भारत देश का स्वतंत्रता दिवस हमेशा की तरह मनाया जा रहा है। पिछले दस-बारह वर्षों में देश का स्वतंत्रता दिवस मानो भाजपा या संघ परिवार का स्वतंत्रता दिवस हो, इस तरह के राजनीतिक उत्सव के अंदाज में मनाया जाता है। प्रधानमंत्री मोदी लाल किले पर आते हैं। तरह-तरह की पगड़ियां और कपड़े पहनते हैं। जिस राज्य में भविष्य में चुनाव होनेवाला होता है, वे उसी राज्य की पगड़ी और पहनावा धारण करते हैं; यानी स्वतंत्रता दिवस पर भी वे राजनीतिक नफे-नुकसान का हिसाब लगाते हैं। इस अवसर पर वे भाजपा-प्रायोजित कार्यक्रम चलाते हैं। ऐसा ही इस बार भी हुआ। स्वतंत्रता दिवस से पहले उन्होंने ‘तिरंगा यात्रा’ का आयोजन किया और उसकी जमकर विज्ञापनबाजी की। मानो भारत में पहली बार तिरंगा फहराया जा रहा हो। ‘हम ही भारतीय तिरंगे के निर्माता और रक्षक हैं’, इसी अंदाज में ‘यात्राएं’ निकाली गईं। स्वतंत्रता के लिए १९४७ से पहले जो प्रभात फेरियां हुईं, हाथ में तिरंगा लेकर जो सत्याग्रह हुए, उनमें भाजपा कहीं दिखाई नहीं दी। जिन्होंने कभी ‘तिरंगा’ शब्द के प्रति प्रेम और आत्मीयता नहीं दिखाई, उन भाजपा वालों को अचानक तिरंगे झंडे की याद आ गई। जगह-जगह ‘तिरंगा यात्रा’ निकालकर
देशभक्ति का नाटक
किया गया। एक तरफ ‘तिरंगा यात्रा’ और दूसरी तरफ ‘हर घर तिरंगा’ अभियान, इस तरह से भाजपा वालों का राष्ट्रप्रेम उफन पड़ा। इसके लिए उन्होंने देश के आज के स्वतंत्रता दिवस का बहाना ढूंढा। उस भावुक माहौल का राजनीतिक फायदा उठाने और ‘हम भी देशभक्त हैं’ यह दिखाने के लिए सत्ताधारी दल ने ‘तिरंगा यात्रा’ का सारा प्रपंच रचा। भाजपा और ‘इवेंट’ एक ही सिक्के के दो पहलू होने के कारण, स्वतंत्रता दिवस, भारत का राष्ट्रध्वज और ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रगीत का भी उन्होंने ‘इवेंट’ बना दिया। जिस मंडली ने कभी देश के स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लिया, लाठियां नहीं खाईं, खून नहीं बहाया; जिन्होंने आजादी के बाद ५० सालों तक नागपुर स्थित अपने मुख्यालय पर तिरंगा झंडा नहीं फहराया; जिस पर तीखी आलोचना होने के बावजूद जिन्होंने उसे अनदेखा ही किया, उन्हें इस साल अचानक तिरंगे झंडे के प्रति इतना प्रेम क्यों उमड़ पड़ा? देशभर में ‘तिरंगा यात्रा’ निकालने की जरूरत क्यों महसूस हुई? जगह-जगह हाथ में तिरंगा लेकर रैलियां क्यों निकालनी पड़ीं? तिरंगे झंडे के बड़े-बड़े बैनर क्यों लगाने पड़े? नागपुर की ‘तिरंगा यात्रा’ में यही मंडली पूरे ७०० फीट का तिरंगा झंडा लेकर प्रदर्शन कर रही थी। कितनी
नौटंकी
करोगे? आपका यह तिरंगा और ‘वंदे मातरम’ का प्रेम दिखावटी है। हजारों-लाखों स्वतंत्रता सेनानी देश के लिए यही तिरंगा हाथ में लेकर और ‘वंदे मातरम’ गाते हुए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए। उस समय के ये ‘तिरंगावीर’ अपने बिलों में छिपे बैठे थे। आजादी के बाद भी इन्हें न कभी तिरंगे की याद आई, न उसे फहराने की इच्छा हुई। आज उन्हें यह पूरा ‘इवेंट’ करना पड़ा, क्योंकि ‘जंतर-मंतर’ के आंदोलन और कई अन्य कारणों से भाजपा वालों के पैरों तले जमीन खिसक चुकी है। उनकी देशभक्ति का नकाब उतर चुका है। २०१४ में मोदी सरकार की स्थापना को भाजपा वाले और मोदीभक्त ‘देश की असली आजादी का सूर्योदय’ बताकर शेखी बघार रहे थे। लेकिन अब उन्हें अपनी सत्ता का ‘अस्त’ तय होने का एहसास हो गया है। इसीलिए, जो कभी केवल सरकारी ‘कर्तव्य’ समझकर ही ध्वजारोहण करते थे, आज उनके अपने फोटो के साथ तिरंगे के बड़े-बड़े कट-आउट्स लगाने की नौबत आ गई है। जिन्होंने आजादी के पांच दशकों तक अपनी मातृ-संस्था के मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया, उन्हें लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करके ‘तिरंगा यात्रा’ का इवेंट करना पड़ रहा है।
