मुख्यपृष्ठटॉप समाचारउद्धव ठाकरे का ‘धमाकेदार' साक्षात्कार...धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा!..जनता ही विष्णु का अवतार!

उद्धव ठाकरे का ‘धमाकेदार’ साक्षात्कार…धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा!..जनता ही विष्णु का अवतार!

`जंतर-मंतर के आंदोलन ने देश को क्या दिया? लोगों के मन से मोदी-शाह की बंदूकों और जेल का डर खत्म हो गया। लोग निडर होकर सड़कों पर उतर आए और सरकार पीछे हट गई। अब डर मोदी-शाह को लग रहा होगा।’

संजय राऊत

शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे का अत्यंत विस्फोटक साक्षात्कार आज प्रकाशन के लिए जा ही रहा था कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रधान के इस्तीफे की खबर आ गई। ‘प्रधान को इस्तीफा देना ही पड़ेगा। जनता सड़कों पर उतर आई है, वही विष्णु का अवतार है,’ इस प्रकार गरजने वाले उद्धव ठाकरे की भविष्यवाणी सच साबित हुई। उद्धव ठाकरे ने २४ घंटे पहले ‘सामना’ को विशेष साक्षात्कार दिया था। वे दिल्ली में ‘जंतर-मंतर’ पर गए, उन्होंने महाराष्ट्र के आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्होंने केंद्र सरकार को चेतावनी दी और मोदी सरकार को झुकना पड़ा! मोदी सरकार झुक गई!!
देश में कल तक भयानक शांति थी। इतनी शांति कि यह देखकर संदेह हो रहा था कि जीवतंता बची भी है या नहीं? ऐसा माहौल बना हुआ था, जिसे हम तूफान से पहले की शांति कह सकते हैं। लेकिन अचानक इस देश में एक ऐसा तूफान आया और उस तूफान का केंद्र बिंदु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के घर से महज आधा किलोमीटर दूर स्थित ‘जंतर-मंतर’ था। वह देश के युवाओं के विद्रोह का केंद्र बन गया, आक्रोश का केंद्र बन गया और इस तूफान की वजह से आज पूरा देश उद्वेलित हो उठा है, भड़क उठा है। इस तूफान के आगे देश में खुद को ‘चाणक्य’ कहनेवाले नेता और ‘विष्णु का अवतार’ बतानेवाले नेता भी निष्प्रभ साबित हुए।
इसी के साथ दूसरा एक तूफान भी खड़ा हुआ, जो था अयोध्या के राम मंदिर में हुई लूट का। राम मंदिर की लूट का विषय भी उतना ही गंभीर है। इन दोनों ही मुद्दों में जिन्होंने पहले दिन से हिस्सा लिया, सक्रिय रहे और दोनों ही लक्ष्यों को ताकत दी, वे एकमात्र नेता हैं, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे।
शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे चार दिन पहले दिल्ली में थे। दिल्ली जाकर उन्होंने ‘जंतर-मंतर’ पर प्रदर्शनकारियों और घायलों से मुलाकात की। उनकी पीड़ा देखकर वे अत्यंत व्यथित हुए और आक्रोशित भी। मुंबई वापस आने के बाद उन्होंने ‘सामना’ को एक धमाकेदार इंटरव्यू दिया। जंतर-मंतर से लेकर अयोध्या तक फैली यह एक ऐसी ही विस्तृत बातचीत…
-उद्धव जी, कल आप देश की राजधानी दिल्ली में थे। हर नेता दिल्ली से भारत को अपने नजरिए से देखता है। आपने वास्तव में वहां क्या देखा?
क्या बचा है देखने लायक? पिछले बारह वर्षों से देश जो झेलता आ रहा है, उसे देखते हुए देश के साथ धोखाधड़ी हुई है। हर बार देश अच्छी चीजों के लिए मतदान करता है। २०१४ से लेकर अब तक देश को केवल प्रलोभन ही दिए गए हैं, लेकिन वास्तव में हाथ कुछ नहीं आया। आपने जो अभी कहा कि यह जो आक्रोश है, यह केवल नीट परीक्षा के पेपर लीक का नहीं है, बल्कि यह आक्रोश पिछले दस से बारह वर्षों में इस देश के साथ जो धोखा हुआ है, उस असंतोष का है। यह असंतोष बेहद तीव्र है।
– प्रधानमंत्री तो अवतारी पुरुष हैं। उन्हें क्या फर्क पड़ता है?
अब सच कहें तो जनता के रूप में विष्णु ने अवतार लिया है, ऐसा मैंने कल जंतर-मंतर पर देखा है। ये जो विष्णु है… देश बचाने के लिए… धर्म बचाने के लिए… धर्म का मतलब केवल हिंदू-मुसलमान नहीं है… इंसानियत का धर्म बचाने के लिए सड़कों पर उतरे ये युवा हैं। उनके साथ उनके माता-पिता और दादा-दादी भी हैं। यानी यह विष्णु का ही अवतार है। देश को बचाने के लिए ही इन्होंने जन्म लिया है।
– आपने दिल्ली में भी चिंता व्यक्त की कि दिल्ली की सड़कों पर जिसे हम ‘जेन जी’ कहते हैं, वह युवा बेहद आक्रोशित है…
कुछ लोग उन्हें तिलचट्टा कहते हैं, कॉकरोच कहते हैं… लेकिन उनका गुस्सा अब फूट पड़ा है।

अब जनता डर से आगे निकल गई है…सरकार ने तान रखी थीं डर की बंदूकें – उद्धव ठाकरे

-यह युवा वर्ग जिस तरह से दिल्ली की सड़कों पर आक्रोशित होकर घूम रहा था, भटक रहा था, पुलिस से संघर्ष कर रहा था… क्या वह सही है?
‘मुंबई से दिल्ली तक एक बात जो मैंने गौर की है, वह यह है कि जनता अब डर से आगे निकल गई है। अब तक सरकार ने डर की एक बंदूक उनके सिर पर तान रखी थी, उस बंदूक और उन बंधनों को तोड़कर, अपनी जान की परवाह किए बिना जनता सड़कों पर उतर आई है, क्यों नहीं उतरेगी?
– क्यों? आपको क्या लगा?
इसकी वजह यह है कि, २०१४ से भोली उम्मीद और मासूमियत में जिन्हें समर्थन दिया, उन्होंने ही पीठ में छुरा घोंपा है, ऐसी भावना जनता के मन में है। आप देखिए न… हर जगह नकारात्मकता ही है। क्या रोजगार मिल रहे हैं? नहीं… क्या महंगाई कम हो रही है? नहीं… क्या पेट्रोल के दाम कम हुए हैं? क्या गैस के दाम घटे हैं? नहीं… पेट्रोल में अब इथेनॉल की मिलावट होने लगी है, सड़कों पर गड्ढे हो रहे हैं, पुल गिर रहे हैं, पार्टियां तोड़ी जा रही हैं, दान पेटियां यानी राम मंदिर की दान पेटी फोड़ दी गई… लूट ली गई… पेपर लीक हो रहे हैं। यानी इस सरकार को किसी भी चीज की कोई परवाह नहीं है।
यानी यह सरकार विफल है?
‘पूरी तरह से… बिल्कुल पूरी तरह से… देश को बर्बाद कर दिया है।
-यह सरकार लुटेरों की भूमिका में है? आखिर आप कहना क्या चाहते हैं?
