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रोखठोक : मोदी निश्चित जाएंगे…पर किस मार्ग से!

संजय राऊत

`जंतर-मंतर पर मिली हार के बाद मोदी और उनकी सरकार हिल गई है। मोदी के चारों तरफ अभेद्य कवच-कुंडल हैं, ये भ्रम टूट गया है। उल्टा मोदी की उनकी ही पार्टी के लोगों द्वारा घेराबंदी शुरू होने की आशंका बढ़ गई है। गृहमंत्री अमित शाह को २०२९ से पहले प्रधानमंत्री बनना ही है। शिंदे ने उद्धव ठाकरे के साथ जो किया, क्या वही अमित शाह मोदी के साथ करेंगे?’

‘जंतर-मंतर’ पर कॉकरोचों का आंदोलन फिलहाल खत्म हो गया है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को ‘नीट’ पेपर लीक मामले में इस्तीफा देना पड़ा। इस्तीफा देने के अगले दिन जब प्रधान संसद के मकर द्वार से बाहर निकले तब भाजपा के समर्थकों ने संसद की सीढ़ियों पर ही उनका स्वागत किया। यह बेशर्मी की हद है। जैसे प्रधान कोई बहुत बड़ा शौर्य दिखाकर बाहर निकल रहे हों। राजनीति में फिलहाल हर जगह चरित्र का अकाल पड़ा है। उसका प्रत्यक्ष प्रदर्शन लोकतंत्र के मंदिर की सीढ़ियों पर दिखा। बारिश न होने से अकाल पड़ता है तो लोग वरुण देव से प्रार्थना करते हैं, लेकिन भारतीय राजनीति में चरित्र का अकाल खत्म हो इसके लिए किससे प्रार्थना करें? चरित्र अब कोई सद््गुण नहीं रहा। चरित्र यानी नैतिक शक्ति है, इस पर अब कोई भी विश्वास नहीं करेगा। कवि टेनिसन कहते हैं, ‘‘मेरा अंत:करण चरित्र के कारण शुद्ध है इसलिए मेरे शरीर में दस हाथियों का बल समाया हुआ है।’’ आज चरित्र से पैदा होने वाला बल बचा नहीं है इसलिए सत्ता, संपत्ति और कपट से बल बनाया जा रहा है, जिसका इस्तेमाल करके आंदोलन करने वाले लड़के-लड़कियों को मारा जा रहा है। उसी बल से राजनीतिक दलों को तोड़ा जा रहा है। और ये सब करके, करवाकर देश के गृहमंत्री अमित शाह अनजान बने रहे। दिल्ली में विपक्ष को उनका इस्तीफा मांगना चाहिए। ‘जंतर-मंतर’ आंदोलन में प्रधानमंत्री मोदी बदनाम हुए। प्रधान को घर जाना पड़ा। लेकिन हर छोटे-बड़े मुद्दे पर बोलने और दहाड़ने वाले गृहमंत्री शाह इस मामले में रहस्यमय तरीके से चुप रहे। इसके पीछे के रहस्य पर दिल्ली में फिलहाल चर्चा शुरू है।
पार्टी में ही साजिशें
प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ क्या उनकी ही पार्टी और सरकार में साजिशें चल रही हैं? ये सवाल सबके मन में है। मोदी इस वक्त लाचार हैं। गृह मंत्रालय के अधीन सभी एजेंसियां हैं। उसकी डोर अमित शाह के हाथ में है। ‘जंतर-मंतर’ का आंदोलन भड़कता गया। उसे समय रहते रोका जा सकता था। ३७० हटाने के बाद जिस शाह ने कश्मीर की स्थिति संभाली, (ऐसा उनका दावा है) वो जंतर-मंतर की सड़क पर बच्चों का आंदोलन नहीं संभाल पाए, ये कोई भी नहीं मानेगा। सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठेंगे और वे लंबा उपवास करेंगे, इसकी पूरी कल्पना गृहमंत्री को रही ही होगी। वांगचुक की ‘जंतर-मंतर’ पर मौजूदगी से आंदोलन को नैतिक बल मिलेगा और मामला हाथ से निकल सकता है, इसका अंदेशा गृहमंत्री को नहीं हुआ होगा तो वे राजनीतिक रूप से कच्चे हैं और उन्हें उस पद पर नहीं रहना चाहिए। जब संसद की तरफ मार्च निकला तब शांति थी। मोर्चा संसद तक आ धमका तब प्रदर्शनकारियों से बात की जा सकती थी। उल्टे लाठीचार्ज, आंसू गैस, कील वाली लाठियों से पिटाई, छर्रे वाली बंदूकों का इस्तेमाल करके युवाओं के असंतोष में जानबूझकर खाद-पानी डालने का काम तरीके से किया गया। युवा प्रधानमंत्री मोदी का वस्त्रहरण कर रहे थे और अमित शाह ‘शकुनि’ की तरह ये वस्त्रहरण देख रहे थे। युवाओं में ज्यादा विस्फोटक माहौल बन जाए, उसी तरह से उनके कदम बढ़े और आखिर में प्रधान का इस्तीफा लेने तक माहौल को चरम पर ले गए। अमित शाह या तो इस स्थिति को संभाल नहीं पाए या फिर उन्होंने जानबूझकर ये ‘अराजकता’ बढ़ानेवाले कदम ही उठाए। ऐसा क्यों? भविष्य में मोदी की जगह ले सकनेवाली हर ताकत का इस आंदोलन के जरिए कांटा निकालने का मौका गृहमंत्री ने लिया। खुद मोदी को बदनाम किया, वो अलग।
ऐसा ही होगा
मोदी सरकार में मतभेद बढ़ गए हैं। मोदी के प्रधानमंत्री पद का आखिरी दौर शुरू हो गया है इसलिए २०२९ से पहले भाजपा में कई लोगों की प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षाएं जाग गई हैं। दिल्ली में अभी चल रही अहम खबरें ये हैं-
