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टीईटी पेपर लीक … २५ साल पुराने अंतरराज्यीय गिरोह की तलाश! बिहार का कथित सरगना फरार

सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी-२०२६ का प्रश्नपत्र लीक होने की जांच अब एक बड़े अंतरराज्यीय परीक्षा माफिया तक पहुंचती दिखाई दे रही है। पुलिस ने बिहार निवासी बिजेंद्र गुप्ता को कथित मुख्य सूत्रधार के रूप में चिह्नित किया है। जांच एजेंसियों को संदेह है कि वह लगभग २५ वर्षों से विभिन्न राज्यों की प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक करानेवाले नेटवर्क से जुड़ा रहा है। हालांकि, उसके विरुद्ध आरोप अभी जांच के स्तर पर हैं और गिरफ्तारी के बाद ही उसकी भूमिका का विस्तृत परीक्षण हो सकेगा।
भिवंडी पुलिस ने अब तक बिहार के राजीव शॉ और आकाश कुमार तथा हरियाणा के धीरज सिंह को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, उनके पास से मोबाइल फोन, नकदी और टीईटी प्रश्नपत्रों के चार सेट बरामद हुए। आरोपियों को कथित रूप से डेढ़ करोड़ रुपए में प्रश्नपत्र बेचने की तैयारी करते समय पकड़ा गया था। परीक्षा २८ जून को १,०२८ केंद्रों पर आयोजित होनी थी, लेकिन कार्रवाई के बाद उसे स्थगित कर दिया गया। जांच का दायरा बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा तक बढ़ाया गया है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि प्रश्नपत्र मूल रूप से कहां से बाहर आया, दिल्ली से ठाणे तक वैâसे पहुंचा और इस शृंखला में किन एजेंटों, प्रिंटिंग प्रेस कर्मचारियों, परिवहन ठेकेदारों अथवा परीक्षा तंत्र से जुड़े लोगों की भूमिका रही। प्रारंभिक संदेह है कि प्रश्नपत्र उत्तर प्रदेश की प्रिंटिंग इकाई से महाराष्ट्र के परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने के दौरान लीक हुआ। मुख्य आरोपी की पत्नी को बिहार से हिरासत में लिए जाने से जांच को नए सुराग मिलने की संभावना है। पुलिस मोबाइल कॉल, डिजिटल संदेश, बैंक खातों और पूर्व परीक्षाओं से जुड़े संपर्कों का विश्लेषण कर रही है। मामले की सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह केवल तीन स्थानीय दलालों की करतूत नहीं, बल्कि लंबे समय से सक्रिय संगठित नेटवर्क हो सकता है।

पूरी भर्ती और परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल
यदि २५ वर्षों से ऐसा गिरोह अलग-अलग राज्यों की परीक्षाओं में सेंध लगाता रहा तो प्रश्न केवल टीईटी की सुरक्षा का नहीं, बल्कि देश की पूरी भर्ती और परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का है। सरकार ने विशेष जांच दल गठित किया है और संगठित अपराध कानून के प्रयोग पर भी विचार हो रहा है, लेकिन असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब प्रश्नपत्र के मूल स्रोत, सरकारी अथवा निजी मिलीभगत और पूरे आर्थिक नेटवर्क का खुलासा हो, न कि जांच केवल निचले स्तर के एजेंटों की गिरफ्तारी पर समाप्त हो जाए।

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