सरकार यानी आखिरकार क्या है? वह एक व्यवस्था है…
एक सिस्टम है… जिन्हें वह सिस्टम और व्यवस्था चलानी नहीं आती, ऐसे लोगों के हाथों में यह सरकार है। यह देश का दुर्भाग्य है और इसके खिलाफ आज जनता आक्रोशित है।
सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने में… लोग भड़क उठे हैं। खासतौर पर आपने मुंबई से शुरुआत की…
हां… मैं पहले दिन से ही उनके साथ खड़ा हूं। अब लड़नेवालों के साथ खड़े रहना ही पड़ेगा।
देश की युवा पीढ़ी अपने भविष्य के लिए सड़कों पर उतर आई है। इस देश की शिक्षा पद्धति और शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई है, क्या यह इस आंदोलन का मुख्य विचार या केंद्रबिंदु है?
यह एक सिलसिला है। पहली बात तो यह कि मुझे सही शिक्षा नहीं मिल रही है, यहां से इन युवाओं का गुस्सा शुरू हुआ। जो पढ़-लिख गया है, उसे नौकरी नहीं मिल रही है यह दूसरी बात है। नौकरी मिल भी जाए तो घर चलाने के लिए वेतन पूरा नहीं पड़ता, यह तीसरी बात है। उसके बाद मैं जिसे वोट दे रहा हूं, वह अपनी जगह पर टिका नहीं रहता… वही मुझे धोखा दे रहा है… उनका खुद का विकास हो रहा है, लेकिन मुझे रोजी-रोटी नहीं मिल रही है और उस पर जले पर नमक छिड़कने का काम इस तरह किया जा रहा है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश के डेढ़ सौ करोड़ लोगों में से ८० करोड़ लोगों को वे मुफ्त राशन दे रहे हैं। क्या आप कोई उपकार कर रहे हैं? किसी को भी आपका कुछ मुफ्त नहीं चाहिए। उनमें मेहनत करने का दम है। उस मेहनत को आप कम से कम सही सम्मान तो दीजिए। क्या जनता को भिखारी बना रहे हैं? ऐसे बच्चे जब सड़कों पर उतरते हैं तो उन्हें ‘कॉकरोच’ कहकर उनका मजाक उड़ाया जाता है तो फिर युवाओं को कॉकरोच कहनेवाले लोग किस लायक हैं?
-यह मजाक देश के मुख्य न्यायाधीश ने उड़ाया…
हां… लेकिन वह गलत है। हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम में कई क्रांतिकारी शहीद हुए। उन्होंने प्राण न्योछावर किए… किसके लिए किए? क्या उम्र थी उनकी? आज जिन्हें हम ‘जेन-जी’ कहते हैं, उस समय शायद यह शब्द न रहा हो, लेकिन अगर उन्होंने उस वक्त देश की आजादी के लिए घर-बार और जान की परवाह न करते हुए आहुति न दी होती, प्राण न न्योछावर किए होते, शहीद न हुए होते, तो आज यह जो कुर्सी की गर्मी आपको मिली है, क्या वह मिलती? यानी आज के युवाओं को ‘कॉकरोच’ कहना उन क्रांतिकारियों का अपमान है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने सत्रह साल की उम्र में तोरण किला जीता था, क्या यह भूल रहे हैं आप?
-सभी युवा क्रांतिवीर ‘जेन-जी’ ही थे…
ज्ञानेश्वर ने सोलह साल की उम्र में ‘ज्ञानेश्वरी’ लिखी। इन सभी का कर्तृत्व आप लोगों से कई गुना बड़ा है। आप तो बस कुर्सियों पर आप बैठे हैं इसलिए आप आदरणीय हैं, ऐसा नहीं है। कुर्सी के प्रति आदर जरूर है… लेकिन अगर उस कुर्सी का मान बढ़े, ऐसा व्यवहार कोई नहीं करेगा तो उनका आदर कोई नहीं करेगा। अभी भी जो कुछ मैंने पढ़ा, परसों जो दिल्ली में लाठीचार्ज हुआ… आप भी दिल्ली में मेरे साथ थे… एक लड़की तकलीफ में रोकर बता रही थी, आक्रोश व्यक्त कर रही थी। उसके मन में आक्रोश और दुख था। उसके कपड़े फाड़ दिए गए… लड़कियों से मारपीट की गई। लाठी पर कीलें लगाकर कई लोगों को पीटा गया। इस भीड़ में उन्होंने गुंडों को घुसा दिया, जो सादे कपड़ों में थे। उनके हाथों में पुलिस के डंडे दे दिए गए थे। लड़कियों से जिस तरह का बर्ताव किया गया… यह क्रूरता सत्ता के घमंड से आ रही है।
– सरकार की तो ‘लाडली बहनें’ या ‘लाडली बेटियां’ हैं…वे तो
तो इसलिए आप उन्हें सड़क पर इस तरह मार रहे हैं? उनके साथ हुई बर्बरता का वीडियो पेश करते समय कोर्ट कह रहा है कि हमारे पास समय नहीं है। कौन हैं आप? किसके लिए बैठे हैं वहां? क्या यह सवाल भी नहीं पूछना चाहिए? यानी आपके पास कुत्तों और बिल्लियों के लिए ‘सुओ मोटो’ (स्वत: संज्ञान) लेने का समय है, लेकिन देश के भविष्य के लिए, उन पर हो रहे अत्याचारों के वीडियो देखने का समय नहीं है? फिर न्याय की गद्दी पर क्यों बैठे हैं? क्या आप धृतराष्ट्र बन गए हैं?
-यह आप देश की न्याय व्यवस्था के बारे में कह रहे हैं...
हां… यह अब द्रोपदी द्वारा धृतराष्ट्र से न्याय मांगने जैसा हो गया है? फिर चंद्रचूड़ ने उस न्याय की देवी के आंखों की पट्टी क्यों हटाई थी?
-क्यों हटाई? आपको क्या लगता है?
अब हटा भी दी तो क्या फायदा है?
अगर आपके सामने सब कुछ घटित होने के बावजूद आप आंखें मूंदनेवाले हैं तो वह न्याय की देवी कहेगी कि फिर से मेरी आंखों पर पट्टी बांध दो। यह इस देश की जनता का अपमान है और यह किसी को भी नहीं करना चाहिए। उनके खिलाफ कुछ भी बोलो तो तुरंत विशेषाधिकार हनन हो जाता है, अवमानना हो जाती है, उनकी मानहानि हो जाती है। लेकिन आप मेरे देश के भविष्य का मजाक उड़ा रहे हैं, क्या यह देश की मानहानि नहीं है?
– आपने देखा होगा कि देश की सीमा से सटे कई देशों में, जैसे नेपाल हो, बांग्लादेश हो, आगे लीबिया हो… वहां भी ‘जेन-जी’ सड़कों पर उतरे और उन्होंने तख्तापलट कर दिया।
यही उनकी ताकत है…
-और तब अपने देश में कई लोगों की भावना थी कि हमारे यहां ऐसा कब होगा? आज क्या आपको अपने यहां ऐसा होता दिख रहा है?
