मुख्यपृष्ठस्तंभक्या पीएम की सेहत पर उठते सवालों का जवाब देगा पीएमओ?

क्या पीएम की सेहत पर उठते सवालों का जवाब देगा पीएमओ?

-वरिष्ठ पत्रकार ने मोदी के व्यवहार पर उठाए सवाल

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वास्थ्य और हाल के सार्वजनिक व्यवहार को लेकर वरिष्ठ पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ ने एक ऐसा सवाल उठा दिया है, जिसे महज राजनीतिक आरोप कहकर खारिज कर देना शायद उतना आसान नहीं होगा, लेकिन उसे चिकित्सकीय तथ्य मान लेना भी उतना ही गलत होगा।
वशिष्ठ ने अपने ताजा वीडियो ‘ये बीमारी है, थकान या तकनीकी दिक्कत, बार-बार अजीब लक्षण क्यों दिख रहे मोदी की हरकतों में’ प्रधानमंत्री के अलग-अलग सार्वजनिक कार्यक्रमों और व्यवहार को आधार बनाते हुए सवाल किया है कि आखिर बार-बार दिखाई दे रही असामान्य स्थितियों की वजह क्या है? स्वयं वीडियो का शीर्षक भी किसी निश्चित बीमारी की घोषणा नहीं करता, बल्कि बीमारी, थकान और तकनीकी समस्या, तीनों संभावनाओं को प्रश्न के रूप में सामने रखता है।
वशिष्ठ का सवाल, सिर्फ उम्र और थकान या मामला कुछ और?
गिरिजेश वशिष्ठ का मूल तर्क प्रधानमंत्री के सार्वजनिक व्यवहार में दिखाई देने वाली कथित असामान्यताओं को एक साथ रखकर देखने का है। उनका सवाल है कि यदि किसी एक कार्यक्रम में कोई व्यक्ति थका हुआ दिखाई दे, किसी क्षण प्रतिक्रिया देने में देर हो या किसी तकनीकी व्यवस्था के कारण असहज स्थिति पैदा हो तो उसे सामान्य माना जा सकता है। लेकिन यदि ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आने लगें तो क्या उस पर सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए? यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। वशिष्ठ इन दृश्यों और व्यवहारों की राजनीतिक-पत्रकारीय व्याख्या कर रहे हैं; कोई सार्वजनिक चिकित्सकीय रिपोर्ट प्रधानमंत्री को किसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त घोषित नहीं करती।
गांधी को दुनिया ने फिल्म के बाद जाना?
प्रधानमंत्री के आलोचकों ने उनके उस बयान को भी बार-बार उदाहरण बनाया जिसमें उन्होंने महात्मा गांधी और रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी का जिक्र करते हुए सवाल उठाया था कि दुनिया गांधी को फिल्म बनने से पहले उस स्तर पर जानती थी या नहीं। आलोचकों ने इसे ऐतिहासिक रूप से विचित्र बयान बताया। इसी तरह प्रधानमंत्री द्वारा कुछ चुनावी भाषणों में कही गई बातों और बाद में उनके स्पष्टीकरणों के बीच विरोधाभास को भी उनके विरोधियों ने उनकी राजनीतिक शैली पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया। ‘द वायर’ के विश्लेषण ने इन दोनों उदाहरणों को मोदी के आलोचकों द्वारा उठाई जा रही चिंताओं में गिनाया था।
वशिष्ठ के विश्लेषण को केवल किसी एक क्लिप या बयान तक सीमित करके देखना मुश्किल है। उनके सवाल के पीछे एक व्यापक राजनीतिक मनोवैज्ञानिक तर्क दिखाई देता है, लंबे समय तक सत्ता के शीर्ष पर रहना, अत्यधिक व्यस्तता, लगातार यात्राएं, चुनाव अभियान, भाषणों का दबाव और उम्र क्या किसी नेता के व्यवहार या निर्णय लेने की शैली को प्रभावित कर सकते हैं? प्रधानमंत्री मोदी सितंबर २०२६ में ७६ वर्ष के होने वाले हैं। ऐसे में किसी भी लोकतंत्र में शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पारदर्शिता की मांग अपने आप में असामान्य नहीं कही जा सकती। लेकिन व्यक्ति की उम्र को बीमारी का प्रमाण मानना भी सही नहीं होगा।
‘डिसइनहिबिशन ऑफ पावर’ का सिद्धांत भी चर्चा में
