पिया परदेसी!

देख सखी अम्बर में
कारे-कारे बदरा जल भर लाए।
देख-देख मोरा मन हर्षाए।
सुरभित शीतल पवन के झोंकों से
तन-मन कुसुमित होता जाए।
सूखी दूब, मुदित कलियां खिलती जाएं।
देख सखी अम्बर पर कारे मेघा घिर आए।

पड़न लगी शीतल फुहारें,
अविरल जलधारा बरसी जाए।
व्योम में दमक रही दामिनी,
कड़क-कड़क सबको डरवाए।
मोरा कोमल मनवा घबराए।
देख सखी अम्बर में काले बदरवा छाए,
मोरे मन की पीड़ा बढ़ती जाए।

नयनन बरसे अश्रुजल,
विरहा ताप से जलते तन-मन का
ताप बढ़ाता जाए।
देख सखी आषाढ़ के काले बदरा छाए।

मोरी अटरिया कागा न बोले,
फिर क्यों कुहुके कोयल काली।
पीहु-पीहू बोल पपीहा सारी रात जगाए।
दादुर, मोर, झींगुर के बदले दिन।
मेरे पिया क्यों रूठे मुझसे,
सौतन ने डाले डोरे कैसे।
मृदुल प्रेम से छलके मेरा मन।
देखो मेघा भी जमकर जल बरसाए।

आजा साजन, अब के सावन
मेरा मन प्यासा न रह जाए।
पिया परदेसी घर आवन की सुध राख्यो,
अब और विरहा सहा न जाए।

बेला विरदी

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