प्रधानमंत्री मोदी उन्हें उप-प्रधानमंत्री के तौर पर घोषित करें। ताकि मोदी के वारिस वही हों, ऐसी भूमिका अमित शाह ने बना ली है। मोदी को ये भूमिका मंजूर नहीं है।
अमित शाह ने अपना गुट और अपने सांसद खड़े करने शुरू कर दिए हैं। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री शिंदे, असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा, भाजपा के नए-नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, ये सब अमित शाह गुट के हैं। योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडणवीस को जहां तक हो सके परेशान करना और बदनाम करना, इसके लिए शाह की तरफ से अलग व्यवस्था चल रही है। शाह के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा महाराष्ट्र के नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस लग रहे हैं इसलिए शाह की मशीनरी उनके खिलाफ सक्रिय हो गई है।
अमित शाह ने पार्टी तोड़ने का काम जारी ही रखा है। तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना के सांसदों को उन्होंने भाजपा में शामिल नहीं किया, बल्कि उनका अलग गुट बना दिया।
शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी के सांसदों को तोड़कर उन्हें शिंदे गुट में शामिल करने की उनकी योजना है। (ये ‘मुहिम’ अभी नरेंद्र मोदी ने रोक दी है।)
मोदी दुनिया को पहले से ही नापसंद थे, लेकिन ‘जेन जी’ के सफल आंदोलन से मोदी की बची-खुची साख भी गिर गई। मोदी नेता नहीं रहे। चुनावी मशीनरी को कब्जे में लेकर सत्ता में आए हुए वे तानाशाह हैं। इस पर अब वैश्विक मंच पर एक राय बन गई है। वैश्विक शक्तियों द्वारा मोदी का पतन करने में गृह मंत्रालय की बड़ी मशीनरी का इस्तेमाल किया गया।
नरेंद्र मोदी ने देवेंद्र फडणवीस को दिल्ली बुलाकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में जिम्मेदारी लेने का प्रस्ताव दिया। अब दिल्ली में मुझे तुम्हारी जरूरत होने की बात कही। महाराष्ट्र में तुम्हारी पसंद का मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, ऐसा आश्वासन दिया। भाजपा में संभावित बगावत में देवेंद्र हमारे साथ खड़े रहें, इस तरह की रचना मोदी कर रहे हैं।
मोदी की पार्टी का लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं है। बहुमत का फुलाया हुआ आंकड़ा अमित शाह ने खरीद लिया है, ये मोदी के लिए चिंता की बात है।
मोदी दिल्ली की राजनीति की हर हलचल और साजिश में अमित शाह पर निर्भर रहे। उसका अहसास अब मोदी को होने लगा है।
अमित शाह मोदी के निष्ठावान माने जाते थे ये सच है, लेकिन जब महत्वाकांक्षा उफान मारने लगे तब निष्ठा आसानी से बह जाती है। मुख्यमंत्री पद के लिए महाराष्ट्र में शिंदे ने जो किया, वही प्रधानमंत्री पद के लिए अमित शाह मोदी के साथ कर सकते हैं, इसकी पूरी संभावना है। मोदी की मानसिकता ये ‘मैं ही भाजपा का आखिरी प्रधानमंत्री हूं और इसके बाद गुजरात का कोई नेता मुझसे आगे नहीं जाएगा।’ इस तरह की है। शाह के मन में इसलिए बेचैनी है।
दिल्ली की आगे की राजनीति इन्हीं ८ सूत्रों के इर्द-गिर्द घूमेगी।
राज्य में क्या?
इस पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र में क्या होगा, इस पर गौर करना होगा। महाराष्ट्र में सरकार आपसी लड़ाई में पूरी तरह फंस गई है। ‘‘हम दोनों दोस्त हैं। हमारे बीच फूट नहीं पड़ेगी,’’ ऐसा देवेंद्र फडणवीस पत्रकार परिषद में शिंदे की तरफ देखकर कहते हैं। ये जबरदस्ती का मामला है, ऐसा दोनों तरफ के महत्वपूर्ण लोग बताते हैं। दिल्ली में मोदी और शाह के बीच छुपा संघर्ष चल रहा है। महाराष्ट्र में उन दोनों के अलग-अलग गुट एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। सत्ता के सूत्र ने उन्हें एक साथ बांध रखा है, बस इतना ही। बाकी उनके बीच की ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ सिर्फ मतलब की है। दिल्ली और महाराष्ट्र दोनों गुटों में इमोशन खत्म हो गया है। ‘जंतर-मंतर’ पर छात्रों को जिस निर्मम तरीके से मारा गया, वहीं इमोशन का अंत हो गया।
अब दिल्ली और महाराष्ट्र में आगे की तस्वीर दो गुटों की लड़ाई की ही होगी।
नरेंद्र मोदी की घेराबंदी उनकी ही पार्टी में हो गई है।
ब्रुटस् के हाथ में कमल है। कल तलवार आएगी और करीबी लोग ही घात करेंगे!
मोदी खुद जाएंगे या उनके ही पार्टी के ‘बुटस्’ उन्हें भगाएंगे, बस यही देखना बाकी है।

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