ऐसा हो, ऐसी किसी की भी इच्छा नहीं होती। इस हद तक जाने की नौबत इन युवाओं पर आए, ऐसी किसी की मंशा नहीं होती। सीधी सी बात थी… पढ़ाई करके जब कोई लड़का या लड़की परीक्षा देने जाता है और पेपर देने के बाद उन्हें पता चलता है कि पेपर लीक हो गया है… इस पेपर लीक की वजह से अब तक लगभग २० से २२ लड़के-लड़कियों ने आत्महत्या कर ली है। सरकार आंख और कान बंद करके बैठी है। छात्रों के आक्रोश को दबाया जा रहा है तो फिर कभी न कभी तो विस्फोट होगा ही।
-उनके माता-पिता भी इस आंदोलन में शामिल थे…
हां… थे न। कुछ बच्चों ने तो परीक्षा के टेंशन के कारण आत्महत्या तक कर ली है। आप उनकी भावनाओं की, उनकी तकलीफ की कद्र करेंगे या नहीं? और इतना पढ़ने-लिखने के बाद भी अगर उनके माथे पर बेरोजगारी का थप्पड़ ही पड़नेवाला है तो फिर उनका भविष्य क्या है? परीक्षा केंद्र जाने की इच्छा रखनेवाले ये बच्चे सड़कों पर क्यों उतरे हैं? इस बारे में कौन सोचेगा?
-आप जब रात को ‘जंतर-मंतर’ पहुंचे तब बारिश हो रही थी। फिर भी हजारों की संख्या में युवा वहां मौजूद थे। आपने भाषण दिया। युवा सामने से जबरदस्त प्रतिक्रिया दे रहे थे। ‘जंतर-मंतर’ का वह नजारा देखकर आपको क्या लगा?
दोनों बातें हैं। एक तरफ तो वह दिल दहला देनेवाला विषय है; वहीं दूसरी तरफ सामने जो युवा वर्ग खड़ा था… जो देश के भाग्यविधाता हैं, उनकी वह हिम्मत देखकर मुझे भी लगा कि हां… देश जीवित है। यह जीवंतता जब तक देश में है, तब तक हमारे देश में तानाशाही नहीं आ सकती। यह एक आत्मविश्वास मुझे मिला।
धर्मेंद्र प्रधान कहते हैं कि यह जीवंतता नहीं बल्कि युवाओं का अतिरेक और गुंडागर्दी है। फिर अब उन्हें इस्तीफा क्यों देना पड़ा?
देना ही पड़ा न? यह ‘अ’धर्मेंद्र है। ‘अ’धर्मेंद्र प्रधान है… इसमें धर्म कहां है…? शिवसेनाप्रमुख की भाषा में कहें तो इनके पिछले हिस्से पर निशान पड़े हैं, इसलिए ये कुर्सी पर बैठे हैं, वरना उस कुर्सी पर बैठने के लायक नहीं हैं ये…
– आपका क्या कहना है.. इस्तीफा धर्मेंद्र को देना चाहिए या नरेंद्र को?
(हंसते हुए) सभी ‘द्र’ हैं, उन सभी ‘द्र’ वालों को इस्तीफा दे देना चाहिए। उनका देश को कोई फायदा नहीं है।
-क्योंकि वे जो ‘द्र’, ‘द्र’, ‘द्र’ हैं, वे जनता के साथ ‘द्रोह’ कर रहे हैं।
उनकी वजह से देश में ‘दारिद्रय’ न आए, बस इतनी ही इच्छा और उम्मीद है।
-यह सरकार १२ साल से राज कर रही है। १२ साल तक जनता एक दबाव या अंधभक्ति के साये में जीती रही। १२ सालों में जो आपने पहली बार ‘जंतर-मंतर’ पर या देश में नजारा देखा, जो इससे पहले कभी नहीं दिखा था। मानो अचानक भूकंप आ जाए और उसमें से लावा उबल पड़े…
मैंने कहा न, यह विष्णु का अवतार है…

यह तो सिर्फ क्रांति की चिंगारी है!..उद्धव ठाकरे ने सरकार को दी चेतावनी

– आपको क्या लगता है? लोगों का डर खत्म हो गया? या जनता सोई हुई थी, लोकतंत्र सोया हुआ था?
ये शासक निर्दयी हैं, लेकिन जनता दयालु है। ऐसा हमेशा कहा जाता है कि जनता की याददाश्त छोटी (शॉर्ट) होती है, लेकिन ऐसा नहीं है, लोग देख रहे होते हैं, पर कहते हैं, ठीक है… जाने दो… लेकिन कितना जाने दें… वो ‘जाने दो, जाने दो’ करते-करते जब पानी सिर से ऊपर जाने लगता है, उस वक्त जनता फिर सड़कों पर उतरती है। जनता सोई हुई नहीं होती, लेकिन जब सोने का ढोंग करनेवाले सत्ताधारी आते हैं, तब जनता को हाथ में कोड़ा उठाना ही पड़ता है।
– क्या यह क्रांति की चिंगारी है?
चिंगारी का रूपांतरण क्रांति में हो सकता है। अगर समय रहते कोई उपाय नहीं किया गया तो इस देश में भयानक स्थिति पैदा हो सकती है और एक बार जब यह युवा सड़कों पर उतर आया, तो वह अपनी बात पूरी करवाए बिना नहीं रुकेगा।
– अभिजीत दीपके नाम का महाराष्ट्र का एक मराठी युवा अमेरिका के शिकागो में पढ़ रहा था। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने बेरोजगार युवाओं को जो कुछ भी ‘कॉकरोच’ कहा, उसके बाद वह युवा संतप्त होता है, विद्रोह करता है और भारत आकर एक आंदोलन शुरू करता है। उसे युवाओं का भारी समर्थन मिलता है। जो काम पिछले १२ सालों में कोई भी विपक्षी दल नहीं कर पाया, यह हमारे सभी विपक्षी दलों की असफलता है, ऐसा आपको नहीं लगता?
है ही न… बिल्कुल है। मैं सिर्फ सत्ताधारियों को दोष नहीं दूंगा, विपक्षी दलों को भी दूंगा। बीच में मैंने कहीं कहा भी था कि देश की जनता का राजनीतिज्ञों पर से अब विश्वास उठ चुका है। क्योंकि आखिरकार अपने खुद के स्वार्थ के लिए पार्टियां तोड़ी जाती हैं। यह चाहे धर्मेंद्र प्रधान हों या फिर गृहमंत्री अमित शाह, यह उनकी भी असफलता है। पार्टी तोड़ने के लिए वे सत्ता का उपयोग कर रहे हैं। धर्मेंद्र प्रधान ने बाद में पेपर इधर-उधर ले जाने के लिए जो मिलिट्री की व्यवस्था का इस्तेमाल किया, वह पेपर लीक होने से पहले क्यों नहीं किया? आपको लोगों ने चुनकर दिया है। चुने जाने के बाद आप अपने विभाग का काम कीजिए न…
-फिर ये मंत्री क्या कर रहे थे?
