राजन पारकर
महाराष्ट्र की राजनीति में इस समय तीन अलग-अलग घटनाएं दिखाई दे रही हैं, लेकिन इनके पीछे सत्ता के बदलते समीकरणों की एक साझा कहानी नजर आती है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात के बाद उनके केंद्र में जाने की पुरानी चर्चा फिर तेज हो गई। हालांकि, फडणवीस ने खुद साफ संकेत दिया कि उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी महाराष्ट्र ही है।
दिल्ली, कुर्सी और कयास!
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस दिल्ली क्या पहुंचे, राजनीतिक गलियारों में फिर कानाफूसी शुरू हो गई-‘क्या अब मुख्यमंत्री की मंजिल दिल्ली है?’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई और अटकलों को जैसे ऑक्सीजन मिल गई। लेकिन फडणवीस ने खुद ही इन चर्चाओं पर पानी डालते हुए साफ कहा-‘मैं महाराष्ट्र में ही हूं।’ अब सवाल यह है कि अगर मुख्यमंत्री को दिल्ली नहीं जाना, तो दिल्ली की राजनीतिक हवा बार-बार उनका नाम क्यों लेती है? राजनीति में कोई धुआं बिना आग के नहीं उठता, लेकिन कभी-कभी धुआं उठाने वाले भी बहुत होते हैं!
पुरानी फाइल फिर खुली!
कांग्रेस नेता हुसैन दलवई के एक दावे ने महाराष्ट्र की राजनीति में दूसरी खिड़की खोल दी है। चर्चा है कि एकनाथ शिंदे कभी कांग्रेस में जाने वाले थे। सच क्या है, यह शिंदे ही बेहतर बता सकते हैं। लेकिन राजनीति की सबसे दिलचस्प बात यही है कि कल जिस पार्टी में जाने की चर्चा थी, आज उसी नेता के हाथ में सत्ता की चाबी हो सकती है! महाराष्ट्र ने यह खेल कई बार देखा है। यहां विचारधारा से ज्यादा कभी-कभी राजनीतिक समय महत्वपूर्ण हो जाता है। कल का विरोधी आज का साथी और कल का साथी आज का विरोधा-यही तो महाराष्ट्र की राजनीति का नया व्याकरण है!
भाजपा की दिल्ली टीम में महाराष्ट्र!
इधर भाजपा की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में महाराष्ट्र के नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिली हैं। भारती पवार को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, विनोद तावड़े को राष्ट्रीय महामंत्री और पीयूष गोयल को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी बरकरार रखी गई है।
यानी दिल्ली ने महाराष्ट्र को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संगठन में भी जगह दी है। अब अंदर की बात यह है कि यह सिर्फ संगठनात्मक फेरबदल है या आने वाले चुनावी मौसम की तैयारी? क्योंकि भाजपा में संगठन की नियुक्ति केवल पद नहीं होती-कई बार वह भविष्य की राजनीति का संकेत भी होती है।
अब असली सवाल!
फडणवीस महाराष्ट्र में रहेंगे या दिल्ली जाएंगे? शिंदे की पुरानी राजनीतिक फाइल क्यों खुली?
भाजपा ने महाराष्ट्र के नेताओं पर भरोसा क्यों बढ़ाया?
और सबसे बड़ा सवाल-महाराष्ट्र की अगली बड़ी राजनीतिक चाल मुंबई में तय होगी या दिल्ली में?
सूत्रों के अनुसार, अभी बहुत कुछ पर्दे के पीछे है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि कुर्सियां भले अपनी जगह दिखाई दे रही हों, लेकिन कुर्सियों के पीछे बैठकर हिसाब-किताब करने वाले जरूर सक्रिय हैं। राजनीति में घोषणा बाद में होती है, चर्चा पहले शुरू होती है। दिल्ली की हवा बदली तो मुंबई की कुर्सियों पर उसका असर पड़ते देर नहीं लगेगी!
