मनोज श्रीवास्तव / लखनऊ
यूपी भाजपा की नई टीम से पूरे उत्तर प्रदेश में नया उत्साह आ गया। लेकिन ऐसा भी कहा जा रहा है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने जो टीम दी, उसमें क्षेत्रीय संतुलन का वाट लगा दिया है। गोरखपुर, गाजीपुर, बाराबंकी, आजमगढ़ से तीन-तीन पदाधिकारी दे दिए, तो कई प्रशासनिक मंडलों व बड़ी संख्या में जिलों का प्रतिनिधित्व गोल कर दिया। खैर, सबसे पहले राजधानी लखनऊ में नई टीम बनने के बाद जो उफान आया है, उस पर चर्चा कर लें। यहां भाजपा की ओर से सबसे ज्यादा सक्रिय रहने वाले उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और वरिष्ठ नेता से प्रदेश उपाध्यक्ष बने नीरज सिंह पर दिखने लगा है। राजधानी में राजनीतिक सत्ता का एक और पावर सेंटर स्थापित हो गया। नई टीम में प्रदेश महामंत्री बनने के बाद अभिजात मिश्र का दबदबा बढ़ गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क से सामाजिक सक्रियता आरंभ करने वाले अभिजात मिश्र की पहचान हिंदुत्व के सर्वस्पर्शी सिद्धांत पर फली-बढ़ी है। उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में वरिष्ठ प्रचारकों के एक वर्ग का सीमातोड़ समर्थन प्राप्त रहा। समाज के वंचित वर्ग, मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग के अलग-अलग रहन-सहन की विविधता के बीच सबमें अद्भुत समन्वय स्थापित रखने की कला संघ की शाखाओं से मिली। जहां हिंदू पीड़ित रहा, वहां अभिजात मिश्र की उपस्थिति ही उनको अलग बनाती है। स्कूल-कॉलेज हो या मेडिकल कॉलेज, फलमंडी का सोनकर समाज हो, मजदूर मंडी के दलित, वंचित व मेहनतकश हों या फिर व्यापार मंडी के धनाढ्य व्यापारी, सबके बीच गहरे और सघन संपर्क को अभिजात ने अपनी ताकत बनाई है। चर्चा में कैसे रहना है, इसके लिए उन्हें कोई पीआर एजेंसी हायर करने की जरूरत नहीं है। फिर भी लखनऊ में राजनीतिक भाजपा के लिए आज भी यह विडंबना बनी हुई है कि पूर्व राज्यपाल लालजी टंडन उपाख्य बाबूजी के स्वर्गवास के बाद लखनऊ को टुकड़े-टुकड़े में कई मददगार मिले, लेकिन लखनऊ का मूल निवासी एक स्थायी मददगार नहीं मिल सका। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का लोकसभा क्षेत्र होने के बाद भी बिना भेदभाव के सबकी बात सुनने, सबके लिए दो कदम चलने की जो उनकी क्षमता थी, वैसी किसी में नहीं है। व्यवहार-कुशलता की उनकी अपनी शैली के कारण जितना समाज के अंतिम व्यक्ति से उनका लगाव था, उससे ज्यादा नौकरशाही में दबदबा था। दल तोड़कर, दिल की खटास भूलकर मदद के लिए उनकी उपलब्धता के कारण लोकप्रियता में आज भी कोई उनके इर्द-गिर्द नहीं है।
बहुदलीय समाजसेवा का अनुभव रखने वाले उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक भाजपा में आने के बाद लाल जी टंडन की रिक्तता को भरने का हर उपक्रम अपनाने की लंबे समय तक कोशिश करते रहे, लेकिन हकीकत यह है कि दूसरी बार के विधायक पाठक जी तीसरा विधानसभा क्षेत्र तलाश रहे हैं। पार्टी के भीतर पाठक जी ने राजधानी में अटल जी के जन्मदिन पर बड़ा कार्यक्रम करके भाजपाइयों को पीछे ढकेल दिया। बिना नागा किए रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के लखनऊ आगमन पर हवाई अड्डे पर स्वागत करने से लेकर उनके प्रस्थान तक किसी भी मूल भाजपाई से ज्यादा समर्पित दिखते हैं। वह इस बार जिस कैंट विधानसभा से विधायक हैं, नवनियुक्त प्रदेश महामंत्री अभिजात मिश्र इसी कैंट विधानसभा के पुराने दावेदार हैं। प्रदेश महामंत्री होने के बाद विधानसभा क्षेत्र हो व प्रदेश की राजनीति, मिश्र का दबदबा बढ़ेगा। उससे ज्यादा हौसला संघ परिवार में बैठे उनके मददगारों का है, जो बार-बार उनके सुर्खियों में आने के बाद भी अपना अटूट आशीर्वाद बनाए रहे हैं। इसमें संघ में सक्रिय कई बड़े प्रचारक हों या पार्टी के भीतर बैठे जिम्मेदार लोग। यह वर्ग अमूमन मुखर लोगों से दूरी बनाकर रहता है। पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा की चर्चा के बिना लखनऊ की वर्तमान राजनीति अधूरी रह जाएगी। अति सज्जनता की मूर्ति, न कभी शायद ही करते हों, हां कर दिए तो आपके साथ सजीव दिखें, यह अपेक्षा न करिए। वह निराकार अर्थात बिना आपको पीछे-पीछे घुमाए ही आपको परिणाम दे सकते हैं। उनके जांच अधिकारी टाइप सवालों से आप घबराएं नहीं, तो सफलता आपकी होकर रहेगी। आज के सामाजिक जीवन में ज्यादातर लोगों को वचन से ही राहत देकर संतुष्ट कर देना उनका मुख्य हथियार है, जबकि ब्रजेश पाठक किसी भी पीड़ित के लिए तत्काल फोन करने और पत्र लिखने का अपना ही रिकॉर्ड बार-बार तोड़ते हैं।