प्रधानमंत्री के व्यवहार पर पहले लिखे गए एक विश्लेषण में मनोवैज्ञानिक जूली डायमंड के ‘डिसइनहिबिशन ऑफ पावर’ सिद्धांत का उल्लेख किया गया था। इसका मोटा आशय यह है कि अत्यधिक सत्ता और ऊंचा पद कभी-कभी व्यक्ति के आत्मविश्वास, जोखिम लेने की प्रवृत्ति, दूसरों की प्रतिक्रिया सुनने की क्षमता और स्वयं के आकलन को प्रभावित कर सकते हैं। यही वह बिंदु है, जहां मोदी के आलोचक कहते हैं कि लंबे समय तक लगभग निर्विवाद राजनीतिक प्रभुत्व, पार्टी के भीतर चुनौती का अभाव और व्यक्तित्व-केंद्रित राजनीतिक व्यवस्था किसी नेता को अपने निर्णयों के प्रति असाधारण रूप से आश्वस्त बना सकती है।
तो क्या मोदी मानसिक रूप से बीमार हैं?
इस सवाल का प्रमाणित उत्तर फिलहाल, नहीं दिया जा सकता। न प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से ऐसी किसी बीमारी की घोषणा हुई है, न कोई सार्वजनिक चिकित्सकीय रिपोर्ट मौजूद है और न कुछ सेकंड या मिनट के वीडियो देखकर मानसिक बीमारी का वैज्ञानिक निदान किया जा सकता है। इसलिए गिरिजेश वशिष्ठ के वीडियो को चिकित्सकीय रिपोर्ट नहीं, पत्रकार द्वारा उठाया गया गंभीर सार्वजनिक सवाल समझा जाना चाहिए।
वीडियो में दिखाई देने वाली किसी गतिविधि के पीछे थकान हो सकती है, नींद की कमी हो सकती है, उम्र से जुड़ी सामान्य प्रतिक्रिया हो सकती है, कैमरे का कोण हो सकता है, कार्यक्रम संचालन या टेलीप्रॉम्प्टर जैसी तकनीकी समस्या हो सकती है और स्वास्थ्य संबंधी कारण भी पूरी तरह असंभव नहीं कहे जा सकते। मगर इनमें से किस कारण को जिम्मेदार माना जाए, इसका पैâसला वीडियो देखकर नहीं किया जा सकता।
सवाल बीमारी का कम, पारदर्शिता का ज्यादा
असल प्रश्न शायद यह नहीं है कि विपक्ष य्ाा कोई पत्रकार प्रधानमंत्री को ‘मानसिक रूप से बीमार’ साबित कर सकता है या नहीं। सवाल यह है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के प्रधानमंत्री की नियमित स्वास्थ्य जानकारी जनता के सामने कितनी पारदर्शी होनी चाहिए?
अमेरिका सहित कई लोकतंत्रों में राष्ट्राध्यक्ष की मेडिकल जांच और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी समय-समय पर सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनती रही है। भारत में प्रधानमंत्री के स्वास्थ्य को लेकर ऐसी संस्थागत परंपरा बहुत सीमित है। इसीलिए वशिष्ठ द्वारा उठाया गया सवाल सियासी सनसनी से आगे जाकर जवाबदेही का सवाल भी बन सकता है।
अगर बार-बार वायरल हो रहे वीडियो केवल थकान, कैमरे के भ्रम या तकनीकी गड़बड़ी के नतीजे हैं तो उसका स्पष्टीकरण सारी अटकलों को खत्म कर सकता है। और यदि प्रधानमंत्री पूर्णत: स्वस्थ हैं तो नियमित आधिकारिक स्वास्थ्य बुलेटिन इस बहस को हमेशा के लिए विराम दे सकता है।
फिलहाल इतना ही तथ्यात्मक रूप से कहा जा सकता है कि गिरिजेश वशिष्ठ ने सवाल गंभीर उठाया है, लेकिन ‘मानसिक बीमारी’ का चिकित्सकीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया है। लिहाजा फैसला सोशल मीडिया की क्लिप नहीं, प्रमाणित चिकित्सा जानकारी ही कर सकती है।
‘मैं बायोलॉजिकल नहीं हूं’ वाले बयान से शुरू हुई बहस
मोदी के मानसिक संतुलन को लेकर सवाल पहली बार इस वीडियो से नहीं उठे हैं। वर्ष २०२४ के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री ने एक इंटरव्यू में अपने जीवन के संदर्भ में कहा था कि एक समय के बाद उन्हें ऐसा महसूस होने लगा कि उन्हें ईश्वर ने किसी उद्देश्य से भेजा है और उनकी ऊर्जा केवल जैविक शरीर से संभव नहीं है। इसी बयान के बाद प्रधानमंत्री के आलोचकों के बीच उनके मनोविज्ञान और सत्ता-बोध पर तीखी बहस शुरू हुई। ‘द वायर’ में प्रकाशित एक विश्लेषण ने भी इसी बयान के बाद मोदी के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चल रही चर्चाओं का उल्लेख किया था। यहां भी ध्यान देना जरूरी है कि धार्मिक या आध्यात्मिक भाषा में अपने जीवन के उद्देश्य का वर्णन अपने आप में मानसिक बीमारी का चिकित्सकीय प्रमाण नहीं है।

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