के.पी. मलिक
क्या किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति को देश के युवाओं से राष्ट्र के लिए समर्पण की अपील करने का नैतिक अधिकार है, यदि उसकी अपनी निजी और पारिवारिक पसंद को लेकर भी सार्वजनिक सवाल उठ रहे हों? क्या राष्ट्रभक्ति केवल युवाओं के लिए एक संदेश है या फिर सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए भी एक समान नैतिक कसौटी होनी चाहिए?
सार्वजनिक जीवन में आचरण
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल के हालिया बयान के बाद देश में यही बहस तेज हो गई है। उन्होंने युवाओं से राष्ट्र निर्माण और देशहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आह्वान किया। पहली नजर में यह संदेश प्रेरणादायक और स्वाभाविक लगता है। आखिर हर राष्ट्र चाहता है कि उसकी युवा पीढ़ी देश के विकास, सुरक्षा और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति समर्पित रहे। लेकिन लोकतंत्र में किसी भी सार्वजनिक संदेश का मूल्य केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके संदर्भ, वक्ता की सार्वजनिक भूमिका और समाज की बदलती राजनीतिक चेतना से भी तय होता है।
दरअसल, बहस यहीं से शुरू होती है, अजीत डोभाल केवल एक सेवानिवृत्त अधिकारी नहीं हैं। वे पिछले कई वर्षों से देश के सबसे प्रभावशाली संवैधानिक-प्रशासनिक पदों में से एक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, आतंकवाद-रोधी रणनीति और सामरिक निर्णयों में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में उनके किसी भी सार्वजनिक वक्तव्य को केवल व्यक्तिगत विचार नहीं माना जाता, बल्कि उसे सत्ता प्रतिष्ठान के व्यापक संदेश के रूप में भी देखा जाता है। यही कारण है कि उनके बयान के बाद युवाओं ने केवल संदेश नहीं सुना, बल्कि संदेश देने वाले व्यक्ति से भी सवाल पूछने शुरू कर दिए। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है। सार्वजनिक जीवन में जितना बड़ा पद होता है, उतनी ही बड़ी जवाबदेही भी होती है। जनता केवल यह नहीं जानना चाहती कि नेता या अधिकारी क्या कह रहे हैं, बल्कि यह भी जानना चाहती है कि क्या उनके अपने जीवन और सार्वजनिक आचरण में वही मूल्य दिखाई देते हैं, जिनका वे दूसरों से पालन करने का आग्रह कर रहे हैं। यहीं ‘नैतिक अधिकार’ की अवधारणा सामने आती है। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की वैधानिक शक्ति और नैतिक विश्वसनीयता दो अलग-अलग बातें हैं। कानून किसी पद को अधिकार देता है, लेकिन जनता का विश्वास उसके शब्दों को नैतिक शक्ति देता है। यदि नागरिक सवाल पूछते हैं कि क्या सार्वजनिक जीवन में सभी के लिए समान मानदंड होने चाहिए तो यह लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी परिपक्वता का संकेत है। हालांकि, इस बहस में एक सावधानी भी आवश्यक है। किसी सार्वजनिक व्यक्ति के परिवार के सदस्यों के निजी निर्णयों को स्वत: उस व्यक्ति के सार्वजनिक कर्तव्यों का प्रमाण या खंडन मान लेना उचित नहीं होगा। वयस्क परिजन अपने स्वतंत्र निर्णय लेते हैं। इसलिए आलोचना का केंद्र व्यक्तिगत आरोपों के बजाय सार्वजनिक दावों, नीतियों और आचरण की संगति होना चाहिए। लोकतांत्रिक विमर्श तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि केवल धारणाओं पर।
त्याग और समर्पण की अपेक्षा
दरअसल, भारत की नई पीढ़ी, विशेषकर जेन-जी, पहले की पीढ़ियों की तुलना में कहीं अधिक प्रश्न पूछती है। वह केवल भाषणों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि प्रमाण, पारदर्शिता और समान मानदंड की अपेक्षा करती है। यही कारण है कि आज राष्ट्रवाद की परिभाषा भी बदलती दिखाई दे रही है। नई पीढ़ी के लिए राष्ट्रभक्ति का अर्थ केवल नारे लगाना नहीं, बल्कि संविधान का सम्मान करना, संस्थाओं को मजबूत बनाना, ईमानदारी से कर देना, कानून का पालन करना, वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना और सत्ता से सवाल पूछने की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना भी है।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)
यही वह बिंदु है जहां अजीत डोभाल का संदेश एक व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है। यदि युवाओं से राष्ट्रहित में त्याग और समर्पण की अपेक्षा की जाती है तो वे यह भी पूछेंगे कि क्या शासन व्यवस्था समान अवसर, निष्पक्ष संस्थाएं और जवाबदेह नेतृत्व सुनिश्चित कर रही है? लोकतंत्र में अधिकार और दायित्व दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं। नागरिकों से कर्तव्य निभाने की अपील तभी अधिक प्रभावी होती है जब शासन भी अपने दायित्वों के निर्वहन में पारदर्शी और उत्तरदायी दिखाई दे।
इस बहस का एक दूसरा आयाम भी है। अजीत डोभाल लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर हैं। उनके समर्थक इसे अनुभव, निरंतरता और जटिल सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की क्षमता का प्रमाण मानते हैं। उनका तर्क है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अनुभवी नेतृत्व राष्ट्रीय हित में स्थिरता प्रदान करता है। दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि किसी भी लोकतंत्र में लंबे समय तक अत्यधिक प्रभाव रखनेवाले पदों पर संस्थागत समीक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही पर चर्चा होना स्वाभाविक है। यह बहस किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के स्वरूप और शक्ति-संतुलन से जुड़ी है।
यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है। यहां किसी सार्वजनिक पदाधिकारी की बात का सम्मान किया जा सकता है, लेकिन उससे असहमति भी जताई जा सकती है। यहां राष्ट्रभक्ति और जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। एक मजबूत राष्ट्र वही होता है, जहां नागरिक देश से प्रेम भी करें और सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस भी रखें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राष्ट्र निर्माण केवल युवाओं की जिम्मेदारी नहीं है। यह समान रूप से राजनेताओं, नौकरशाहों, न्यायपालिका, मीडिया, उद्योग, शिक्षकों और प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। यदि युवाओं से त्याग की अपेक्षा की जाती है तो सत्ता से पारदर्शिता की अपेक्षा भी उतनी ही स्वाभाविक है। यदि युवाओं से ईमानदारी की उम्मीद की जाती है, तो सार्वजनिक जीवन में बैठे लोगों से भी उसी ईमानदारी का प्रदर्शन अपेक्षित होगा।
सार्वजनिक जवाबदेही!
आखिरकार, असली प्रश्न यह नहीं है कि अजीत डोभाल का संदेश सही था या गलत। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति की अपील उसके पद से नहीं, बल्कि उसकी नैतिक विश्वसनीयता, सार्वजनिक जवाबदेही और आचरण की संगति के आधार पर परखी जाएगी। यदि ऐसा है, तो यह केवल अजीत डोभाल की नहीं, बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र की बदलती राजनीतिक संस्कृति की कहानी है। एक ऐसी संस्कृति, जहाँ राष्ट्रभक्ति का अर्थ अंधस्वीकार नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता है; जहां सम्मान और सवाल साथ-साथ चल सकते हैं; और जहां देश के प्रति समर्पण की शुरुआत सत्ता और समाज-दोनों के लिए समान नैतिक मानदंडों से होती है।
