मुख्यपृष्ठटॉप समाचारमुंबई में मौत के मुहाने पर जर्जर इमारतों के लोग!

मुंबई में मौत के मुहाने पर जर्जर इमारतों के लोग!

-७६ मौतों के बाद भी नहीं खुली प्रशासन की नींद

सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है। आसमान छूती इमारतें, चमचमाती सड़कें, मेट्रो, कोस्टल रोड और अरबों रुपए की परियोजनाएं मुंबई के विकास की तस्वीर पेश करती हैं। लेकिन इसी चमकदार मुंबई के भीतर हजारों परिवार ऐसी पुरानी और जर्जर इमारतों में रहने को मजबूर हैं, जहां हर मानसून जिंदगी और मौत के बीच का फासला और कम कर देता है। पिछले साढ़े पांच वर्षों में मुंबई में इमारत गिरने की १,१७५ घटनाएं सामने आईं। इन हादसों में ७६ लोगों की मौत और ३३९ लोग घायल हुए। ये आंकड़े सिर्फ सरकारी कागज पर दर्ज संख्या नहीं हैं, बल्कि मुंबई के शहरी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान हैं।
हर वर्ष मानसून से पहले मनपा और प्रशासन द्वारा खतरनाक इमारतों का सर्वेक्षण किया जाता है। नोटिस जारी किए जाते हैं, कुछ मकानों को खाली कराने के आदेश दिए जाते हैं और अधिकारियों की बैठकें होती हैं। लेकिन बारिश शुरू होते ही जर्जर इमारतों की दीवारें प्रशासन के इन दावों की पोल खोल देती हैं।
-जर्जर इमारतों में रहनेवालों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?
-प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल
जब किसी इमारत को खतरनाक घोषित कर दिया जाता है तो उसके बाद वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? मुंबई में बड़ी संख्या में इमारतें दशकों पुरानी हैं। कई इमारतों में मरम्मत की जरूरत है तो कई पुनर्विकास की प्रतीक्षा में हैं। कहीं मकान मालिक और किरायेदारों का विवाद है, कहीं डेवलपर के साथ मामला अटका है और कहीं सरकारी मंजूरियों की फाइलें वर्षों से घूम रही हैं। इस लालफीताशाही की कीमत आखिरकार मुंबईकर अपनी जान देकर चुका रहे हैं।
१,१७५ घटनाएं और ७६ मौतें, क्या इसे महज हादसा कहकर सरकार अपना पल्ला झाड़ सकती है? औसतन, हर वर्ष २०० से अधिक इमारत गिरने की घटनाएं होना सामान्य स्थिति नहीं है। यह बताता है कि मुंबई की पुरानी इमारतों की सुरक्षा और पुनर्विकास व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर खामी है।
वैकल्पिक आवास की व्यवस्था नहीं
सबसे दुखद पहलू यह है कि जर्जर इमारतों में रहनेवाले अनेक परिवार आर्थिक मजबूरियों के कारण अपना घर खाली नहीं कर सकते। प्रशासन उन्हें खाली करने का नोटिस तो दे देता है, लेकिन सुरक्षित और सम्मानजनक वैकल्पिक आवास की व्यवस्था कितनी तेजी से होती है, यह बड़ा सवाल है। किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार को सिर्फ यह कह देना कि ‘इमारत खतरनाक है, घर खाली करो’, समस्या का समाधान नहीं है। मुंबई में मेट्रो और कोस्टल रोड जैसी विशाल परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। विकास जरूरी है, लेकिन मुंबईकर की जान से बड़ा कोई इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं हो सकता। यदि एक परिवार जर्जर छत के नीचे सोने से डरता है तो शहर के विकास के तमाम दावे खोखले लगते हैं।

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