचाने के लिए ईरान ने तुरंत इसे ‘इस्लाम पर हमला’ बताकर धार्मिक रंग दे दिया, ताकि जनता का ध्यान आंतरिक मुद्दों से हटकर राष्ट्रवाद पर चला जाए। परमाणु समझौते के बावजूद वह लगातार अमेरिकी दावों का खंडन कर रहा है, ताकि दुनिया को लगे कि वह महाशक्ति के आगे झुका नहीं है। यह ईरान की ‘गिरे तो भी टांग ऊपर’ दिखाने जैसी मजबूरी है।
कूटनीतिक मजबूरी का खेल
परमाणु संसाधनों की सुरक्षा और निरीक्षण का यह पूरा ड्रामा असल में दोनों देशों के लिए अपनी-अपनी लाज बचाने का जरिया बन गया है। अमेरिका को अपनी गिरती साख बचाने के लिए एक ‘कागजी जीत’ चाहिए थी और ईरान को अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए प्रतिबंधों में थोड़ी ढील। दोनों ही नेता जमीन पर फिसल चुके हैं, बस एक ‘हर गंगे’ का नारा लगा रहा है और दूसरा अपनी ‘टांग ऊपर’ बता कर विजेता होने का नाटक कर रहा है।
