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हनीफनामा :  एक बदलाव रचा इतिहास… संगीतकार ओ. पी. नैयर ने दिखाया था अपना जौहर

हनीफ जवेरी

रचनात्मक काम में कई बार ऐसा होता है कि रचनाकार अपनी प्रतिभा के बल पर कुछ रचता है, लेकिन अंतिम क्षण में मजबूरीवश उसे अपनी मेहनत पर पानी फेरकर कुछ नया रचना पड़ता है और वही नई रचना उसे सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचा देती है।
ऐसा ही कुछ संगीतकार ओ. पी. नैयर को अपनी फिल्म ‘एक मुसाफिर एक हसीना’ के एक गीत के लिए करना पड़ा।
घटना कुछ यूं हुई कि उन्होंने अत्यंत मेहनत से गीत ‘मैं प्यार का राही हूं, तेरी जुल्फ के साए में कुछ देर ठहर जाऊं’ की धुन तैयार की थी। इस धुन में तबला, ढोलक, ड्रम आदि ताल वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया गया था। गीत को तैयार करने में एक सप्ताह से अधिक का समय लगा। लेकिन जब इस गीत की रिकॉर्डिंग होने वाली थी, तब ताल वाद्ययंत्र बजाने वाले संगीतकारों के आने में देरी हो गई। समय के पाबंद और अपने तेज स्वभाव के लिए प्रसिद्ध नैयर ने उनके बिना ही गीत रिकॉर्ड करने का निर्णय लिया और स्टूडियो के गेटकीपर को निर्देश दिया कि जब वे संगीतकार आएं तो उन्हें भीतर प्रवेश न करने दिया जाए।
परिणामस्वरूप, सीमित वाद्ययंत्रों के साथ ही गीत रिकॉर्ड कर लिया गया और इसके बावजूद यह गीत जबरदस्त रूप से लोकप्रिय हुआ।
संगीतकार ओ. पी. नैयर अपने काम के प्रति ईमानदार थे और वे किसी के मोहताज नहीं थे। जिस दौर में लता मंगेशकर के बिना कोई भी संगीतकार एक कदम आगे बढ़ने का साहस नहीं करता था, उस समय नैयर एकमात्र ऐसे संगीतकार रहे जिन्होंने लता से अधिक महत्व उनकी बहन आशा भोसले को दिया और आशा भोसले के साथ उन्होंने विभिन्न फिल्मों के लिए कई सुपरहिट गीत रिकॉर्ड किए और इस तरह श्रेष्ठ संगीतकारों की सूची में अपना नाम दर्ज कराया।
फिल्म ‘एक मुसाफिर एक हसीना’ में तो साजिंदों के कारण संगीत वाद्य यंत्रों का प्रयोग कम किया गया था, लेकिन राज कपूर की सुपरहिट फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ के एक गीत की धुन ही अंतिम क्षणों में बदल दी गई थी। यह काम किसी और ने नहीं, बल्कि स्वयं राज कपूर ने किया था और संगीतकार रवींद्र जैन को इस पर कोई आपत्ति भी नहीं हुई।
उस जमाने में आर.के. बैनर किसी ब्रांड से कम नहीं था। इस बैनर के तहत काम मिलना अपने आप में एक बड़ी बात मानी जाती थी! संगीतकार शंकर–जयकिशन के बाद लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल को आर.के. फिल्म्स की फिल्मों को अपने संगीत से संवारने का अवसर मिला। ‘बॉबी’ के बाद फिल्म ‘प्रेम रोग’ का संगीत भी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल द्वारा दिया गया और वह जबरदस्त हिट साबित हुआ। लेकिन राज कपूर ने अपनी अगली फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ के लिए संगीतकार रवींद्र जैन को अवसर दिया। अब जैन के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती थी कि वे इस फिल्म का संगीत ऐसा दें जो शंकर–जयकिशन और लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल के संगीत के स्तर का हो।
सुन सइबा सुन… को भी मिली थी अपार सफलता
राज कपूर ने ज्यादातर गीत रवींद्र जैन से ही लिखवाए, लेकिन एक गीत हसरत और एक अमीर कजलबाश से लिखवाया।
राज कपूर की फिल्म को अहमियत देने के लिए उन्होंने लगभग तीन फिल्में भी छोड़ दीं। वे बेहद मेहनत करते थे और धुन बनाते ही उसे मंजूरी के लिए राज कपूर को सुनाते थे। एक ही गीत के लिए उन्होंने कई-कई धुनें तैयार की थीं।
अब जब राज कपूर की स्वीकृति के बाद गीत की रिकॉर्डिंग का समय आया, तो राज रिकॉर्डिंग रूम में पहुंचते ही स्वयं हसरत जयपुरी के लिखे मुखड़े की धुन बदल बैठे। और ‘सुन सइबा सुन, प्यार की धुन, ओ मैंने तुझे चुन लिया, तू भी मुझे चुन…’ गाकर सुनाया। इस तरह जैन द्वारा पहले से बनाई गई धुन बदल दी गई। फिल्म के रिलीज होने के बाद यह गीत जबरदस्त रूप से सफल हुआ।

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