सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई की फिल्मी दुनिया पर्दे पर अन्याय के खिलाफ लड़नेवाले नायक गढ़ती है। खलनायक को ललकारती है, व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करती है और लोकतंत्र, आजादी तथा इंसाफ के बड़े-बड़े संवाद बोलती है। लेकिन वैâमरा बंद होते ही क्या यही बॉलीवुड ताकतवर सत्ता के सामने घुटने टेक देता है? फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप ने इसी सवाल को बेबाकी से उठाया है।
कश्यप का कहना है कि बॉलीवुड में सत्ता या प्रभावशाली ताकतों के सामने झुकने की प्रवृत्ति अधिक है। उनके मुताबिक, असली समस्या उस पहली ‘हां’ से शुरू होती है, जब कोई व्यक्ति दबाव में किसी मांग को स्वीकार कर लेता है। इसके बाद मिलने वाले लाभ, रिश्ते और व्यावसायिक हित उस दरवाजे को बंद करना मुश्किल बना देते हैं। यह बयान केवल बॉलीवुड की अंदरूनी कार्यप्रणाली पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि सिनेमा, सत्ता और बाजार के बीच के रिश्ते पर भी सवाल खड़ा करता है।
करोड़ों के कारोबार के बीच स्वतंत्रता की कीमत
बॉलीवुड में करोड़ों रुपए का निवेश होता है। बड़े सितारों की फिल्में हजारों स्क्रीनों पर उतरती हैं। निर्माता को सेंसर, वितरण, प्रचार, थिएटर और बाजार, हर मोर्चे पर रास्ता चाहिए। ऐसे में किसी ताकतवर राजनीतिक या आर्थिक केंद्र से टकराने की कीमत बड़ी हो सकती है। यही वह जगह है, जहां ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘व्यावसायिक मजबूरी’ आमने-सामने खड़ी हो जाती हैं। कश्यप ने दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योगों का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी मजबूत क्षेत्रीय पहचान और हिंदी बाजार पर अपेक्षाकृत कम निर्भरता उन्हें ज्यादा स्वतंत्र बनाती है।
सवाल डर का या निर्भरता का?
सत्ता के सामने झुकना हमेशा किसी आदेश के बाद ही नहीं होता। कई बार सत्ता को नाराज करने का डर ही कलाकार को पहले से सावधान कर देता है। कौन-सा विषय उठाना है, किस मुद्दे पर फिल्म बनानी है, किस विवाद से दूरी बनाए रखनी है और किस मुद्दे पर चुप रहना है, इन पैâसलों में बाजार का दबाव धीरे-धीरे सेंसर की भूमिका निभाने लगता है। यही ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ लोकतंत्र के लिए अधिक चिंताजनक है। सेंसर बोर्ड द्वारा किसी दृश्य को काटना दिखाई देता है, लेकिन कलाकार का खुद अपनी कलम रोक लेना दिखाई नहीं देता।