आप अपने विभाग का दुरुपयोग पार्टियां तोड़ने के लिए कर रहे हैं, यानी बंगाल में भी सीआरपीएफ के जवान घुसाकर आपने अपनी पार्टी को जिताया। ऐसे समय में सभी पर से विश्वास उठ गया है। जो सेना आज तक इन्हें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसाने चाहिए थी, उसे आप बंगाल में घुसा रहे हैं? चुनाव जीतने के लिए? वहां डरा-धमकाकर चुनाव…
जीत रहे हो… जो सेना मणिपुर में भेजनी चाहिए थी, वह तुम बंगाल में घुसा रहे हो। जो ताकत मणिपुर में शांति कायम करने के लिए इस्तेमाल की जानी चाहिए थी, उसे तुम हमारे युवाओं और बेटियों पर लाठियां बरसाने तथा बेरहमी से आंसू गैस के गोले छोड़ने के लिए इस्तेमाल कर रहे हो? उस पर सवाल पूछने जाओ तो देशद्रोही करार दे दिया जाता है। इसलिए अब तुम किस-किस को देशद्रोही ठहराओगे? तुम्हारे खुद के घरों के बच्चे भी वहां जंतर-मंतर पर गए हैं।
क्या उन युवाओं को भी देशद्रोही ही करार दिया गया है?
जवाब: हां…
-कहा जा रहा है कि इस आंदोलन में पाकिस्तान का हाथ है, चीन का हाथ है...
तो फिर अब जो वीडियो सामने आए हैं, जिनमें सिविल ड्रेस (सादे कपड़ों) में युवाओं को पीटते हुए गुंडे दिखाई दे रहे हैं, वे गुंडे किसके हैं? बीजेपी के हैं, आरएसएस के हैं या पाकिस्तान से लाए गए हैं? और मैंने ‘जंतर-मंतर’ पर सरेआम कहा है कि उनके फोटो सोशल मीडिया पर वायरल करो, कि यही वे ‘वांटेड’ गुंडे हैं। कल जब सरकार बदलेगी, तो इन गुंडों को बख्शना नहीं है। उन्हें उनकी सजा मिलनी ही चाहिए। मोदी ने कहा था कि जो अपराधी हैं उन्हें छोड़ेंगे नहीं, तो सबसे पहले इन गुंडों को जेल में डालो। जिनकी नेमप्लेट ही नहीं है, फिर ये कौन हैं? क्या आपने उन्हें नाटक कंपनी के कपड़े पहनाकर हाथ में डंडा देकर पुलिस बना दिया है?
– फिलहाल सरकार की एक ही नीति बनी हुई है, फिर चाहे वह नरेंद्र मोदी हों, अमित शाह हों या पूरी भारतीय जनता पार्टी हो। वे विपक्ष को खरीद लेते हैं। विधायक, सांसद तोड़ते हैं, सरकारें खरीदते हैं, चुनाव खरीदते हैं…
वोट… वोट भी खरीदे ही जाते हैं।
– वोट खरीदते हैं, हार-जीत खरीदते हैं। इस देश में विपक्षी दल कौन-सा होना चाहिए या नेता कौन होना चाहिए, यह अब वे तय करने लगे हैं। ऐसे समय में जब इतनी ताकतवर सरकार है, तो वे इस आंदोलन को खत्म क्यों नहीं कर पाए?
इसीलिए मैं लगातार कह रहा हूं कि यह विष्णु का अवतार है। यह राम का अवतार है। आप इसके रौद्र रूप को खत्म नहीं कर सकते।
-मतलब?
इस निर्दयी रावण रूपी सरकार या सरकार रूपी रावण का वध किए बिना यह विष्णु का अवतार अब रुकने वाला नहीं है।
– इस आंदोलन में लगातार विदेशी हाथ होने का आरोप लगाया जाता है…
मुझे तो ऐसा लग रहा है कि सरकार में ही विदेशी हाथ है, जो हमारे ही बच्चों पर लाठियां चला रहा है, आंसू गैस के गोले छोड़ रहा है… फिर हमारी सरकार कौन चला रहा है? यही अब शोध का विषय है। ये सारे बच्चे भारत माता की ही संतानें हैं न?
– कौन चला रहा है?
यही सबसे बड़ा शोध का विषय है।
– पिछले कुछ समय से भारतीय जनता पार्टी का ‘आईटी सेल’ एक बहुत बड़ी ताकत था, लेकिन ‘जंतर-मंतर’ की इस ‘जेन-जी’ ने भाजपा के आईटी सेल को ध्वस्त कर दिया।
उनकी वाट लगा दी…उनकी बैंड बजा दी… धज्जियां उड़ा दीं।
– जिस तरह की सक्रियता या जिसे हम क्रिएटिविटी कहते हैं, अगर आप उसे देखें तो आपको उन बच्चों की बुद्धिमत्ता पर गर्व महसूस होगा।
मैं आपको बताऊं… यह लड़ाई अंधभक्त बनाम देशभक्त की है। जंतर-मंतर पर देशभक्त हैं। देश में एक तरह से देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी है।
छोटी लड़कियां नारे लगा रही थीं… क्या थे वे नारे? मोदी की ५६ इंच की छाती की हम हमेशा आलोचना करते थे, लेकिन उस छोटी लड़की का नारा था- ‘५६ इंच का छोटा बंदर… बाल नरेंदर… बाल नरेंदर…’ और ये नारे लोकप्रिय हो गए। हर जगह वायरल हो गए। कोई गाने गा रहा है… तो कोई वहां नुक्कड़ नाटक कर रहा है… कोई भाषण कर रहा है, तो कोई कविता। अब डर नहीं रहा। जेल जाने का डर नहीं रहा और यह बात बहुत प्रशंसनीय भी है, साथ ही सत्ताधारियों के नजरिए से खतरनाक और खौफनाक भी है।
– हमारे देश में लोकतंत्र की स्थिति फिलहाल कैसी है?
– लोकतंत्र को इस आंदोलन से ऑक्सीजन मिली है। जो लोकतंत्र मृतप्राय हो चुका था, उसे अब ऑक्सीजन मिली है। अगर कहीं भी गुहार लगाने पर न्याय न मिले और द्रोपदी के चीरहरण के समय धृतराष्ट्र टस से मस न हो, तो फिर किसी ने वह कविता लिखी है न… ‘सुनो द्रोपदी शस्त्र उठा लो… अब गोविंद न आएंगे…’
– लोकतंत्र को फिर से सीना तानकर खड़ा करने के लिए इस देश की वे संवैधानिक संस्थाएं हैं, जो पूरी तरह ध्वस्त कर दी गई हैं। जिनमें अदालतें हों, चुनाव आयोग हो, राज्यपाल हों या फिर लोकसभा और राज्यसभा, इनके बल पर लोकतंत्र मजबूत रहता है। ये सभी संस्थाएं आज मरणासन्न स्थिति में पड़ी हैं, गुलाम बन चुकी हैं। इनका क्या करेंगे?
– कुछ मरणासन्न स्थिति में हैं, तो कुछ दबाव में हैं। अगर यह दबाव एक बार खत्म हो जाए, तो मुझे लगता है कि उनमें फिर से नई कॉपलें फूटेंगी। यह होता है, क्योंकि यह प्रकृति का नियम है। पत्ते झड़ते हैं… नए पत्ते आते हैं। नई कोंपलें आएंगी, इस देश का लोकतंत्र कभी मरेगा नहीं।
– ‘जंतर मंतर’ की सबसे बड़ी गूंज महाराष्ट्र में सुनाई दी। शिवसेना ने सबसे पहले इस पर अपना रुख स्पष्ट किया।
-हां, बिल्कुल। एक कर्तव्य की भावना से हमने यह किया।
– आप या आदित्य ठाकरे ने… सिर्फ रुख ही स्पष्ट नहीं किया, बल्कि शिवतीर्थ पर युवाओं का एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया। तिरंगा यात्रा निकाली। इस वजह से पूरे महाराष्ट्र के कोने-कोने में इसकी गूंज सुनाई देने लगी। आपको ऐसा क्यों लगा कि युवाओं के आंदोलन को तुरंत समर्थन देना चाहिए?
