मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव: अडानी को राहत की कीमत देश ने चुकाई!

दिल्ली लाइव: अडानी को राहत की कीमत देश ने चुकाई!

अरुण कुमार गुप्ता

अमेरिका की अदालत ने उद्योगपति गौतम अडानी के खिलाफ रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के मामले को खारिज कर दिया है। लेकिन ऐसा करते हुए जज ने हैरानी जताई और इसे अत्यधिक असामान्य बताया। असल में इस मामले की एजेंसियां सालों से जांच कर रही थीं, लेकिन अचानक अमेरिकी सरकार ने मामले को खत्म करने की पहल की, क्योंकि रिश्वत हिंदुस्थान में दी गई थी। लेकिन अडानी को मिली इस राहत की भारत में बहुत बड़ी कीमत चुकाई गई है। कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के हितों से समझौता किया। जिस अडानी को राहत मिली, अब आप कुछ बातों को समझिए कि अडानी को राहत वैâसे मिली। ऑपरेशन सिंदूर के समय आपको याद होगा कि जब पाकिस्तान की गर्दन हमारे जांबाज जवानों के हाथ में थी, तो एकदम से अमेरिका ने सीजफायर घोषित कर दिया। लेकिन मोदी जी अभी तक नहीं बता पाए कि हमारे बीच सीजफायर की घोषणा अमेरिका ने क्यों की थी। यह भी याद कीजिए कि कई बार ट्रंप ने सीजफायर का क्रेडिट लिया, लेकिन मोदी जी बिल्कुल चुप रहे। मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ एक ऐसी ट्रेड डील की है, जिसमें देश का सिर्फ नुकसान ही नुकसान है। किसानों का नुकसान है, कारोबारियों का नुकसान है, अर्थव्यवस्था का नुकसान है। ट्रेड डेफिसिट बढ़ेगा, यानी देश का चौथा नुकसान है और अमेरिका का फायदा ही फायदा है। यह भी याद कीजिए कि अमेरिका ने हिंदुस्थानियों को हाथ में हथकड़ी पहनाकर, पैरों में बेड़ियां डालकर, जहाज में भेड़-बकरियों की तरह भारत भेजा था, लेकिन मोदी जी चुप रहे। ट्रंप ने मोदी जी को बगल में बैठाकर ‘फ्रॉड’, ‘वर्स्ट’ और ‘एब्यूज’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था, लेकिन मोदी जी चुप रहे। आप सोचिए, इतने के बावजूद मोदी जी क्यों चुप रहे? अडानी को बचाने के लिए भारत के हितों को स्वाहा कर दिया गया है। अब देश ने अडानी को मिली राहत के बदले कितनी बड़ी कीमत चुकाई है, यह सवाल मोदी जी का पीछा नहीं छोड़ेगा।
सवालों से भागने वाला ५६ इंच वाला कैसे हो सकता है?
नरेंद्र मोदी और अमित शाह शायद भारत के इतिहास के पहले ऐसे प्रधानमंत्री और गृह मंत्री होंगे, जो संसद के मानसून सत्र के दौरान पूरी तरह गायब रहे। आखिरी दिन संसद आए तो लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने तुरंत संसद सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शायद सही कहा है कि ‘काहे के विश्व गुरु, काहे के ५६ इंच वाले?’ इनके तो झूठ और लफ्फाजी का गुब्बारा फट चुका है। ये लोग इतने डरपोक हैं कि विपक्ष कहीं छात्रों की आवाज को उठा न ले, इसलिए भागते फिर रहे हैं। याद कीजिए, पंडित जवाहरलाल नेहरू के नाम का जिक्र किए बिना इन लोगों का खाना नहीं हजम होता है। लेकिन वही पंडित जवाहरलाल नेहरू के शासन में जब भारत चीन से लड़ाई हार गया था, तब पंडित नेहरू अपना मुंह छुपाकर नहीं भागे थे। वे सदन पहुंचे थे और आलोचना झेली थी। मोदी जी, अटल बिहारी वाजपेयी को ये लोग अपना आदर्श मानते हैं। उन्हीं के शासन में गुजरात के दंगों पर जब वाजपेयी जी से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए आलोचना झेली थी। जिस डॉक्टर मनमोहन सिंह को ये लोग ‘मौन मोहन’ कहते थे, वही डॉक्टर मनमोहन सिंह २६/११ के बाद अपने घर में दुबककर नहीं बैठे थे। सीना चौड़ा करके सदन पहुंचे और अपनी उपलब्धियां दिखाते हुए आलोचना झेली और उसका जवाब दिया। लेकिन मोदी साहब विश्व गुरु का गुब्बारा बने हुए हैं, यशस्वी-तेजस्वी बने हुए हैं। जब छात्र जंतर-मंतर से संसद का घेराव करने पहुंचे तो ५६ इंच वाला संसद के पीछे वाले रास्ते से भाग निकला और चर्चा से भी भाग गया। अब बहुत जल्दी ही ये लोग झोला उठाकर भी भागने वाले हैं, क्योंकि जनता चुप रहने वाली नहीं है। जनता ने सवाल पूछना सीख लिया है। सवालों से भागने वाला ५६ इंच वाला कैसे हो सकता है, यह सोचने वाली बात है।

अन्य समाचार