राजन पारकर
दिल्ली की सत्ता का रास्ता अब लोकतंत्र से कम और दरबार की कृपा से अधिक तय होता दिखाई देता है। महाराष्ट्र में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि कोई मराठी नेता प्रधानमंत्री बनने का सपना देख भी सकता है या नहीं। सूत्रों के अनुसार, भाजपा में चेहरा चाहे किसी का भी हो, अंतिम मुहर दो लोगों के हाथ में ही रहती है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि राज्यों के बड़े नेताओं की ऊंचाई उतनी ही बढ़ने दी जाती है, जितनी दिल्ली को मंजूर हो। विजय वडेट्टीवार का बयान इसी दर्द की ओर इशारा करता है। सवाल किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहां लोकतंत्र के भीतर भी निर्णयों का केंद्रीकरण बढ़ता जा रहा है। जिस घर में लोकतंत्र की खिड़कियां बंद कर दी जाएं, वहां हवा नहीं, सिर्फ आदेश आते हैं।
जनता के सपनों की लूट!
राजनीतिक गलियारों में इन दिनों तीन अलग-अलग घटनाओं ने हलचल मचा रखी है। एक ओर प्रधानमंत्री पद को लेकर संकेतों की राजनीति है, दूसरी ओर ओबीसी, किसानों और छात्रों के मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी, जबकि तीसरी ओर मुंबई में आम आदमी के ‘घर’ के सपने को करोड़ों की ठगी ने कुचल दिया है। सत्ता, व्यवस्था और प्रशासन तीनों के सामने सवाल एक ही है कि जनता का भरोसा आखिर कब तक बचा रहेगा?
क्या असली मुद्दों से डर रही है सत्ता?
सूत्रों के अनुसार, विदर्भ की मंडल यात्रा केवल एक यात्रा नहीं बल्कि आने वाले राजनीतिक संघर्ष का ट्रेलर मानी जा रही है। जातीय जनगणना, ओबीसी अधिकार, किसानों की जमीन और छात्रों के आंदोलन, ये चारों मुद्दे आने वाले समय में सत्ता के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सरकार विकास के नाम पर परियोजनाएं आगे बढ़ाना चाहती है, लेकिन यदि विकास का मतलब किसानों की जमीन छीनना और युवाओं की आवाज दबाना है, तो विरोध स्वाभाविक है। संघ के नेताओं द्वारा छात्रों पर की गई कथित टिप्पणियों ने भी आग में घी डालने का काम किया है। इतिहास गवाह है कि जिस देश में छात्र सवाल पूछना छोड़ देते हैं, वहां लोकतंत्र धीरे-धीरे भाषणों का वैâदी बन जाता है। कानाफूसी यह भी है कि ओबीसी नेतृत्व की उपेक्षा को लेकर सत्ता पक्ष के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है और आनेवाले दिनों में इसके राजनीतिक परिणाम दिखाई दे सकते हैं।
एक घर, सत्रह किरायेदार!
मुंबई में घर खरीदना या किराये पर लेना पहले ही किसी युद्ध से कम नहीं था। अब हालत यह है कि एक ही घर सत्रह लोगों को किराये पर देकर करोड़ों की ठगी की जा रही है। सबसे बड़ा प्रश्न केवल आरोपी पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर है जहां बैंक की जब्त संपत्ति भी लोगों को किराये पर दिखाई जाती है और प्रशासन को भनक तक नहीं लगती। सूत्रों के अनुसार, ऐसे कई मामलों में स्थानीय स्तर पर दलालों, दस्तावेज तैयार करने वालों और कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका की भी चर्चा होती रहती है। यदि यह सच है तो यह केवल धोखाधड़ी नहीं, बल्कि आम नागरिक के सपनों की सामूहिक हत्या है।