-शिवसेना युवाओं का ही संगठन है और शिवसेना का जन्म ही मूलरूप से यहां के भूमिपुत्रों के न्यायसंगत अधिकारों के लिए हुआ है। अगर यह संगठन युवाओं के लिए नहीं लड़ेगा, तो युवाओं के लिए दूसरा कौन लड़ेगा? और उनकी गलती क्या है? अभिजीत दीपके का वहां अमेरिका में सब कुछ सही चल रहा था। वह पढ़ाई कर रहा था… पढ़कर शायद वहीं नौकरी करके रह भी जाता। उसे यह ‘नीट’ का मुद्दा उठाने की क्या जरूरत थी? उसने मुद्दा उठाया, लेकिन वह वहां बैठकर दूर से बातें बना सकता था; पर वह सब छोड़कर यहां आ गया। आज वहां अनगिनत युवा लड़के-लड़कियां अपना घर-बार छोड़कर सड़कों पर बैठे हैं। लगभग एक महीना हो गया है, वे सब वहीं डटे हुए हैं। रोज भीड़ बढ़ रही है और अगर ये बच्चे अपने न्यायसंगत अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं, तो उन्हें हिम्मत देना हम अपना कर्तव्य मानते हैं… और सभी को उनके पीछे खड़े होना चाहिए, उनका साथ देना ही चाहिए।
-महाराष्ट्र में यह आंदोलन आप स्वतंत्र रूप से कर रहे हैं या आपके साथ आपके अन्य सहयोगी दल भी हैं?
– अभी मैं राज (राज ठाकरे) के पास ही था। हम, यानी शिवसेना और मनसे, एक साथ तो हैं ही। कल मेरी दिल्ली में राहुल जी से बात हुई। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने भी कहा कि हम भी आपके साथ हैं। मैंने अन्य राज्यों के कुछ नेताओं से भी बात की है। वे भी अपने-अपने स्तर पर आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन अब इन युवाओं को सही दिशा दिखाने की जरूरत है। अब वे सड़कों पर उतर आए हैं। अगर आप चाहते हैं कि उनसे कोई गलत कदम न उठे, तो सरकार को भी कोई उलटा-सीधा कदम नहीं उठाना चाहिए। क्योंकि आखिरकार, वे युवा आज भी बातचीत के लिए तैयार हैं, तो सरकार को उनसे बात करनी चाहिए। पाकिस्तान के साथ बातचीत के दरवाजे खुले रखने की बात कहने वाला आरएसएस इस आंदोलन में चुप क्यों है? वे यह क्यों नहीं कहते कि इन बच्चों से जाकर बात करो? जब आप कहते हैं कि पाकिस्तान से बातचीत के रास्ते खुले रखने चाहिए, हम कोई हिटलर नहीं हैं, अगर आप हिटलर नहीं हैं, तो इन बच्चों के साथ हिटलर जैसा बर्ताव क्यों कर रहे हैं? क्या है इसका जवाब उनके पास?
सरकार आज भी इसी घमंड में है कि हम इन बच्चों के आंदोलन को आसानी से कुचल देंगे।
– उन्हें अपने आसपास नजर उठाकर देखना चाहिए। जिस शेख हसीना को उन्होंने शरण दी है, उनसे जाकर पूछें कि आप अपने देश के आंदोलन को क्यों नहीं कुचल पाईं? नेपाल के प्रधानमंत्री कहां भागे, उनसे पूछें कि आप अपने देश के ‘जेन-जी’ आंदोलन को क्यों नहीं कुचल पाए? देश का मतलब सिर्फ पत्थर-मिट्टी नहीं होता… देश का मतलब वहां की जनता होती है। लोकतंत्र में जनता जैसे वोट देती है, वैसे ही अपने विचार व्यक्त करने के तरीके भी उसे अच्छी तरह पता हैं।

राम तुम्हारे बाप के हैं क्या?

– ‘जंतर-मंतर’ के आंदोलन के नेता सोनम वांगचुक को सरकार ने जबरदस्ती अस्पताल पहुंचा दिया। उनका कहना है कि यह देश की दूसरी आजादी की लड़ाई है। क्या आप इससे सहमत हैं?
– पहली आजादी, दूसरी आजादी कहने के बजाय मैं तो यह कहूंगा कि यह आजादी को बचाए रखने की लड़ाई है। हम आजाद तो हैं ही, लेकिन अगर इस आजादी पर कोई कब्जा करने की कोशिश कर रहा है, तो उस शिकंजे के कसने से पहले ही उसे तोड़ना जरूरी है। यह उस शिकंजे को तोड़ने और आजादी को कायम रखने की लड़ाई है।
– आप एक प्रमुख राजनीतिक दल के प्रमुख हैं। हर आंदोलन में राजनीतिक दलों के नेता, चाहे वे राहुल गांधी हों या अखिलेश यादव, यह जरूर सोचते हैं कि इसके आगे क्या परिणाम होंगे? क्या इस आंदोलन के दौरान आपके दिमाग में चुनावों का ख्याल है? क्योंकि चुनावों में अभी ढाई साल बाकी हैं। क्या आप ढाई साल तक इस आंदोलन की आंच को बरकरार रख पाएंगे?
– तो क्या तब तक हम बच्चों का भविष्य बर्बाद होते देखते रहें? पेपर लीक होते देखते रहें? बच्चों की जिंदगी तबाह होते देखते रहें? राजनीति में इतने संवेदनहीन होकर वैâसे काम चलेगा? हम बीजेपी से अलग हैं।
– ढाई साल आप क्या करने वाले हैं? मान लीजिए, कल सरकार ने यह आंदोलन ठंडा कर दिया…
-करने दीजिए।
– कल नरेंद्र मोदी किसी मंदिर में चले जाएंगे, तपस्या करने बैठेंगे। बाहर आकर कहेंगे, मैंने प्रायश्चित कर लिया है। फिर अंधभक्त तालियां बजाने लगेंगे...
-इसीलिए मैं कह रहा हूं कि हर व्यक्ति को इस बात पर विचार करना चाहिए कि हम किसलिए जी रहे हैं। अगर मैं जनता के लिए लड़ रहा हूं तो मुझे चुनाव के बारे में सोचे बिना बच्चों के न्यायसंगत अधिकारों के लिए सड़क पर उतरना चाहिए व उनके साथ खड़ा रहना चाहिए। मेरी इच्छा है कि यह आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से और अच्छे ढंग से अंजाम तक पहुंचे। मैं बिल्कुल नहीं चाहता कि देश में दंगे हों या हिंसा हो। सरकार को इन बच्चों के प्रति इंसानियत की नजर से देखना चाहिए। आगे जो भी मुद्दे होंगे, दो वर्षों में हम उन राजनीतिक मुद्दों को राजनीति के स्तर पर उठाएंगे। लेकिन अगर आप बच्चों का भविष्य दांव पर लगाकर राजनीति करनेवाले हैं तो आप पापी हैं। मुझे अपनी राजनीति के लिए बच्चों की जान नहीं लेनी है।
‘शिवसेना ६० वर्ष की हो गई है। इन ६० वर्षों में शिवसेना ने कई आंदोलन किए हैं। इन सभी आंदोलनों का केंद्रबिंदु युवा वर्ग ही रहा है। जब शिवसेनाप्रमुख ने पार्टी की स्थापना की थी, तब भी वे युवाओं के नेता थे। ८७ वर्ष की उम्र में जब वे हमारे बीच से विदा हुए, तब भी वे युवाओं का ही नेतृत्व कर रहे थे। क्या आपको लगता है कि इस देश के युवाओं में वह परिवर्तन की शक्ति अभी भी मौजूद है?
