दो बोल मीठे…।

कभी भी बोलचाल बंद व तेवर तीखे मत करना,
संवाद में जब कठोरता व नफरत पनपती है,
तो गलत बातों का शोर हमें जल्दी सुनाई देता है।
इसलिए हमें सिर्फ दो बोल मीठे ही बोलना चाहिए।

आज-कल तू-तू, मैं-मैं में विश्वास टूटते हुए देखा है हमने।
किसी को ‘अच्छा’ बोलना ठीक नहीं लगता है आज-कल।
अब विष पीकर भी नकारात्मकता खत्म नहीं होती है।
बातें नई हों या पुरानी, दो बोल मीठे बहुत जरूरी हैं।

पर बोल कड़वे हों, तो बिखर जाते हैं सारे रिश्ते-नाते,
क्योंकि दो बोल प्यार के अनमोल होते हैं संसार में।
यह याद रखना है, ‘अच्छाई’ में हमें बुराई को नहीं पनपने देना है,
क्योंकि हमें सिर्फ दो बोल मीठे हमेशा बोलना है॥

स्वतंत्र लेखक- हरिहर सिंह चौहान
जबरी बाग, नसिया, इन्दौर, मध्य प्रदेश

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