सुनील ओसवाल / मुंबई
विपक्ष में रहने के कारण विकास कार्यों के लिए पर्याप्त निधि नहीं मिलने का आरोप लगाकर शिवसेना छोड़कर शिंदे गुट में शामिल हुए छह सांसदों की दलीलों पर अब सवाल खड़े हो गए हैं। संसद के आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर सामने आई जानकारी ने बागी सांसदों के दावों की हवा निकाल दी है। करोड़ों रुपये की सांसद निधि मंजूर होने के बावजूद उसका बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं किया गया और सैकड़ों प्रस्तावित काम अधूरे पड़े रहे।
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब विकास कार्यों के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध थी, तो आखिर इन सांसदों ने उसे खर्च क्यों नहीं किया? क्या जनता के सामने निधि की कमी का मुद्दा केवल दल-बदल का बहाना था? आंकड़ों के अनुसार, परभणी के सांसद संजय जाधव को १४ करोड़ ७ लाख रुपए की निधि मिली थी, लेकिन उसमें से केवल ३ करोड़ ७८ लाख रुपए ही खर्च किए गए। ५६ प्रस्तावित कार्यों में से सिर्फ २५ पूरे हो सके।
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद विरोधी दल ने बागी सांसदों पर तीखा हमला बोला है। आधिकारिक आंकड़ों ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि करोड़ों रुपए उपलब्ध थे, तो विकास कार्य क्यों अटके रहे? क्या काम निधि के अभाव में रुके थे या फिर जनप्रतिनिधियों की इच्छाशक्ति की कमी के कारण?
बागी सांसदों का विकास मॉडल फेल
-यवतमाल-वाशिम के सांसद संजय देशमुख को १८ करोड़ ६ लाख रुपए मिले, लेकिन उन्होंने महज १ करोड़ ४२ लाख रुपए खर्च किए। १०६ प्रस्तावित कामों में से केवल ७ ही पूरे हो पाए।
-मुंबई दक्षिण मध्य के सांसद संजय दीना पाटील को भी १४ करोड़ ७ लाख रुपए की मंजूरी मिली, लेकिन सिर्फ १५ लाख रुपए खर्च किए गए। हैरानी की बात यह है कि ४० प्रस्तावित कार्यों में से एक भी पूरा नहीं हो सका।
-अहिल्यानगर के सांसद भाऊसाहेब वाकचौरे को १४ करोड़ ७ लाख रुपए मिले, लेकिन उन्होंने केवल ७१ लाख रुपए खर्च किए। १३५ प्रस्तावित कार्यों में से सिर्फ दो कार्य पूरे हुए।
-हिंगोली के सांसद नागेश पाटील आष्टीकर को १९ करोड़ रुपए की मंजूरी मिली थी, लेकिन उनमें से केवल ५ करोड़ ६ लाख रुपए खर्च किए गए। ७९ प्रस्तावित कार्यों में से सिर्फ २८ पूरे हुए।
-धाराशिव के सांसद ओमराजे निंबालकर को १८ करोड़ ५ लाख रुपए की निधि मिली, लेकिन केवल १ करोड़ ९७ लाख रुपए ही खर्च किए गए। १३० प्रस्तावित कार्यों में से मात्र २१ कार्य पूरे हो पाए।
