मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत: खिलाड़ी हैं, रेफरी नहीं!

रुख-ए-सियासत: खिलाड़ी हैं, रेफरी नहीं!

-राजनीति में जीत अक्सर उन्हीं की होती है, जो सवाल खड़े करते हैं, सिर्फ जवाब नहीं देते।

-जिस दिन सत्ता यह मानने लगे कि सांसदों, विधायकों और जनप्रतिनिधियों की निष्ठा विचारों से नहीं, बल्कि दबाव, प्रलोभन या शक्ति से तय होगी, उसी दिन लोकतंत्र की आत्मा घायल होने लगती है।

तौसीफ कुरैशी

राजनीति में अक्सर लोग चाल को देखकर प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन उसके पीछे की रणनीति को नहीं समझते। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों यही हो रहा है। सपा के नेता अखिलेश यादव ने जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव से जुड़े विवाद पर प्रतिक्रिया दी, तो कई लोगों ने इसे अनावश्यक हस्तक्षेप बताया। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? दरअसल, अखिलेश यादव ने कोई मध्य प्रदेश की राजनीति नहीं की। उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति की। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि जमीन खरीदने-बेचने या संपत्ति के मामलों पर चर्चा हो सकती है, तो फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर वैसी बहस क्यों नहीं होती? यह सवाल सीधे-सीधे भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन और नेतृत्व की राजनीति की ओर इशारा करता है। राजनीति में धारणा भी एक हथियार होती है। योगी समर्थकों का एक बड़ा वर्ग वर्षों से यह नैरेटिव गढ़ता रहा है कि योगी को कोई हटा नहीं सकता, बल्कि उनका अगला पड़ाव सीधे प्रधानमंत्री पद हो सकता है। ऐसे में अखिलेश यादव ने उसी कथा में एक दरार डालने की कोशिश की है। उन्होंने यह संकेत दिया कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और योगी के बीच सब कुछ उतना सहज नहीं है, जितना दिखाया जाता है। चाहे यह दावा सही हो या गलत, लेकिन चुनावी राजनीति में सवाल का असर अक्सर जवाब से बड़ा होता है। यही वजह है कि यह बयान केवल भाजपा पर हमला नहीं, बल्कि उसके समर्थकों के आत्मविश्वास को चुनौती देने का प्रयास भी है। यदि योगी का कद बड़ा दिखता है तो भाजपा को लाभ मिलता है, लेकिन यदि यह चर्चा शुरू हो जाए कि उनका कद कुछ लोगों को असहज कर रहा है, तो समीकरण बदलते हैं।
इस पूरे विवाद का एक सामाजिक पहलू भी है। अखिलेश यादव पीडीए पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक की राजनीति की बात करते हैं। ऐसे में जब यादव समुदाय से आने वाले किसी मुख्यमंत्री पर हमला होता दिखाई देता है, तो उसका राजनीतिक और सामाजिक संदेश अलग-अलग स्तरों पर पढ़ा जाता है। यह केवल व्यक्ति का नहीं, प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी बन जाता है। याद करना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री आवास को गंगाजल से धोने की घटना और बाद में `टोंटी चोरी’ जैसे आरोपों ने राजनीतिक बहस को कितना विषाक्त बनाया था। उस समय बहुत कम लोग ऐसे थे, जिन्होंने इन प्रतीकों और आरोपों का खुलकर विरोध किया। इसलिए जब आज यादव राजनीति और यादव समर्थन पर सवाल उठते हैं, तो उसके पीछे की ऐतिहासिक स्मृतियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अखिलेश यादव की राजनीति से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है। लेकिन उन्हें हर चाल पर सीटी बजाकर फाउल बताने वाले शायद यह भूल रहे हैं कि वे इस समय मैदान में खेल रहे खिलाड़ी हैं, रेफरी नहीं। राजनीति में जीत अक्सर उन्हीं की होती है, जो सवाल खड़े करते हैं, सिर्फ जवाब नहीं देते।
