सामना संवाददाता / मुंबई
हिंदी फिल्म, टेलीविजन और संगीत जगत से लगभग 15 वर्षों तक जुड़े रहे अभिनेता, टेलीविजन कलाकार एवं तबला-पखावज वादक प्रेम वल्लभ पंड्या का हाल ही में निधन हो गया। उनके निधन से फिल्म, टेलीविजन और संगीत जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। कला के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले प्रेम वल्लभ पंड्या एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे।
प्रेम वल्लभ पंड्या एक सिद्धहस्त तबला और पखावज वादक थे। उन्होंने देशभर के अनेक प्रतिष्ठित मंचों के साथ-साथ दूरदर्शन और आकाशवाणी जैसे राष्ट्रीय प्रसारण माध्यमों पर भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। भारत के विभिन्न शहरों के अलावा उन्होंने विदेशों में आयोजित ऑर्केस्ट्रा कार्यक्रमों, संगीत समारोहों और लाइव प्रस्तुतियों में भी भाग लिया। हिंदी फिल्मों में तबला, पखावज और पारंपरिक तालवाद्य वादन के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा तथा उन्होंने कई प्रतिष्ठित फिल्म संगीत निर्देशकों के साथ कार्य किया।
अभिनय के क्षेत्र में भी प्रेम वल्लभ पंड्या ने अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने ‘ऑफिस ऑफिस’, ‘लापतागंज’, ‘चिड़ियाघर’, ‘जीजाजी छत पर हैं’, ‘मे आई कम इन मैडम’, ‘भाभीजी घर पर हैं’, ‘कसौटी जिंदगी की’ और ‘हप्पू की उलटन पलटन’ जैसे लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिकों में अभिनय किया। इसके अलावा ‘ओह माय फ्रेंड गणेशा’ और ‘रामा रामा क्या है ड्रामा’ जैसी हिंदी फिल्मों से भी उनका जुड़ाव रहा।
प्रेम वल्लभ पंड्या, स्वर्गीय पंडित भगवानजी पंड्या के सुपुत्र थे। पंडित भगवानजी पंड्या भारत के प्रतिष्ठित तबला और पखावज वादकों में से एक थे तथा भारत सरकार के सांस्कृतिक राजदूत (कल्चरल एम्बेसडर) के रूप में भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति का देश-विदेश में प्रतिनिधित्व कर चुके थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भारतीय संगीत की साधना और उसके वैश्विक प्रसार को समर्पित किया।
पिता से प्राप्त समृद्ध संगीत परंपरा और संस्कारों को प्रेम वल्लभ पंड्या ने अपनी साधना के माध्यम से आगे बढ़ाया। उन्होंने तबला और पखावज वादन की कठिन एवं सूक्ष्म विधाओं में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया और देश-विदेश के अनेक मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। पिता-पुत्र की इस संगीत परंपरा ने भारतीय संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दोनों ने फिजी में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के अंतर्गत भी अपनी कला का प्रदर्शन किया था, जिसे व्यापक सराहना मिली थी।
प्रेम वल्लभ पंड्या का जीवन इस बात का प्रेरणादायक उदाहरण है कि कला केवल एक पेशा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से आगे बढ़ने वाली साधना, संस्कृति और संस्कारों की अमूल्य धरोहर है। उनके निधन से कला जगत ने एक समर्पित कलाकार और संगीत साधक को खो दिया है।
