-‘जब देश का अंतरिक्ष सपना निजी कंपनियों की ऊंची तनख्वाह और सरकारी व्यवस्था के बीच फंस जाए’
के.पी. मलिक
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम केवल विज्ञान की उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास की कहानी भी है। सीमित संसाधनों में चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य-एल१ और गगनयान जैसे महत्वाकांक्षी अभियानों ने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने दशकों तक यह साबित किया कि प्रतिभा केवल धन से नहीं, बल्कि दृष्टि, समर्पण और वैज्ञानिक संस्कृति से भी महान उपलब्धियां हासिल कर सकती है। लेकिन यदि यही संस्था अपने अनुभवी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को तेजी से खोने लगे तो यह केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीतिक चिंता का विषय बन जाता है।
हाल के समय में यह खबर चर्चा में रही कि बड़ी संख्या में वैज्ञानिक और इंजीनियर इसरो छोड़कर निजी क्षेत्र का रुख कर रहे हैं। इसके बाद अंतरिक्ष विभाग द्वारा विशेषकर गगनयान जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं से जुड़े वैज्ञानिकों के इस्तीफे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) के नियमों को अधिक सख्त किए जाने की खबरों ने इस बहस को और तेज कर दिया। यदि किसी संस्था को अपने विशेषज्ञों के बाहर जाने से रोकने के लिए नियम कठोर करने पड़ें, तो पहला सवाल यही उठता है कि समस्या लोगों के जाने में है या उन्हें रोक पाने में असफल व्यवस्था में?
भारत आज एक नए अंतरिक्ष युग में प्रवेश कर चुका है। लंबे समय तक अंतरिक्ष गतिविधियां लगभग पूरी तरह इसरो के हाथों में थीं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के द्वार खोल दिए हैं। घ्र्-एझ्Aण की स्थापना, अंतरिक्ष क्षेत्र में उदारीकरण और निजी कंपनियों के प्रवेश ने एक नया औद्योगिक वातावरण तैयार किया है।
आज अनेक भारतीय स्टार्टअप और निजी कंपनियां उपग्रह, प्रक्षेपण तकनीक, प्रणोदन प्रणाली और अंतरिक्ष अनुप्रयोगों पर काम कर रही हैं। यह परिवर्तन भारत के लिए सकारात्मक है, क्योंकि इससे नवाचार, निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
लेकिन इसी परिवर्तन का दूसरा पक्ष भी है। निजी कंपनियां अधिक वेतन, तेज पदोन्नति, आधुनिक कार्य-संस्कृति और आकर्षक शोध अवसर प्रदान कर रही हैं। दूसरी ओर इसरो अभी भी पारंपरिक सरकारी सेवा ढांचे में काम करता है, जहां वेतन संरचना, पदोन्नति और प्रशासनिक प्रक्रियाएं अपेक्षाकृत धीमी हैं। परिणामस्वरूप जिन वैज्ञानिकों ने वर्षों तक इसरो में अत्यंत विशिष्ट तकनीकी अनुभव अर्जित किया, वे अब निजी क्षेत्र के लिए सबसे मूल्यवान संसाधन बन गए हैं।
यहीं से वास्तविक चुनौती शुरू होती है। यह केवल नौकरी बदलने का मामला नहीं है। अंतरिक्ष विज्ञान में वर्षों का अनुभव किसी पाठ्यपुस्तक से नहीं मिलता। एक प्रक्षेपण यान की डिजाइन, क्रायोजेनिक इंजन, मानव अंतरिक्ष उड़ान, डीप स्पेस मिशन या जटिल मिशन प्रबंधन जैसी विशेषज्ञता दशकों के अनुभव से विकसित होती है। यदि ऐसे अनुभवी वैज्ञानिक बड़ी संख्या में संस्था छोड़ते हैं तो उनकी जगह नए लोगों की भर्ती कर देना समाधान नहीं हो सकता। अनुभव का स्थान केवल समय और प्रशिक्षण से ही भरता है।
यद्यपि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस स्थिति को अतिरंजित निष्कर्षों तक न ले जाया जाए। किसी भी बड़े वैज्ञानिक संगठन में समय-समय पर वैज्ञानिकों का निजी क्षेत्र में जाना एक सामान्य प्रक्रिया भी हो सकती है। यदि भारत का निजी अंतरिक्ष उद्योग मजबूत हो रहा है तो स्वाभाविक है कि इसरो में प्रशिक्षित विशेषज्ञ वहां भी योगदान देंगे। यह प्रतिभा का राष्ट्रीय स्तर पर प्रसार भी माना जा सकता है। इसलिए प्रत्येक इस्तीफे को ‘ब्रेन ड्रेन’ कहना उचित नहीं होगा। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या इसरो अपनी महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए आवश्यक अनुभवी प्रतिभा को पर्याप्त मात्रा में बनाए रख पा रहा है?
