-विश्वगुरु का दंभ भरने वाले देश में २ करोड़ बच्चे स्कूलों की दहलीज तक नहीं पहुंचे
-सरकार की ही संस्था नीति आयोग के आंकड़ों ने खोली पोल
अरुण कुमार गुप्ता
इ स देश की पूरी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को व्यवस्थित ढंग से कमजोर किया गया है। नई शिक्षा नीति-२०२० को लागू करने की प्रक्रिया में लगभग सभी विश्वविद्यालयों में फीस बढ़ाई गई है। विश्वविद्यालयों की आधारभूत समस्याओं के समाधान के बजाय सरकार यह कह रही है कि अब वह उच्च शिक्षा पर पर्याप्त सार्वजनिक व्यय नहीं करेगी और विश्वविद्यालय अपने खर्च स्वयं वहन करें। यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था से अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह समाप्त करना चाहती है।
पिछले १२ वर्षों से बीजेपी केंद्र की सत्ता में है और अनेक राज्यों में भी उसकी सरकारें हैं। सरकार की ही संस्था नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दस वर्षों में ९४ हजार से अधिक सार्वजनिक विद्यालय बंद कर दिए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप प्रवेश दर में काफी गिरावट दर्ज की गई है। इस मामले में ‘डबल इंजन’ सरकारों वाले उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्य सबसे आगे रहे हैं। पूरे देश में पिछले पांच वर्षों के दौरान लगभग ६५ लाख बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि आज भी लगभग दो करोड़ बच्चे स्कूलों की दहलीज तक नहीं पहुंचे हैं। यह स्थिति उस समय की है, जब हम स्वयं को ‘विश्वगुरु’ कहने का दावा करते हैं। पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और मंगल ग्रह तक पहुंचने की उपलब्धियों का दावा करने वाले इस देश में शिक्षा के साथ किस प्रकार का खिलवाड़ हो रहा है, इसका अनुमान देश में शिक्षा व्यवस्था की इतनी बदतर स्थिति के आंकड़ों से सहज लगाया जा सकता है।
आगे भी आंदोलन की जरूरत
उधर मोदी सरकार की अकरमण्यता की वजह से निजी शिक्षण संस्थाएं कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रहीं हैं। निजी शिक्षण संस्थाएं कभी डोनेशन के नाम पर तो कभी टर्म फीस और मनमानी फीस से बच्चों के अभिभावकों की कमर तोड़ रही हैं। आखिर यह देश में कब तक चलता रहेगा। हां, एक बात और जो निजी शिक्षण संस्थाएं हैं, ज्यादातर नेताओं या फिर नेताओं से जुड़े लोगों की हैं। दरअसल, शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कॉकरोच यानी जेन-जी की लड़ाई केवल नीट तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