लखनऊ में सबके लिए 24 घंटे जिसका घर खुला रहता है, वह राजीव मिश्रा का है। पार्टी के बड़े नेता हों या छोटे, राजीव मिश्रा की जनसेवा व उनकी मृदुता सबको बौना बना देती है। पार्टी की ओर से बिना किसी प्रभावी पद के जनता और पीड़ित जितनी संतुष्टि राजीव मिश्रा के दरवाजे से लेकर निकलते हैं, उतनी शायद ही किसी और के यहां दिखती हो। राजीव मिश्रा के साथ कभी गुंडों-बदमाशों का काफिला भी सक्रिय नहीं दिखा। इस कारण हर कोई निर्भय होकर वहां अपनी पहुंच बना लेता है। शैक्षणिक कार्य हो या प्रशासनिक, स्वास्थ्य सेवा या शादी-विवाह, टंडन युग के बाद देश के कोने-कोने से लखनऊ आने वाले नेताओं के लिए सबसे विश्वसनीय नाम राजीव मिश्रा हैं। बाकी यह लखनऊ है। यहां के धनाढ्य व्यापारिक परिवार, सत्ता किसी की भी हो, हर दल में दखल रखते हैं। शालीमार डेवलपर संजय सेठ, पूर्व मुख्यमंत्री बनारसी दास के पोते विराज दास और सुधीर हलवासिया भी सत्ता में शक्ति केंद्र के निकट रहना ही पसंद करते हैं। इन धनाढ्यों की स्टाइल और धमक अलग ही रहती है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के छोटे पुत्र नीरज सिंह जब से लखनऊ की ओर रुख किए, यहां की राजनीति में सक्रिय हुए, तब से न जाने कितने लोग विलुप्त हो गए। नीरज सिंह अल्प समय में अपने कठिन परिश्रम से पार्टी के वरिष्ठ नेता बन गए। लखनऊ भाजपा में युवाओं की सबसे बड़ी फौज उन्हीं के पास है। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक लगभग उतना ही शिष्टाचार निभाते हैं, जितना अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ निभाते हैं। लखनऊ की राजनीति की बात हो और टंडन जी की भूमिका तथा उनके परिजनों की सक्रियता की बात न हो, तो सब अधूरा रह जाएगा। पूर्व कैबिनेट मंत्री उनके बड़े पुत्र आशुतोष टंडन के निधन के बाद उनके सबसे छोटे पुत्र अमित टंडन उपाख्य कल्लू भइया राजनीति में पिता जी की विरासत संभाल रहे हैं। सरल और सीधे हैं। रक्तजनित संस्कारों की वजह से आतिथ्य पक्ष बहुत प्रबल है। सीधे इतने कि अभी भी राजनीतिक मक्कारी से बहुत दूर हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हों या संघ और पार्टी के वरिष्ठजन, सबको यथोचित सम्मान तो दे लेते हैं। सब लोग उन्हें स्नेह भी देते हैं, लेकिन सम्मान और समर्पण का नाटक न कर पाने के कारण अभी तक उस स्थान तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिसके वास्तव में वह हकदार हैं। राजेश्वर सिंह, नीरज बोरा और ओपी श्रीवास्तव नेता कम, विधायक बनने को सार्थक करने में लगे रहते हैं। राजेश्वर सिंह समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी प्रशासनिक प्रोफाइल का जलवा दिखाते रहते हैं। राजधानी होने से यहां योगी आदित्यनाथ जैसे ताकतवर मुख्यमंत्री और स्थानीय सांसद व रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति से मन मसोसकर रह जाते हैं। संस्कृति कार्यक्रम करवाकर चर्चा में रहना और जनहित में सक्रिय रहकर चर्चा में रहना, वह दोनों कर लेते हैं। नीरज बोरा विकास कार्यों पर इतना ध्यान देते हैं कि पिछले दिनों जानकीपुरम चौराहे और एकेटीयू इंजीनियरिंग कॉलेज के निकट रोडवेज की जमीन पर भी विकास की योजना को मूर्त रूप देना चाहते थे, किंतु समय रहते परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने उसके विकास की विभागीय मंशा प्रकट कर दी। उपचुनाव से पूर्वी विधानसभा क्षेत्र के विधायक बने ओपी श्रीवास्तव उप से उपयुक्त होने के लिए आज भी संघर्षरत हैं। हर दिन वहां यही खबर आती है कि अगला चुनाव यहां से रक्षामंत्री के दूसरे पुत्र व उत्तर प्रदेश भाजपा के नवनियुक्त उपाध्यक्ष नीरज सिंह, पूर्व उपमुख्यमंत्री व राज्यसभा सांसद डॉ. दिनेश शर्मा तथा लखनऊ कैंट सीट से विधायक व उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक इसी पूर्वी विधानसभा सीट से अगला विधानसभा चुनाव लड़ेंगे।