सरकार की प्रतिक्रिया इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि उसने रणनीतिक परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारियों के लिए नियमों को अधिक नियंत्रित बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं। लेकिन केवल नियम कठोर कर देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। किसी वैज्ञानिक को संस्था में बनाए रखने का सबसे प्रभावी तरीका प्रतिबंध नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण है जिसमें उसे सम्मान, शोध की स्वतंत्रता, प्रतिस्पर्धी वेतन, आधुनिक प्रयोगशालाएं और स्पष्ट करियर का विकास दिखाई दे।
भारत यदि वास्तव में २०४७ तक वैश्विक विज्ञान और प्रौद्योगिकी महाशक्ति बनने का लक्ष्य रखता है, तो उसे अपने वैज्ञानिकों के साथ वही व्यवहार करना होगा, जो विकसित देश अपनी प्रतिभाओं के साथ करते हैं। प्रतिभा केवल राष्ट्रभक्ति के भरोसे लंबे समय तक नहीं टिकती। वैज्ञानिक भी अपने परिवार, आर्थिक सुरक्षा, पेशेवर सम्मान और बेहतर भविष्य के बारे में सोचते हैं। यदि निजी क्षेत्र ये सभी अवसर प्रदान करेगा और सरकारी संस्थाएं नहीं, तो प्रतिभा का स्थानांतरण स्वाभाविक होगा।
यह भी विचारणीय है कि इसरो और निजी अंतरिक्ष उद्योग को प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं बल्कि साझेदार के रूप में देखा जाए। विश्व के अनेक देशों में सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियां और निजी कंपनियां मिलकर काम करती हैं। अमेरिका में नासा और निजी कंपनियों के बीच सहयोग इसका प्रमुख उदाहरण है। भारत में भी इसरो को मूलभूत अनुसंधान, रणनीतिक मिशनों और दीर्घकालिक तकनीकी विकास पर केंद्रित रहना चाहिए, जबकि निजी क्षेत्र वाणिज्यिक अवसरों और नवाचार को आगे बढ़ा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिकों के आदान-प्रदान, संयुक्त परियोजनाओं और लचीले सेवा मॉडल पर भी विचार किया जा सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बहस को केवल ‘वैज्ञानिक नौकरी छोड़ रहे हैं’ जैसे संकुचित दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारत की वैज्ञानिक नीति, मानव संसाधन प्रबंधन और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा से जुड़ा प्रश्न है। यदि देश अपने सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों को प्रेरित और संतुष्ट नहीं रख पाएगा तो अंतरिक्ष कार्यक्रम ही नहीं, रक्षा, परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उच्च प्रौद्योगिकी के अन्य क्षेत्रों पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा।
बहरहाल, भारत ने अंतरिक्ष में अपनी पहचान वैज्ञानिक प्रतिभा के बल पर बनाई है, न कि केवल बजट के दम पर। इसलिए इसरो के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती रॉकेट बनाना नहीं, बल्कि उन लोगों को बनाए रखना है जो रॉकेट बनाते हैं। वैज्ञानिकों को रोकने के लिए नियमों की दीवारें खड़ी करने से अधिक आवश्यक है, अवसरों का ऐसा पुल बनाना, जिस पर चलकर वे यह महसूस कर सकें कि उनका भविष्य, उनका सम्मान और उनके सपने इसरो के साथ अधिक सुरक्षित हैं। दरअसल, किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसके वैज्ञानिक होते हैं। यदि वे संस्था छोड़ रहे हैं तो केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि वे क्यों जा रहे हैं; उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह पूछना होगा कि उन्हें रुकने के लिए हमने क्या दिया। यही प्रश्न भारत के अंतरिक्ष भविष्य की दिशा तय करेगा।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)
