मुख्यपृष्ठस्तंभफिर १०० एयरपोर्ट का सपना... पहले पुराने ‘उड़ान’ का हिसाब तो दीजिए!

फिर १०० एयरपोर्ट का सपना… पहले पुराने ‘उड़ान’ का हिसाब तो दीजिए!

-यूपी चुनाव से पहले खूब उड़े थे उद्घाटन के गुब्बारे,
कुशीनगर में अब नियमित फ्लाइट तक नहीं
-सवाल, एयरपोर्ट बनाना उपलब्धि है या वहां से लगातार विमान उड़ाना?
-१०० नए एयरपोर्ट बनाने से पहले सवाल उन एयरपोर्टों का भी है, जिन्हें पिछली बार इसी तरह बड़ी उपलब्धि बताकर जनता के सामने पेश किया गया था।

नई दिल्ली। आम आदमी को हवाई यात्रा से जोड़ने के नारे के साथ शुरू हुई केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘उड़े देश का आम नागरिक’ यानी `उड़ान’ योजना अब एक बार फिर नए अवतार में उड़ान भरने जा रही है। केंद्र ने श्द्ग्fग् ळDAर्‍ के तहत अगले दस वर्षों में १०० नए एयरपोर्ट और २०० आधुनिक हेलीपैड विकसित करने का लक्ष्य रखा है। करीब २८,८४० करोड़ रुपए के इस कार्यक्रम में राज्यों से प्रस्ताव मांगे जा रहे हैं और जमीन, तकनीकी व्यवहार्यता तथा संभावित यात्रियों की संख्या के आधार पर स्थान चुने जाएंगे।
सुनने में योजना शानदार है। दूर-दराज के शहर विमान सेवा से जुड़ें, छोटे शहरों के लोगों को दिल्ली-मुंबई जाने के लिए पहले बड़े शहर की ट्रेन न पकड़नी पड़े, इसका विरोध कौन करेगा? लेकिन १०० नए एयरपोर्ट बनाने से पहले सवाल उन एयरपोर्टों का भी है, जिन्हें पिछली बार इसी तरह बड़ी उपलब्धि बताकर जनता के सामने पेश किया गया था।
चुनाव से पहले यूपी में हवाई अड्डों की बहार
२०२२ के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में एयर कनेक्टिविटी को विकास के बड़े प्रतीक के तौर पर प्रचारित किया गया था। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक अगस्त २०२२ तक उत्तर प्रदेश में ळDAर्‍ के तहत आगरा, कानपुर, हिंडन (गाजियाबाद), बरेली, कुशीनगर और प्रयागराज, छह एयरपोर्ट सूचीबद्ध थे।
नवंबर २०२१ में केंद्र सरकार के अपने प्रचार साहित्य में भी कहा गया था कि आगरा, हिंडन, कानपुर, बरेली और प्रयागराज एयरपोर्ट ळDAर्‍ के तहत चालू हो चुके हैं। इनमें बरेली से व्यावसायिक उड़ान मार्च २०२१ में शुरू हुई। इसके बाद सबसे ज्यादा राजनीतिक चमक कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट को मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २० अक्टूबर २०२१ को इसका उद्घाटन किया। करीब २६० करोड़ रुपए की लागत वाले इस एयरपोर्ट को बौद्ध सर्किट को दुनिया से जोड़ने और पूर्वी उत्तर प्रदेश-बिहार में पर्यटन तथा रोजगार का नया द्वार बताया गया था। उद्घाटन के दिन श्रीलंका से बौद्ध भिक्षुओं और प्रतिनिधियों को लेकर विशेष विमान भी उतरा।
लेकिन कुशीनगर की ‘उड़ान’ कहां गई?
यहीं से नई योजना पर सबसे गंभीर सवाल खड़ा होता है। फरवरी २०२५ में संसद में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने स्वयं स्वीकार किया कि कुशीनगर एयरपोर्ट चालू स्थिति में होने के बावजूद वहां कोई निर्धारित नियमित यात्री विमान सेवा नहीं चल रही थी। सरकार ने बताया कि ळDAर्‍ ४.१ में कुशीनगर-हिंडन मार्ग एज्ग्मवू को दिया गया था, लेकिन कंपनी ने हिंडन के बजाय दिल्ली से २६ नवंबर २०२१ को सेवा शुरू की और ४ नवंबर २०२३ को वह सेवा भी बंद हो गई।
मई २०२६ तक स्थिति यह थी कि AAघ् के वरिष्ठ अधिकारी ने कुशीनगर सहित कुछ यूपी एयरपोर्टों के संदर्भ में उड़ानें न चलने की समस्या स्वीकार करते हुए छोटे उपयुक्त विमानों की कमी को एक प्रमुख बाधा बताया। यानी जिस एयरपोर्ट को चुनाव से कुछ महीने पहले पूर्वांचल की अंतर्राष्ट्रीय कनेक्टिविटी का बड़ा द्वार बताया गया था, वहां विमान उड़ाने के लिए एयरलाइन ही नहीं थी।
यह तथ्य नई ळDAर्‍ योजना के सामने सबसे बड़ी चेतावनी है, रनवे बना देना और फीता काट देना आसान है, लेकिन वर्षों तक नियमित और आर्थिक रूप से व्यवहार्य विमान सेवा चलाना अलग चुनौती है।
पुराना लक्ष्य पूरा हुआ या नया लक्ष्य आगे कर दिया?
इस कहानी का एक और दिलचस्प पहलू है। सरकार ने २०२२ में कहा था कि वह २०२४ तक १०० नए एयरपोर्ट और २०२६ तक ळDAर्‍ में १,००० नए रूट विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।
अब २०२६ में फिर अगले चरण में १०० एयरपोर्ट विकसित करने का लक्ष्य सामने है। फर्क यह है कि श्द्ग्fग् ळDAर्‍ में सरकार पुराने अनुभवों से कुछ सबक लेती दिखाई देती है, एयरलाइंस को न्न्ग्aंग्त्ग्ूब् उaज् इल्ह्ग्हु की अवधि बढ़ाने, कुछ क्षेत्रीय एयरपोर्टों को संचालन और रखरखाव सहायता देने तथा राज्यों को ज्यादा जिम्मेदारी देने की व्यवस्था की गई है।
सवाल इसलिए घोषणा पर नहीं, टिकाऊ ‘उड़ान’ पर है
१०० नए एयरपोर्ट और २०० हेलीपैड बनना निश्चित रूप से देश के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन सरकार को प्रत्येक नए प्रस्ताव से पहले यह बताना चाहिए कि वहां वास्तविक यात्री मांग कितनी है, कौन-सी एयरलाइन सेवा देगी, कितने वर्षों तक उड़ान सुनिश्चित होगी और सरकारी सहायता समाप्त होने के बाद वह रूट अपने पैरों पर खड़ा रह पाएगा या नहीं। वरना खतरा यही है कि चुनाव के आसपास एयरपोर्ट का उद्घाटन हो, नेताओं के भाषण हों, कैमरों के सामने पहली फ्लाइट उतरे और कुछ वर्षों बाद करोड़ों रुपये की चमचमाती टर्मिनल बिल्डिंग अगली नियमित उड़ान का इंतजार करती रह जाए। ळDAर्‍ की सफलता का पैमाना एयरपोर्टों की गिनती नहीं होना चाहिए। असली पैमाना यह होना चाहिए, कितने एयरपोर्टों से आम नागरिक आज भी नियमित रूप से ‘उड़’ रहा है।

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