मुख्यपृष्ठनए समाचार‘निवेश के दावों की खुल गई पोल!’

‘निवेश के दावों की खुल गई पोल!’

-महाराष्ट्र में ३६,२११ कंपनियां बंद?
-कांग्रेस का सरकार पर जोरदार हमला

सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र को देश का औद्योगिक और आर्थिक इंजन बतानेवाली महायुति सरकार के सामने अब ३६,२११ कंपनियों के बंद होने का आंकड़ा राजनीतिक बम बनकर फूटा है। महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है। सपकाल का आरोप है कि सरकार एक तरफ महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर निवेश आने और रोजगार पैदा होने का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ पिछले पांच वित्तीय वर्षों में ३६,२११ निजी कंपनियों का बंद होना राज्य की जमीनी आर्थिक स्थिति की अलग तस्वीर दिखाता है।
सपकाल ने सवाल उठाया कि यदि महाराष्ट्र वास्तव में उद्योगों और निवेशकों की पहली पसंद बना हुआ है तो इतनी बड़ी संख्या में कंपनियां बंद क्यों हुईं? आखिर इन कंपनियों में काम करनेवाले कर्मचारियों का क्या हुआ? सरकार के कथित निवेश समझौतों और वास्तविक धरातल पर चल रहे उद्योगों के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों दिखाई दे रहा है? कांग्रेस का हमला सीधे सरकार के ‘निवेश मॉडल’ पर है। सपकाल का कहना है कि सरकार लगातार निवेश के आंकड़े पेश कर रही है, लेकिन कंपनियों के बंद होने का आंकड़ा रोजगार और उद्योगों की वास्तविक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। हालांकि, सरकार ने इस आंकड़े की अलग व्याख्या की है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ओर से कहा गया है कि बंद अथवा रजिस्टर से हटाई गई कंपनियों की पूरी संख्या को ‘चल रही कंपनियों के बंद होने’ के रूप में देखना सही नहीं होगा। सरकार के अनुसार, बड़ी संख्या में ऐसी कंपनियां थीं जो पहले से निष्क्रिय थीं या वास्तव में कारोबार शुरू ही नहीं कर पाई थीं। यहीं से असली राजनीतिक सवाल पैदा होता है। यदि कंपनियां निष्क्रिय थीं तो वे वर्षों तक सरकारी रजिस्टर में क्यों बनी रहीं? और यदि वे सक्रिय थीं तो उनके बंद होने की वजह क्या थी? सरकार को केवल आंकड़े की तकनीकी व्याख्या करने के बजाय यह भी बताना चाहिए कि महाराष्ट्र में वास्तविक कारोबार, उत्पादन और रोजगार की स्थिति क्या है।
निवेश की घोषणाएं कितनी जमीन पर उतर रही हैं
दूसरी ओर सरकार यह बताती रही है कि महाराष्ट्र में देश में सबसे अधिक सक्रिय कंपनियां और नए कंपनी पंजीकरण हैं। इसलिए लड़ाई सिर्फ ३६,२११ के आंकड़े की नहीं है। असली लड़ाई इस बात की है कि महाराष्ट्र में निवेश की घोषणाएं कितनी जमीन पर उतर रही हैं, कितनी कंपनियां वास्तव में उत्पादन कर रही हैं और उनसे कितने युवाओं को रोजगार मिल रहा है। सरकार आंकड़ों का बचाव कर सकती है, विपक्ष सवाल पूछ सकता है; लेकिन महाराष्ट्र के उद्योग जगत को भाषण नहीं, स्थिर माहौल, बेहतर बुनियादी ढांचा और रोजगार चाहिए। सपकाल के सवाल का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि कंपनी वार आंकड़ों और रोजगार के वास्तविक आंकड़ों से देना होगा। यही इस पूरे विवाद की असली परीक्षा है।

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