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रौबीलो राजस्थान: किताब रा खरीदवॉल

बुलाकी शर्मा / राजस्थान

पैला लिखण री खैचल फेर किताब छपावण री माथाफोड़ी।
वरिष्ठ कवि सरल विशारद जी अर म्हैं ‌गुप्ताजी रै झाड़ो देवण में लाग्योड़ा हा पण बे म्हांसूं डोढ़ हुंसियार। बोल्या, ‘बाऊसा रो नांव कायम राखण सारू घाटो खाय’र ई चलाय रैयो हूं। प्रकाशन रो धंधो छोड’र पिचकां रो गाडो लगावतो तो सोरो रैंवतो पण…!’
अचाणचक स्टूडेंट बरगा दो जवान आयग्या। ‘आप राजस्थानी बुक्स राखो क्या अंकल?’ अ‍ेक जणै पूछ्यो।
‘म्हारो काम बुक्स पब्लिकेशन अ‍ेंड सप्लाई रो ई है।’ गुप्ताजी सोपैâ सूं ऊभा हुयग्या, ‘राजस्थानी री जिकी किताबां चाइजै, कनलै कमरै री रैक्स में मिल जासी।’
बे कनलै कमरै में गया अर लारोलार गुप्ताजी। गुप्ताजी दस-पंदरै मिनट छेड़ै पाछा आयग्या पण बे स्टूडेंट आधी-पूण घंटा पछै किताबां हाथां में लियां आया।
दस-बारह किताबां सूं बेसी ई हुवैला। स्टूडेंट वाकई पढ़ैसरी है, बां री छांट्योड़ी किताबां में म्हां दोनां री किताबां देख’र म्हे जाणग्या। गुप्ताजी चेयर माथै बैठ’र बां रै पसंद करियोड़ी किताबां फिरोल’र कीमत देखण लाग्या।
‘पक्का बुर्जुवा और पूंजीवादी है यह गुप्ता,’ सरलजी भाई साब रो क्रांतिकारी कवि चेतन हुयग्यो, ‘कहता है बिजनेस लॉस में चल रहा और…’
‘भाई साब प्लीज‌,’ बिचालै ई बांनैं हाथ जोड़’र धीमै सुर में मून रैंवण री अरदास करी, ‘आपां आपांरी पांडुलिपियां चेपण नैं आयोड़ा हां।’ ‘सॉरी अंकल, टोटल बुक कोनी चाइजै, बुक्स में म्हैं जिका फ्लैग लगाया है, ओनली बे पेज। ‘
‘हिन्दी-इंग्लिश लिटरेचर री पास-बुक्स इजिली अवेलैबल है,’ दूजो बोल्यो, ‘बट अ‍ेमअ‍े राजस्थानी करणिया नैं भोत प्रॉब्लम है। ना पास-बुक्स, ना सिलेबस अनुसार बुक्स। कुछ सर नोट्स सेल करै बट बां नैं पढ्यां तसल्ली कोनी हुवै।’
म्हे अचंभै में। गुप्ताजी समझाय रैया हा, ‘पूरी किताब लैइजै, बीं रा पाना कोनी देय सकां। थै मात भासा राजस्थानी में‌ अ‍ेमअ‍े कर रैया हो। फिफ्टी परसेंट डिस्काउंट‌ में देय दैसूं, ठीक है फेर तो।’
‘पूरी बुक्स रो म्हे क्या करसां, कोर्स में जित्तो है बित्तो सोफिशिअ‍ेंट है… हरेक बुक हॉल-सेल में बैचणा चावो आप बट म्हांनैं रिटेल में चाइजै।’
दूजो आपरै मोबाइल कानी झांकतो कैयो, ‘बारह बुक्स मांय सूं म्हांनैं वन हंडरेड ट्वेंटी फोर पेज लेवणा है। प्रिंटेड रेट सूं केलकुलेशन‌ करियां पेजां री टोटल सेल वैल्यू थ्री हंडरेड सिक्टी रूपीज हुया है।’ ‘आपरा फोन पे नंबर बताओ अंकल। अमाउंट डिपोजित करवाय दूं।’
चितबगना हुयोड़ा गुप्ताजी म्हां कानी देख्यो, म्हे दूजै कानी नसड़ी कर लीवी।

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