राज ईश्वरी
दृश्यम १: मध्य प्रदेश का एक परीक्षा केंद्र
कड़ी धूप और लोहे के भारी चैनल गेट के सामने एक पिता रो रहा है, गिड़गिड़ा रहा है। अचानक वह हताशा में अपना सिर जोर-जोर से लोहे के गेट पर पटकने लगता है। खून और आंसू एक हो जाते हैं और वह तड़पता हुआ सड़क पर गिर पड़ता है। पास ही खड़ी उसकी बेटी चीख पड़ती है। वे दोनों तकरीबन ३० किलोमीटर दूर से समय पर निकलने के बावजूद परीक्षा केंद्र पहुंचने में कुछ मिनट लेट हो गए थे। गेट के अंदर खड़े सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों का दिल नहीं पसीजता। नियमों की मजबूत दीवार के सामने एक पिता की ममता और एक बेटी की सालों की मेहनत दम तोड़ देती है।
प्रश्न: क्या चंद मिनटों की यह देरी किसी के जीवनभर की तपस्या से बड़ी हो सकती है? ३० किलोमीटर दूर से आने वाले एक ग्रामीण परिवार के लिए क्या हमारी परिवहन व्यवस्था इतनी सुलभ है कि हम उनसे सेकंडों की सटीकता की उम्मीद करें? क्या हमारे देश के नियम इंसानों के लिए बने हैं या इंसान इन संवेदनहीन नियमों की बलि चढ़ने के लिए हैं?
दृश्यम २: कर्नाटक की सड़कें और बेबस छात्राएं
यहां भी दृश्य अलग नहीं है। नीट परीक्षा में शामिल होने आर्इं कई छात्राएं परीक्षा केंद्र के बाहर बिलख रही हैं, हाथ जोड़कर मिन्नतें कर रही हैं कि उन्हें भीतर जाने दिया जाए। उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि वे देश की लचर यातायात व्यवस्था (ट्रैफिक जाम) में फंस गई थीं। घंटों जाम में जूझने के बाद जब वे केंद्र पहुंचीं तो समय सीमा समाप्त हो चुकी थी।
प्रश्न: क्या ट्रैफिक जाम के लिए ये मासूम छात्राएं जिम्मेदार हैं? देश के महानगरों की यातायात व्यवस्था को दुरुस्त रखना किसका काम है? जब प्रशासन सुगम यातायात देने में पूरी तरह विफल रहता है तो उसकी सजा इन बेटियों को क्यों भुगतनी पड़े, जो देश का भविष्य बनने का सपना देख रही हैं?
दृश्यम ३: दिल्ली एयरपोर्ट का ‘प्रचार तंत्र’
ठीक इसी समय, देश की राजधानी दिल्ली के एयरपोर्ट पर एक अलग दृश्य बनता है। प्रधानमंत्री का विमान कोलकाता से लौटकर आता है और उनका काफिला पौन घंटे के लिए एयरपोर्ट पर ही रुका रहता है। सरकारी प्रचार तंत्र और सोशल मीडिया पर तुरंत खबरें तैरने लगती हैं कि प्रधानमंत्री इसलिए रुके हैं ताकि वीआईपी मूवमेंट की वजह से दिल्ली की सड़कों पर ट्रैफिक न लगे और नीट एग्जाम अटेंड करने जा रहे बच्चों को सेंटर पहुंचने में लेट न हो।
प्रश्न: अगर देश के शीर्ष नेतृत्व को बच्चों के लेट होने की इतनी ही फिक्र है, तो वही फिक्र ग्राउंड जीरो पर क्यों नहीं दिखती? जब दिल्ली में वीआईपी काफिला रुक सकता है तो मध्य प्रदेश और कर्नाटक के केंद्रों पर उन बच्चों के लिए ‘ग्रेस टाइम’ (अतिरिक्त समय) का नियम क्यों नहीं बन सकता, जो वास्तविक समस्याओं के कारण लेट हुए? क्या बच्चों की यह ‘फिक्र’ सिर्फ एक पीआर स्टंट और चुनावी विमर्श चमकाने के लिए है?
इन तीनों दृश्यों को एक साथ रखकर देखें तो व्यवस्था का अंतर्विरोध साफ नजर आता है। इस पूरे संकट पर मरहम लगाने के बजाय राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप की खोखली राजनीति में व्यस्त हैं।