-हां, वह परिवर्तन की शक्ति दिखाई दे रही है। शिवसेनाप्रमुख कहा करते थे कि शरीर थकता जाता है, उम्र बढ़ती जाती है, लेकिन जिस दिन आप मन से थक जाएंगे, मन से बूढ़े हो जाएंगे, उस दिन आप खत्म हो जाएंगे। आपकी उम्र प्रकृति के हाथ में है, लेकिन अपने मन का यौवन बनाए रखना आपके हाथ में है। यौवन का मतलब क्या है? आपको आज के युवाओं की समस्याओं और उनके दर्द को समझना चाहिए। अगर आप उनकी पीड़ा को समझते हैं, तभी आप उनके नेता होते हैं। वरना आप युवा हैं, लेकिन युवाओं को ही नहीं समझते, तो आपकी उम्र का क्या फायदा है?
– ‘उद्धवजी, देश में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के हिंदुओं के बीच इस समय एक मुद्दे पर चर्चा हो रही है। इसे लेकर भारी आक्रोश भी है। अयोध्या में अनेक लोगों के त्याग, संघर्ष और बलिदान से जो राम मंदिर बना, उस मंदिर की ५५० करोड़ रुपए के चढ़ावे की चोरी हो गई। यह घोटाला करीब १३ हजार करोड़ रुपए का है। वास्तव में भगवान राम की लूट हुई है। लोग अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं। इस पर आपका क्या कहना है? इस मंदिर को मुगलों ने लूटा है क्या?
-‘नीट’ के पेपर और मंदिर की दानपेटी क्या मुगलों ने लूटी है, पाकिस्तान ने लूटी है या नेहरू ने लूटी है? क्या पेपर नेहरू ने लीक किए हैं? क्या दानपेटी नेहरू ने तोड़ी है? ये दोनों पाप भाजपा के ही हैं। अब इनका मुखौटा उतर रहा है। जिस मंदिर के नाम पर इन्होंने वोट हासिल किए, उसी मंदिर की दानपेटी तोड़ रहे हैं और चढ़ावा चोरी कर मंदिर को लूट रहे हैं। जिन युवाओं को भविष्य के सपने दिखाकर वोट हासिल किए, उसी युवा शक्ति को कुचल रहे हैं। ये दोनों बातें भाजपा की सड़ी-गली और भ्रष्ट मानसिकता का प्रतीक हैं। सिर्फ राम मंदिर ही नहीं लूटा जा रहा है। केदारनाथ मंदिर में भी लूट की खबरें हैं। बद्रीनाथ में चोरी हुई है। उज्जैन में भी मामले सामने आए हैं। अयोध्या में जमीन घोटाला हुआ है। अन्य कई जगहों पर भी घोटाले हुए होंगे, जिनका अभी तक पता नहीं चला है। इसलिए मैं कहता हूं कि इस देश में युवा शक्ति से ज्यादा ‘अंध शक्ति’ हावी हो गई है।
– ‘क्या यह सारी ‘तांत्रिक शक्ति’ भाजपा के हिंदुत्व में शामिल हो गई है?
हां… इस ‘तांत्रिक शक्ति’ के बजाय युवा शक्ति को महत्व दीजिए। वही आपको बचाएगी। ‘तांत्रिक’ कुछ नहीं कर सकते। ‘तांत्रिक’ का ‘जंतर-मंतर’ अलग है और यह ‘जंतर-मंतर’ अलग है। उनके ‘जंतर-मंतर’ से देश का शासन नहीं चल सकता। उनका ‘जंतर-मंतर’ अब लोगों पर से उतर गया है।
– ‘यह मंदिर लूट का मामला आपको कितना गंभीर लगता है?
-बहुत गंभीर है। आखिर ये लोग किस आधार पर सत्ता में आए हैं? इनकी राजनीति तो राम के नाम पर ही फली-फूली है। आज हमें बिना मांगे सलाह दी जा रही है कि मंदिर की लूट पर राजनीति मत करो… आप कौन होते हैं हमें यह बतानेवाले कि राजनीति मत करो? हमें हिंदुत्व पर सलाह दी जाती है, क्यों? आप अपना काम कीजिए न, फालतू की बातों में दखल देने के लिए आपके पास समय है… उससे बेहतर है कि आप अपना काम करें और हमें हमारा काम करने दें। हमारे काम में बेमतलब आप दखल मत दीजिए। हम आपके काम में दखल देते हैं क्या?
– ‘वे आपको हिंदुत्व पर सलाह दे रहे हैं।
हमें मंदिर की राजनीति के बारे में बताते है… हिंदुत्व का प्रचार करने के कारण बालासाहेब ठाकरे का मतदान करने और चुनाव लड़ने का अधिकार छीन लिया गया था। आज इसका खामियाजा कौन भुगत रहा है? बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद शिवसैनिकों पर मामले दर्ज किए गए थे। उनमें कोई भाजपा वाला था क्या? उस समय तो इन्होंने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया था।
– ‘वे राम मंदिर के जनक हैं।
-जनक? राम मंदिर का पैâसला अदालत ने दिया है। फिर भूमिपूजन और उद्घाटन के लिए वहां जाकर क्यों बैठे? वहां राष्ट्रपति क्यों नहीं थीं? यानी जो कुछ भी अच्छा है, वह आपका और जो कुछ बुरा है, वह पाकिस्तान का। इसका कोई अर्थ नहीं है, आपने देश को धोखा दिया। धर्म के नाम पर वोट मांगकर आपने जनता को धोखा दिया। अच्छे भविष्य के सपने दिखाकर आपने हमें इतिहास में नहीं, बल्कि पुराणों के दौर में पहुंचा दिया। लोगों ने आपको वोट उज्ज्वल भविष्य के लिए दिया था। ‘अच्छे दिन आएंगे…’ कहां हैं अच्छे दिन?
– अच्छे दिन मंदिर लूटने वालों के आए …
– आए ही हैं न। यह सच है। अब आपने पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर उसमें भी मिलावट शुरू कर दी है। इसलिए लोगों के मेहनत की कमाई से खरीदे गए वाहन और स्कूटर खराब हो रहे हैं, इसका जिम्मेदार कौन है? जिस पेट्रोल में मिलावट की जा रही है, उसे इस्तेमाल करके लोग जिन सड़कों पर चल रहे हैं, उन सड़कों के बारे में कहा गया था कि २०० साल तक गड्ढे नहीं होंगे। गड्ढों की तो बात ही छोड़िए, पुल तक गिर रहे हैं। ऐसे में लोग नाराज नहीं होंगे?
