मुख्यपृष्ठनए समाचारमुंबई मनपा का नोटिस स्कैम!

मुंबई मनपा का नोटिस स्कैम!

 -१७४ इमारतें खतरनाक घोषित कर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा
-लोग जान जोखिम में डालकर रहने को मजबूर
-सी-१ इमारतों में फंसे हजारों परिवार, न किराया, न शेल्टर, न कानूनी मदद

फिरोज खान / मुंबई

भिवंडी में चार मंजिला इमारत ढहने से १० लोगों की मौत हो गई। जांच में पता चला कि भिवंडी-निजामपुर मनपा ने उस इमारत को पहले ही खतरनाक घोषित कर नोटिस थमा दिया था, लेकिन नोटिस देने के बाद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। नतीजा इमारत गिरी और लोगों की जान चली गई। यही नोटिस स्वैâम अब मुंबई में भी देखने को मिल रहा है।
मुंबई महानगरपालिका ने मानसून से पहले शहर की १७४ इमारतों को सी-१ कैटेगरी यानी अत्यंत खतरनाक घोषित किया है। इसका मतलब है कि ये इमारतें कभी भी ढह सकती हैं। नोटिस चिपकाकर मनपा ने अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली, लेकिन इसके बाद क्या? न त्वरित पुनर्वास, न किराये की गारंटी, न अस्थायी शेल्टर और न ही कानूनी मदद।
जान हथेली पर रखकर रहने को क्यों मजबूर हैं लोग?
पुनर्वास की अनिश्चितता सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है। ज्यादातर सी-१ इमारतें पुरानी चॉल और लो-कॉस्ट हाउसिंग की श्रेणी में आती हैं। लोगों का सवाल एक ही है, घर छोड़कर जाएंगे तो जाएंगे कहां? वापस घर मिलेगा या नहीं?’ लोगों का कहना है कि उनका ठिकाना यहीं है, बच्चों के स्कूल यहीं हैं। दूसरी जगह जाएंगे तो किराये का खर्च कौन उठाएगा?
कोर्ट से स्टे लेकर बैठे हैं ७१ इमारतों के लोग
कुर्ला, भायखला, भुलेश्वर और बोरीवली में खतरनाक इमारतों की समस्या सबसे ज्यादा है। ७१ इमारतों के लोग कोर्ट से स्टे लेकर बैठे हैं। उनका कहना है कि इमारत इतनी भी खराब नहीं है और मनपा का नोटिस गलत है। मनपा का कहना है कि वह कोर्ट में जाकर स्टे हटवाने की कोशिश करेगी। साथ ही नोटिस जारी कर लोगों से खुद इमारत खाली करने की अपील की जा रही है। एक अधिकारी ने कहा कि हम लोगों को समझा रहे हैं, लेकिन अंतिम पैâसला उनका है। अगर कोई हादसा होता है तो इसकी जिम्मेदारी उनकी होगी।
लाशें गिनने का इंतजार?
एक तरफ मानसून का खतरा मंडरा रहा है, तो दूसरी तरफ १७४ इमारतें मौत के मुहाने पर खड़ी हैं। मनपा ने नोटिस देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है। अब सवाल यह है कि क्या मनपा हादसे से पहले जागेगी या फिर हर साल की तरह हादसे के बाद लाशें गिनेगी?
नोटिस चिपकाना प्रशासन नहीं है
शहरी विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ नोटिस चिपका देना प्रशासनिक जिम्मेदारी पूरी करना नहीं है। जब तक त्वरित पुनर्वास नीति, किराये की गारंटी और अस्थायी शेल्टर की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक लोग घर छोड़ने को तैयार नहीं होंगे। भिवंडी का हादसा इसी लापरवाही का नतीजा है।

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