विशेष प्रतिनिधि / मुंबई
महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र के अंतिम दिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने किसानों के लिए 50 हजार रुपये की सीमा बढ़ाकर 2 लाख रुपये तक कर्जमाफी और 2026-27 का कर्ज चुकाने की शर्त हटाने का एलान किया। सरकार इसे “ऐतिहासिक फैसला” बता रही है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर यह शर्त किसानों के हित में नहीं थी, तो आखिर लगाई ही क्यों गई थी?
सरकार अब कह रही है कि किसानों के व्यापक हित को देखते हुए नियम बदला गया। लेकिन विपक्ष पूछ रहा है कि क्या किसानों को पहले अनावश्यक रूप से योजनाओं से बाहर रखा गया था? यदि लाखों किसान पहले से पात्र थे, तो उन्हें राहत देने में इतनी देर क्यों की गई?
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार 2029 तक भी इंतजार कर सकती थी, लेकिन उसने अभी फैसला लिया। विपक्ष का पलटवार है कि अगर सरकार सचमुच किसानों के प्रति संवेदनशील थी, तो चुनावी वादे के तुरंत बाद निर्णय क्यों नहीं लिया गया? किसानों को महीनों तक इंतजार क्यों कराया गया?
सरकार का दावा है कि 95 प्रतिशत किसानों ने समय पर कर्ज चुकाया। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि जब अधिकांश किसानों ने ईमानदारी से भुगतान किया, तब बाकी किसानों को दंडित करने वाली शर्त लगाने की जरूरत क्या थी?
महायुति सरकार हर साल 25 हजार करोड़ रुपये की बिजली सब्सिडी देने का दावा करती है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि सब्सिडी और घोषणाओं से ज्यादा जरूरी किसानों की आय बढ़ाना, फसलों को उचित दाम दिलाना और कर्ज के दुष्चक्र से स्थायी मुक्ति दिलाना है।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार हर बार बड़ी-बड़ी घोषणाएं करती है, लेकिन किसानों की आत्महत्याएं, बढ़ती उत्पादन लागत, सिंचाई की समस्याएं और बाजार में फसलों के गिरते दाम जैसे मूल मुद्दे आज भी जस के तस हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह फैसला किसानों की स्थायी आर्थिक मजबूती की दिशा में उठाया गया कदम है, या फिर राजनीतिक दबाव और जनाक्रोश के बाद लिया गया एक और चुनावी फैसला?
किसानों को राहत मिलना स्वागतयोग्य है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि सरकार बताए—जो शर्तें आज हटाई जा रही हैं, उनका खामियाजा अब तक किसानों ने क्यों भुगता?
