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अंदर की बात: साइबर सुरक्षा, सुप्रीम कोर्ट की फटकार और चाकण की समस्या?

राजन पारकर

मुंबई की आर्थिक ताकत को साइबर हमलों से बचाने की चिंता सरकार को सताने लगी है, सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को अंतरिम आदेशों में ‘मिनी-ट्रायल’ से दूर रहने की नसीहत दी है और चाकण के उद्योग जगत को सड़क, ट्रैफिक और बुनियादी सुविधाओं के लिए फिर आश्वासन मिला है। तीनों खबरों को जोड़कर देखें तो एक ही तस्वीर सामने आती है कि व्यवस्था को खतरे का अहसास अक्सर समस्या खड़ी होने के बाद ही क्यों होता है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि घोषणाओं और बैठकों से आगे अब प्रशासनिक मशीनरी को परिणाम भी दिखाने होंगे।
अब ‘फाइल’ नहीं, आर्थिक सुरक्षा का सवाल!
मुंबई की साइबर सुरक्षा को राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का हिस्सा बताया गया है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री आशीष शेलार ने भारत-इजरायल साइबर सहयोग मजबूत करने की बात कही है। बात बिल्कुल सही है कि क्योंकि मुंबई की धड़कन सिर्फ मंत्रालय और मनपा में नहीं, बल्कि शेयर बाजार, बैंकिंग, वित्तीय संस्थानों और उद्योगों में भी चलती है। लेकिन अंदर की बात यह है कि साइबर सुरक्षा पर भाषण जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है उसे जमीन पर उतारना Aघ् क्वांटम कंप्यूटिंग और बिग डेटा की बातें हो रही हैं; मगर सवाल यह है कि मुंबई की सरकारी वेबसाइटें, स्थानीय प्रशासन के डिजिटल सिस्टम और नागरिकों का डेटा वास्तव में कितने सुरक्षित हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आने वाले दिनों में साइबर सुरक्षा को लेकर महाराष्ट्र में बड़े स्तर पर नई व्यवस्था और विशेषज्ञों की नियुक्तियों की हलचल दिखाई दे सकती है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि हमला कौन करेगा, सवाल यह भी है कि हमला होने पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘मिनी-ट्रायल’ पर अदालतों को दिखाई लाल बत्ती!
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक के मामलों में अदालतों द्वारा मुकदमे के अंतिम गुण-दोष पर लंबी बहस करने और ‘मिनी-ट्रायल’ चलाने की प्रवृत्ति पर कड़ी आपत्ति जताई है। यानी मामला अंतरिम है तो फैसला भी अंतरिम सोच के दायरे में रहना चाहिए। अदालत को प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति इन तीन कसौटियों पर निर्णय लेना है; मुकदमे की पूरी बारात अंतरिम आदेश में नहीं निकालनी है। हमारे न्यायिक तंत्र में कभी-कभी अंतरिम आदेश इतना लंबा हो जाता है कि असली मुकदमा पढ़ने की जरूरत ही महसूस न हो! सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के ‘मिनी-ट्रायल’ वाले दृष्टिकोण को खारिज करते हुए निचली अदालत के विवेक का सम्मान करने की आवश्यकता दोहराई। कानूनी गलियारों में चर्चा है कि यह पैâसला सिर्फ एक मामले तक सीमित नहीं रहेगा। अंतरिम राहत के नाम पर दस्तावेजों की गहराई में जाकर मुकदमे का संभावित अंतिम पैâसला लिख देने की प्रवृत्ति पर अब न्यायिक स्तर पर ज्यादा सतर्कता देखने को मिल सकती है। क्योंकि अंतरिम आदेश का काम मुकदमा खत्म करना नहीं, मुकदमा चलने तक न्याय का संतुलन बनाए रखना है।
चाकण की सड़कें, उद्योग बढ़ा, मगर ट्रैफिक वहीं खड़ा!
चाकण एमआईडीसी की सड़कें, ट्रैफिक जाम और बुनियादी सुविधाओं की समस्या हल करने का आश्वासन उप मुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने दिया है। उद्योग प्रतिनिधियों से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक बैठक होगी और प्रशासन को तत्काल उपायों के निर्देश दिए गए हैं। अच्छी बात है। लेकिन चाकण के उद्योग जगत के लिए यह सवाल नया नहीं है। सड़कें पुरानी, ट्रैफिक पुराना, शिकायतें पुरानी और आश्वासन भी पुराने, फिर नया क्या है? चर्चा है कि चाकण की औद्योगिक ताकत का इस्तेमाल महाराष्ट्र की आर्थिक तस्वीर चमकाने के लिए तो खूब किया जाता है, लेकिन उस ताकत को चलाने वाली सड़क, परिवहन और नागरिक सुविधाओं की व्यवस्था पर उतनी तेजी से काम नहीं हुआ। अब उप मुख्यमंत्री ने खुद वरिष्ठ अधिकारियों को सक्रिय किया है। देखना यह है कि बैठक पहले होती है या फिर अगली बैठक की तारीख तय करने के लिए एक और बैठक होती है! राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि चाकण जैसे औद्योगिक क्षेत्रों की समस्याएं आगामी आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों में महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती हैं। उद्योगों को सिर्फ निवेश के लिए बुलाना काफी नहीं; उन्हें सुचारु रूप से चलने के लिए सड़क भी चाहिए और व्यवस्था भी।

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