– ‘आपने अब रामरक्षा आंदोलन शुरू किया है।
-हां, क्योंकि राम की ‘रक्षा’ करना हमारा काम है और रामरक्षा का पाठ करना हमारे मुख्यमंत्री का काम है। हमने यह काम उन्हीं को सौंप दिया है।
– ‘राम की रक्षा करने आप निकल पड़े हैं, लेकिन इस पर भी टीका-टिप्पणी हो रही है कि राम की रक्षा करने वाले आप कौन हैं? आपको यह अधिकार किसने दिया?
-हम रामभक्त हैं। क्या राम आपके पिता के हैं? राम हम सभी के हैं। आप राम की आड़ में पाप कर रहे हैं। हम रामरक्षक हैं। अपनी रक्षा के लिए हम जिस राम की दुहाई देते हैं, आज उसी की रक्षा करने की जिम्मेदारी हम पर आ गई है। इसी को तो कलियुग कहते हैं।
– ‘आपने रामरक्षा आंदोलन की शुरुआत मुंबई से की और फिर अचानक नागपुर को चुना?
-नागपुर देश का मध्यवर्ती स्थान है। बात यह है कि हमारे यहां शब्दों से खेल करनेवाले बहुत लोग हैं। मुख्यमंत्री ने मुझे लेकर कहा कि रामरक्षा पाठ याद नहीं है। लेकिन इसलिए क्या मैं भी इनकी तरह टेलीप्रॉम्प्टर लगाकर रामरक्षा का पाठ करूंगा? मेरे मन में जो बात है, उसे मैं बिना पढ़े बोल सकता हूं। मैं रामरक्षा करनेवाले लोगों के प्रतिनिधि के रूप में वहां गया था।
– आश्चर्यजनक रूप से राम मंदिर की लूट का मुद्दा कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने भी जोर-शोर से उठाया है। कई अन्य राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर महत्व दिया है। क्या आपको इसमें विचारधारा में हो रहा बदलाव दिखाई दे रहा है?
-ऐसा हो सकता है। लेकिन मेरी विचारधारा में कोई बदलाव नहीं आया है। मेरा हिंदुत्व मेरे दादा और मेरे पिता से मिला है। उसी हिंदुत्व को लेकर मैं आगे बढ़ रहा हूं। बालासाहेब के हिंदुत्व में शासन-प्रशासन के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण बात थी। उससे संबंधित वीडियो अब हर जगह प्रसारित हो रहे हैं।
– ‘ बालासाहेब क्या कहा करते थे?
-वे कहा करते थे कि जब हमारी सरकार हो और कोई मोर्चा निकले, तो एक सीमा के बाद उसे रोका जाए, लेकिन प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज नहीं किया जाना चाहिए। जिस मुद्दे से संबंधित वह मोर्चा होगा, उस विषय से जुड़े मंत्री को जाकर उनसे मिलना चाहिए और उनकी बात सुननी चाहिए। उनकी मांग क्या है, यह समझना चाहिए। यही हमारा हिंदुत्व है। ऐसी ही हमारी शिवशाही थी।
– ‘वहां अयोध्या में राम मंदिर की दानपेटियां लूट ली गईं…
-चुनाव में मतपेटियां भी लूट ली गईं।
– ‘दानपेटियां, मतपेटियां सब कुछ लूट लिया गया। इधर महाराष्ट्र में हमारे छह सांसदों पर भी डाका डाला गया। आप इसे किस तरह देखते हैं?
-इन्हें शासन चलाना ही नहीं आता है। सत्ता किसलिए चाहिए, यह भी इन्हें समझ में नहीं आता है। ये सत्ता के नशे में चूर हो गए हैं। सत्ता हासिल करना और उसके लिए चुनाव लड़ना राजनीति का हिस्सा है, इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन जनता के मतदान करने के बाद भी आप दल-बदल और पार्टियों में तोड़-फोड़ कर रहे हैं, पेपर लीक कर रहे हैं, दानपेटियां चोरी कर रहे हैं। आपके पास बहुमत है। आप १२ वर्षों से प्रधानमंत्री हैं। यहां महाराष्ट्र में पिछले १२ वर्षों में मेरे ढाई वर्षों का कार्यकाल छोड़ दें तो बाकी समय इन्हीं की सरकार गद्दारी के दम पर चलती रही है। इन्हें आखिर करना क्या है, यही समझ में नहीं आता। अगर कुछ अच्छा करना है तो फिर तोड़फोड़ क्यों कर रहे हैं? ठीक है, इनका हिसाब जरूर किया जाएगा।
– ‘केंद्र और राज्य की सरकार विपक्ष के अस्तित्व को खत्म करने की कोशिश कर रही है। वे विपक्ष को काम का ही नहीं छोड़ना चाहते…
-भाजपा के नड्डा भी पहले कह चुके हैं कि हम विपक्ष को खत्म कर देंगे। अब देखते हैं कि आप कितने दिन टिकते हैं। उनके पतन के दिन शुरू हो गए हैं।

‘जनता अब पार्टियां तोड़नेवालों को ही उखाड़ फेंकेगी!’

– आप विधायक-सांसद चुनकर लाते हैं और भाजपा या मिंधे उन्हें तोड़कर ले जाते या खरीद लेते हैं। मानो उन्होंने ऐसी एक नीति ही बना ली है…
इसीलिए मैंने पहले कहा था कि जनता अब इन्हें सबक सिखाने की तैयारी में है। जनता अब बोलने लगी है। आप तोड़ते-तोड़ते क्या-क्या तोड़ेंगे… हमारे द्वारा चुने गए विधायक, नगरसेवक, सांसद… लेकिन अब जनता आपको ही तोड़ने और देश से उखाड़ फेंकने के संकल्प के साथ सड़कों पर उतर आई है। इसे देखकर अब ये लोग डरकर दुबक गए हैं।
-विरोधी आरोप लगाते हैं कि ठाकरे अपने सांसदों को संभाल नहीं पाते…
अपना शासन तो आप से संभाला नहीं जा रहा है! आज गृह मंत्री कहां हैं? कहां दिखाई दे रहे हैं? न महाराष्ट्र में और न ही देश में। बच्चों और महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं। दिल्ली का गृह मंत्रालय किसके पास है? अगर हम नीट पेपर लीक को धर्मेंद्र प्रधान की विफलता मानकर उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, तो आंदोलन कर रही छात्राओं पर इस तरह बेरहमी से लाठीचार्ज करनेवाले गृह मंत्री के इस्तीफे की भी मांग की जानी चाहिए और अगर नीट पेपर लीक का केंद्र महाराष्ट्र में है, तो क्या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री इस्तीफा देंगे?
– राजनीति को जो गद्दारी का रोग लगा हुआ है और बहुत गहराई तक जो वैंâसर पैâल चुका है, वह कैसे खत्म होगा?
इसीलिए तो विद्यार्थियों के रूप में भगवान विष्णु का अवतार सड़कों पर उतर आया है। देश को लगी सभी बीमारियां अब खत्म होंगी।
-इस तरह की राजनीति की आपने कभी कल्पना की थी?
