मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा: मलबे में दबती मुंबई!

फलसफा: मलबे में दबती मुंबई!

सना खान

-हर दिन ८,००० टन कचरा-विकास या विनाश?

सुबह के ८ बजे थे। मुंबई की एक व्यस्त सड़क पर लोग अपने-अपने काम के लिए भाग रहे थे। ट्रैफिक, हॉर्न और भागती जिंदगा- सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन उसी सड़क के किनारे, एक खाली प्लॉट में ट्रकों से गिरता मलबा एक अलग कहानी बयां कर रहा था। यह सिर्फ टूटे पत्थर और सीमेंट नहीं थे- यह मुंबई के ‘विकास’ की असली कीमत थी।
मुंबई, जिसे देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है, आज एक ऐसे संकट से जूझ रही है, जिसे हम देख तो रहे हैं, लेकिन नजरअंदाज कर रहे हैं- निर्माण और ध्वस्तीकरण (सी एंड डी) कचरा। रिपोर्ट्स बताती हैं कि शहर में हर दिन करीब ८,००० टन निर्माण कचरा निकल रहा है। यह आंकड़ा चौंकाने वाला है, क्योंकि यह शहर के घरेलू कचरे (करीब ७,००० टन) से भी ज्यादा है। कुछ साल पहले तक यह संख्या सिर्फ १,००० टन थी।
हाल ही में मनपा ने निर्माण मलबे को ट्रैक करने के लिए डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करने की प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर अभी सीमित ही नजर आ रहा है। यानी मुंबई जितनी तेजी से बन रही है, उतनी ही तेजी से बिखर भी रही है।
शहर के अलग-अलग इलाकों में हजारों इमारतें रीडेवलपमेंट में हैं। म्हाडा, एसआरए और बड़े इंप्रâास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स- हर जगह तोड़-फोड़ जारी है। लेकिन इस विकास की रफ्तार के साथ कचरा प्रबंधन कदम से कदम नहीं मिला पा रहा। शहर में सी एंड डी वेस्ट प्रोसेसिंग की क्षमता सिर्फ १,२०० टन प्रतिदिन है, जबकि मलबा ८,००० टन तक पहुंच चुका है। बाकी का मलबा कहां जा रहा है? जवाब साफ है- नालों में…, मैंग्रोव्स में… और शहर की सांसों में। हर मानसून में जब मुंबई पानी में डूबती है, तब लोग सवाल करते हैं-‘ऐसा क्यों होता है?’ लेकिन शायद जवाब हमारे सामने ही है, बस हम उसे स्वीकार नहीं करना चाहते। यह सिर्फ गंदगी नहीं है। यह एक सिस्टम की कमजोरी है और जिम्मेदारी से बचने की आदत भी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बढ़ते मलबे के लिए जिम्मेदार कौन है- बिल्डर, ठेकेदार या सिस्टम? मुंबई आज एक मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ विकास की ऊंची इमारतें हैं, और दूसरी तरफ उसी विकास का मलबा, जो शहर को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि शहर कितना आगे बढ़ रहा है- सवाल यह है कि क्या वह अपने ही बोझ को संभाल पा रहा है? मुंबई को सिर्फ इमारतें नहीं, जिम्मेदारी भी चाहिए। वरना विकास के नाम पर खड़ा हो रहा हर ढांचा, एक दिन इसी शहर के लिए बोझ बन जाएगा।

अन्य समाचार