अनिल मिश्र / पटना
कोसी नदी नेपाल के हिमालयी क्षेत्र से निकलकर बिहार में प्रवेश करती है और कटिहार के कुर्सेला के पास गंगा में मिल जाती है। यह हिमालय से भारी मात्रा में गाद और बालू लेकर आती है तथा बार-बार अपना रास्ता बदलती रहती है। इसी वजह से इसे ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है। इस वर्ष भी नदी ने वीरपुर के पास अपनी धारा बदल ली थी, जिसके बाद जल संसाधन विभाग ने करीब 2.5 किलोमीटर लंबा चैनल बनाकर नदी को दोबारा मुख्य धारा में लाया है।इस बीच बिहार सरकार ने इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के साथ समझौता किया है, जिसके तहत नेपाल और भारत से सटे कोसी बेसिन की सैटेलाइट से लगातार निगरानी की जा रही है। इससे नेपाल में होने वाली भारी बारिश, फ्लैश फ्लड और तटबंधों पर बढ़ते दबाव की जानकारी समय रहते मिल सकेगी। बिहार प्रदेश जल संसाधन विभाग के अनुसार करीब 6,960 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की अंतरिक्ष से निगरानी की जा रही है। चंपारण से लेकर सीमांचल तक के संवेदनशील इलाकों का डेटा सीधे विभाग के कंट्रोल रूम तक पहुंच रहा है। इस संबंध में उपमुख्यमंत्री एवं जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी का कहना है कि आधुनिक तकनीक की मदद से अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर बाढ़ प्रबंधन को मजबूत किया जा रहा है। इस संबंध में विजय कुमार चौधरी ने बताया कि आधुनिक तकनीक से समय रहते सूचना मिलने से लोगों को पहले ही सतर्क किया जा सकेगा और फ्लैश फ्लड जैसी स्थितियों में राहत एवं बचाव कार्य तेज होंगे। वही इसरो के सर्वे के मुताबिक 2015 से 2020 के बीच कोसी बेसिन में जलमग्न क्षेत्र तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2015 में जहां करीब 815 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जलमग्न था, वहीं 2020 तक यह बढ़कर 5,503.5 वर्ग किलोमीटर हो गया है, जिसका सबसे अधिक असर भागलपुर, खगड़िया, कटिहार, दरभंगा और समस्तीपुर जिलों पर पड़ रहा है।
