-डॉ. रवीन्द्र कुमार
एक बाबा जी ने ऐलान किया है कि ‘ए’ फॉर एपल एक विदेशी अवधारणा है। हम भारतीयों को ‘ए’ फॉर एपल नहीं, बल्कि ‘ए’ फॉर अमरूद पढ़ाया जाना चाहिए। मुझे यह बहुत पसंद आया। सच है, हमको ये अल्फाबेट दोबारा से लिखने का वक्त आ गया है। पूरी की पूरी बारहखड़ी दोबारा लिखने का वक्त आ गया है।
पहले कभी जोक के तौर पर सुना था—‘ए’ से एपल, ‘बी’ से बड़ा एपल, ‘सी’ से छोटा एपल, ‘डी’ से दो एपल, ‘ई’ से एक और एपल, ‘एफ’ से फिर एक एपल, ‘जी’ से गला हुआ एपल… हम उस पीढ़ी के हैं, जिसमें ‘ज’ से जवाहरलाल पढ़ा है। अब मुझे लगता है कि नई बारहखड़ी होनी चाहिए:
‘ए’ से अमरूद। ‘बी’ से बेर, बेल पत्थर, बैंगन, बंद गोभी, भिंडी, बथुआ। ‘सी’ से कमरख, केला, चीकू। ‘डी’ से दम आलू। ‘ई’ से ईख। ‘एफ’ से फालसे। ‘जी’ से गाजर, गूलर फल, गन्ना, गोभी, ग्वार की फली। ‘एच’ से हरी मिर्च, हरा धनिया। ‘आई’ से इमली। ‘जे’ से जामुन, जंगल जलेबी, जिमीकंद। ‘के’ से करोंदा, कंदमूल, कटहल, कीनू, करेला, कद्दू, करी पत्ता, कमल ककड़ी। ‘एल’ से लीची, लाल मिर्च, लौकी, लहसुन। ‘एम’ से मूली, मौसंबी, मेथी, मटर। ‘एन’ से नारियल, नींबू। ‘पी’ से पपीता, प्याज, पत्ता गोभी, परवल, पालक, पुदीना। ‘आर’ से रामफल, रसभरी। ‘एस’ से शहतूत, शकरकंद, सहजन, संतरा, शरीफा, सिंघाड़ा, शिमला मिर्च, सरसों का साग, शकरकंदी। ‘टी’ से टमाटर, तरबूज, तोरई, टिंडा आदि।
अब जब हम इस टॉपिक पर हैं ही, तो लगे हाथ सिलेबस के अन्य चैप्टर भी रिवाइज कर डाले जाएँ। मसलन, सभी इंग्लिश की कविताएँ जो बच्चों को सिखाई जाती हैं। सब या तो झूठ सिखाती हैं या सेल्फिश होना या बस खिलखिला कर हँसना। जिंदगी के संजीदा पहलुओं पर इन ‘पोयम्स’ से कोई मदद नहीं मिलती है। हमारे पास कविताओं, श्लोक, दोहों, चौपाइयों की कोई कमी नहीं है। एक कमेटी का गठन किया जाए। कमेटी बढ़िया-बढ़िया चौपाई छाँट सकती है, ताकि हमारी भावी पीढ़ी संस्कारी बन सके।
इसी तरह ये जितने भी विदेशी लेखकों की कहानियाँ और उपन्यास-नाटक पढ़ाए जाते हैं, सब के सब तुरंत प्रभाव से बंद किए जाने चाहिए। क्या जरूरत है हमें ये सब शेक्सपियर, टॉल्स्टॉय, चार्ल्स डिकेंस, मार्क ट्वेन पढ़ने-पढ़ाने की? हम ये पढ़-पढ़कर ही अपनी संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं।
यूँ देखा जाए तो एक बात बताओ, पढ़ने की दरकार क्या है? बशीर बद्र साहब का एक शेर है:
जी बहुत चाहता है सच बोलें, क्या करें हौसला नहीं होता
रात का इंतिज़ार कौन करे, आजकल दिन में क्या नहीं होता
बस कुछ इसी तर्ज पर हमारे दौर का तर्जुमा है:
जी बहुत चाहता है पढ़ें-लिखें, क्या करें हौसला नहीं होता
डिग्री का इंतिज़ार कौन करे, आजकल बिन डिग्री क्या नहीं होता
नोट: विडंबना ये है कि अमरूद भारतीय नहीं है। दक्षिण अमेरिका से भारत में आया।
