मुख्यपृष्ठस्तंभझांकी: बांग्लादेश से पिछड़ा देश तिरंगा: मजबूरी और मजबूती

झांकी: बांग्लादेश से पिछड़ा देश तिरंगा: मजबूरी और मजबूती

अजय भट्टाचार्य

राम और रावण के आराध्य एक ही थे, शिव। किंतु रावण की भक्ति में लोभ था अमर होने का, भय था मृत्यु से। राम की भक्ति में प्रेम था। राम ने कोई दिखावा नहीं किया, न जाकर कैलाश पर्वत उठाया। न कोई विशाल आयोजन किया। श्रद्धा से बालू के शिव को स्थापित कर दिया। देश के स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले फर्जी देशभक्तों की देशभक्ति जगती है और तिरंगा यात्रा के साथ सड़कों पर उतरती है। इनकी सभाओं में काला कपड़ा पहनकर आना मना है क्योंकि ये काले वस्त्र को बहिष्कार का प्रतीक मानते हैं। वैसे असली देशभक्तों के खिलाफ इन्होंने पहले से ही अपना विरोध प्रकट करने काली टोपी धारण करना शुरू कर दिया था। भाऊ ने भी भीड़ के साथ काली सदरी और टोपी धारण कर तिरंगा यात्रा निकाली। तिरंगा लेकर चलना इनकी मजबूरी है, काले कपड़ों में ये यही बताना चाहते हैं। सीधे कैसे बहिष्कार करें? रावण की मजबूरी शिव थे, राम की मजबूती शिव। तिरंगा उनकी मजबूरी है और हमारी मजबूती।
मान न मान, तू मेरा अध्यक्ष
मध्य प्रदेश के अलीराजपुर में भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक सूची जारी होते ही विवाद खड़ा हो गया। भाजपा द्वारा अनुसूचित जाति मोर्चा की नियुक्ति सूची में अलीराजपुर मंडल अध्यक्ष के रूप में प्रदीप गोजा और नानपुर ग्रामीण मंडल अध्यक्ष के रूप में सुजीत चौहान का नाम जारी किया गया था। लेकिन सूची में अपना नाम देखकर दोनों युवकों ने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि कांग्रेस के लोगों को जबरदस्ती भाजपा में शामिल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हम कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं और कांग्रेस के ही कार्यकर्ता रहेंगे। घोषणा करने से पहले हमसे नहीं पूछा गया। वहीं, भाजपा की तरफ से बताया गया कि दोनों पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता हैं और अक्सर भाजपा के कार्यक्रमों में शामिल होते रहते हैं।
भाड़े का हत्यारा
राहुल चौधरी तो शिव कुमार त्रिपाठी का हत्यारा है ही, पर सिर्फ भाड़े का। पर असल हत्यारे वे हैं, जिन्होंने हिंदू जगाने के लिए तलवारें बांटनी शुरू की थीं और अब भी बांट रहे हैं। लाठियां हों, चाकू तलवार या बंदूकें ‘उनको’ या किसी को ठीक करने के लिए बांटने लगेंगे तो आखिर में वे आपके गांव मुहल्ले में ही पहुंचेंगी। इस देश में सबसे ज्यादा हिंसक झगड़े पट्टीदारों (परिजनों) और पड़ोसियों में ही होते हैं- धार्मिक नहीं! पिछले १२-१३ सालों में जो बोया गया है वही फलीभूत हो रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

अन्य समाचार