सना खान
एक युवक अपने करियर को लेकर बहुत उलझन में था। वह जिस किसी से मिलता, उससे सलाह जरूर मांगता। कभी वह अपने दोस्तों से राय लेता, कभी परिवार से, तो कभी उन लोगों से जो उससे अधिक अनुभवी थे। हर व्यक्ति उसे अलग-अलग सुझाव देता। कोई कहता, ‘जोखिम लो।’ कोई कहता, ‘स्थिर नौकरी चुनो।’ कोई उसे धैर्य रखने की सलाह देता, तो कोई तुरंत निर्णय लेने को कहता। युवक सबकी बातें ध्यान से सुनता, लेकिन कुछ दिनों बाद वही करता जो वह शुरू से करना चाहता था। एक दिन उसके दादा ने मुस्कुराकर पूछा, ‘जब तुम्हें अपना पैâसला पहले से पता था, तो इतनी सलाह क्यों मांग रहे थे?’ युवक थोड़ा झेंप गया और बोला, ‘शायद मैं यह सुनना चाहता था कि मैं जो सोच रहा हूं, वही सही है।’ दादा हंस पड़े और बोले, ‘बेटा, ज्यादातर लोग सलाह इसलिए नहीं मांगते कि वे अपना निर्णय बदल सकें। वे सलाह इसलिए मांगते हैं ताकि कोई उनकी पहले से बनी राय पर मुहर लगा दे।’ युवक कुछ देर सोचता रहा। उसे याद आया कि पिछले कुछ महीनों में उसने कई लोगों से सलाह ली थी। लेकिन जब भी किसी की राय उसकी सोच से अलग होती, वह उसे अनदेखा कर देता। उसे पहली बार एहसास हुआ कि वह सचमुच सलाह नहीं ढूंढ रहा था, बल्कि अपने पहले से तय निर्णय के लिए समर्थन खोज रहा था। उसे यह भी समझ आया कि यदि हम केवल वही सुनना चाहते हैं जो हमें अच्छा लगे, तो हम सीखने का एक बड़ा अवसर खो देते हैं। उसे एहसास हुआ कि सलाह सुनना आसान है, लेकिन उसे स्वीकार करना तभी संभव होता है जब हम सच में नए दृष्टिकोण के लिए खुले हों। बात यही है कि सलाह मांगना और सलाह मानना दो अलग बातें हैं। यदि हम केवल अपनी पसंद की बातें सुनना चाहते हैं, तो हम सलाह नहीं, बल्कि अपनी सोच की पुष्टि खोज रहे होते हैं।
सलाहें बहुत थीं, मगर चुनाव अपना था,
हर रास्ते के पीछे एक जवाब अपना था।
लोग राह दिखा सकते हैं बस सफर में,
मंजिल तक पहुंचना तो पैâसला अपना था।