पिछले कुछ दिनों से ऐसी कल्पना होने लगी थी। जब से शिवसेना को तोड़ा गया, पार्टी को चुराया गया, तभी से… शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न एक गद्दार को दे दिया गया। वास्तव में चुनाव चिह्न को प्रâीज कर देना चाहिए था और किसी दूसरे को मेरी पार्टी का नाम देने का अधिकार चुनाव आयोग के प्रमुख को नहीं है। मैं इसे मानने के लिए तैयार नहीं हूं। मैं यह बात ऑन रिकॉर्ड कह रहा हूं। क्योंकि ‘शिवसेना’ नाम मेरे पिता ने दिया है। इसे बदलने का अधिकार देश में किसी को भी नहीं है और मैं इसे कभी स्वीकार नहीं करूंगा। शिवसेना, शिवसेना ही है। दूसरी पार्टी ‘शाहसेना’ है। आप उसे ‘शाहसेना’ नाम दे दीजिए और कोई भी चुनाव चिह्न दे दीजिए। तोप दे दीजिए, परमाणु बम दे दीजिए, राफेल विमान दे दीजिए। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।
-इन सभी घटनाओं के लिए न्यायपालिका कितनी जिम्मेदार है?
वर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने ही कुछ दिनों पहले कहा था कि न्याय से इनकार करना, न्याय को नष्ट करने के समान है। अब हमारे छह सांसदों को लेकर एक नया मामला सामने आया है। उससे आप समझ सकते हैं कि मामला क्या है।
-अभी पहले फैसले का इंतजार है और दूसरा केस शुरू हो गया है…
अब इन सभी मामलों का फैसला जनता करेगी।
– महाराष्ट्र की राजनीति में पैसों का जो खेल शुरू हो गया है, उसमें ५०-५० करोड़ रुपए में विधायक और सांसद खरीदे-बेचे जाते हैं। यह कोई छोटी रकम नहीं है। इतना पैसा आता कहां से है? मिसिंग लिंक से आता है, गड्ढों से आता है या ये लोग घर पर छापते हैं। यह जनता को पता चलना चाहिए। आपका इस पर क्या कहना है?
सरकार बदलने के बाद सबसे पहले इसी का पता लगाना होगा। यह पैसा आया कहां से और गया कहां? यह बहुत गलत हो रहा है। ‘तुम कुछ भी कर लो, मैं तुम्हें खरीद सकता हूं’। इस तरह का अहंकार बहुत गलत है।
– क्या आपको लगता है कि भविष्य में महाराष्ट्र की राजनीति में बदलाव आएगा?
मुझे लगता है कि बदलाव आएगा। देश में भी बदलाव होगा। या तो भाजपा खुद को बदले, वरना देश उसे बदल देगा। इसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
-राज ठाकरे महानगरपालिका चुनावों में आपके साथ थे, लेकिन बाद में वे ज्यादा दिखाई नहीं दिए।
हम साथ ही हैं। रविवार को हम दोनों मिलकर मार्च करनेवाले हैं। हम एक साथ बड़ा तिरंगा मार्च निकाल रहे हैं। राज हमारे साथ ही हैं।
– इंडिया ब्लॉक क्या कह रहा है?
इंडिया ब्लॉक फिलहाल खुद ही ‘ब्लॉक’ हो गया है।
– ब्लॉक हो गया है, फिर भी आपके जैसे नेता उस ब्लॉक में हैं…
हमारा प्रयास जारी है। निश्चित रूप से अच्छा होगा।
– ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का भविष्य क्या है?
यह एक आंदोलन की चिंगारी है। आप तुरंत यह मत समझिए कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ चुनाव लड़ेगी।
कॉकरोच जनता पार्टी सत्ता में आएगी। आखिर वे बच्चे हैं। वे अपने आक्रोश के कारण सड़कों पर उतरे हैं। उन्हें कॉकरोच कहे जाने पर उनके अंदर भारी गुस्सा है। अब वही गुस्सा सामने आ रहा है। वे तुरंत देश पर शासन करेंगे या नहीं, यह आगे की बात है। यह पैâसला उन्हें ही करने दीजिए। लेकिन अभी हम सभी का उनके साथ खड़ा रहना जरूरी है। वरना सत्ता से चिपकी हुई और लोकतंत्र का खून चूसनेवाली जो जोंकें बैठी हैं, वे सारा खून चूस लेंगी। फिर हमें कोई बचाने वाला नहीं होगा।
-शिवसेना की राजनीति की आगे की दिशा क्या है?
जिस दिशा में हम चल रहे हैं, उसी दिशा में बिना थके और बिना रुके आगे बढ़ते रहना।
– कार्यक्रम क्या है?
हमेशा से युवाओं के साथ खड़े रहे हैं। जैसे-जैसे मुद्दे सामने आएंगे, वैसे-वैसे सही और गलत का विचार करते हुए उनके साथ खड़ा रहना जरूरी है।
– हाल ही में आपने छह जिलों का दौरा किया। यह एक बड़ा दौरा था। आप नागपुर होकर आए। दिल्ली भी गए। ‘जंतर-मंतर’ पर आंदोलन कर रहे हजारों प्रदर्शनकारियों से मिले। क्या आपकी यह सक्रियता और ये दौरे आगे भी जारी रहेंगे?
मुझे जहां-जहां जाना जरूरी लगेगा, मैं वहां जाऊंगा। लोगों से मिलूंगा। फिर चाहे वह दौरा किसानों के लिए हो, युवाओं के लिए हो या रामरक्षा के लिए हो, मैं जरूर जाऊंगा।
– क्या रामरक्षा आंदोलन जारी रहेगा?
हां, रामरक्षा आंदोलन जारी रहेगा। क्योंकि मुझे एक डर है। हो सकता है कि मंदिर चोरी के इस मामले की झूठी जांच की जाए। कुछ लोगों को बेवजह फंसा दिया जाए और बाकी लोगों को क्लीन चिट देकर इस मामले पर पर्दा डालने की कोशिश की जाए। फिर उसी पर्दे के पीछे चोरी का सिलसिला जारी रहे। इस मामले की जांच पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए। पूरी जांच सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय ओक के माध्यम से कराई जानी चाहिए। वे इसके लिए तैयार होंगे या नहीं, यह मुझे पता नहीं, लेकिन मुझे लगता है कि वे निष्पक्ष तरीके से जांच और न्याय कर सकते हैं। हालांकि, यह विषय उन लोगों के हाथ में है, जिनके पास सत्ता है।
-मुझे लगता है कि आप हिंदुत्व के चौकीदार के रूप में काम करने के इच्छुक हैं…
नहीं, यहां कोई चौकीदार नहीं है। अब ‘चौकीदार’ शब्द ही बदनाम हो चुका है। राम मंदिर में चौकीदार होने के बावजूद चोरियां हुई हैं। इसलिए मैं जैसा हूं, वैसा ही ठीक हूं। मैं देशभक्त हिंदू हूं और मुझे वैसा ही रहने दीजिए।
-आप लोगों से क्या अपील करेंगे?
कहने के लिए बहुत कुछ है। मेरी सभी से एक अपील है। अगर आप जाग चुके हैं, तो युवाओं के साथ खड़े रहिए। क्योंकि यही हमारे देश का भविष्य हैं। अब अगर आप शांत बैठे रहे, तो कल आप जीवित नहीं रह पाएंगे। इसलिए आप जहां भी हैं, वहां से इस देश के लिए जो कुछ भी करना संभव हो, जरूर कीजिए। जहां हैं, वहीं से लड़िए। पार्टी और धर्म से ऊपर उठकर देश के लिए लड़िए।
जय महाराष्ट्र!

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