जब जनादेश बिकने लगे लोकतंत्र रोने लगता है!
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत चुनाव नहीं, बल्कि वह नैतिक विश्वास होता है कि जनता का जनादेश बिकाऊ नहीं है। जिस दिन सत्ता यह मानने लगे कि सांसदों, विधायकों और जनप्रतिनिधियों की निष्ठा विचारों से नहीं, बल्कि दबाव, प्रलोभन या शक्ति से तय होगी, उसी दिन लोकतंत्र की आत्मा घायल होने लगती है। आज जो लोग विपक्षी दलों के नेताओं के टूटने, दल बदलने या राजनीतिक दबावों के आगे झुकने पर ताली बजा रहे हैं, उन्हें एक क्षण ठहरकर सोचना चाहिए। यदि यही परंपरा स्थापित हो गई कि सत्ता अपने विरोधियों को खरीद सकती है, डरा सकती है या तोड़ सकती है, तो कल यही रास्ता किसी बाहरी शक्ति के लिए भी खुल सकता है। तब सवाल केवल किसी एक दल का नहीं रहेगा, बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र का होगा। इतिहास हमें बताता है कि ताकत स्थायी नहीं होती।
इमरजेंसी के दिनों में देश की बड़ी-बड़ी राजनीतिक और सामाजिक शक्तियां दबाव में आईं। कई लोगों ने समझौते किए, कई झुके, कई चुप रहे। अंग्रेजों के दौर में भी ऐसा हुआ। सत्ता का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वह प्रतिरोध को कमजोर करना चाहती है। लेकिन लोकतंत्र का सौंदर्य यह है कि हर दौर में कुछ आवाजें ऐसी भी होती हैं, जो दबाव के बावजूद खड़ी रहती हैं। यही कारण है कि भारत की राजनीति में कांग्रेस की चर्चा केवल एक राजनीतिक दल के रूप में नहीं होती। उसके समर्थक यह तर्क देते हैं कि उसके भीतर स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत से निकला प्रतिरोध का एक संस्कार मौजूद है। यह दावा विवाद से परे नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस ने अपने इतिहास में लंबे संघर्षों, विभाजनों, पराजयों और सत्ता से बेदखली के दौर देखे हैं। कांग्रेसमुक्त भारत का नारा देने वालों ने शायद यह मान लिया था विâ लगातार चुनावी हार और राजनीतिक दबाव उसे समाप्त कर देंगे। लेकिन राजनीति में विचारधाराएं केवल चुनावी परिणामों से समाप्त नहीं होतीं। कई बार दबाव ही किसी दल को नया जीवन दे देता है। जनता यह देखती है कि कौन सत्ता के साथ खड़ा है और कौन उसके सामने सवाल पूछ रहा है। राहुल गांधी को लेकर भी यही राजनीति दिखाई देती है। उनके समर्थकों का मानना है कि जितना अधिक उन्हें निशाना बनाया जाता है, उतना ही वे विपक्ष की केंद्रीय आवाज बनते जाते हैं।
विरोधी उन्हें कमजोर साबित करने में लगे रहते हैं और समर्थक इसे संघर्ष की पहचान मानते हैं। लोकतंत्र में असली प्रश्न यह नहीं है कि कौन सा दल जीतेगा और कौन हारेगा। असली प्रश्न यह है कि क्या देश में ऐसी राजनीतिक संस्कृति बची रहेगी, जिसमें असहमति को देशद्रोह नहीं माना जाएगा, विरोध को अपराध नहीं बनाया जाएगा और सत्ता से सवाल पूछने वालों को दुश्मन नहीं समझा जाएगा। भारत का लोकतंत्र इसलिए महान नहीं है कि यहां शक्तिशाली सरकारें बनीं। भारत का लोकतंत्र इसलिए महान है कि यहां शक्तिशाली सरकारों के सामने भी सवाल पूछने की परंपरा जीवित रही। जिस दिन यह परंपरा खत्म होगी, उस दिन जीत चाहे किसी की भी हो, हार लोकतंत्र की होगी। सत्यमेव जयते

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