धीरज फूलमती सिंह / मुंबई
बेटों ने हमेशा ही ताने सुने हैं, ‘बेटा तब तक बेटा होता है, जब तक उसकी शादी नहीं हो जाती, लेकिन बेटियां तो ताउम्र बेटी ही होती हैं।’
मुंबई के एक कपड़ा व्यवसायी थे। गरीबी से उठकर लाखों कमाए, मतलब जमीन से उठे हुए लखपति आदमी थे। उनकी तीन बेटियां थीं। शरीर से जरा कमजोर हुए और बुढ़ापे ने दस्तक दी तो बेटियों ने अपने लाडले माता-पिता को हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में भेजवा दिया।
लाखों की संपत्ति पर कब्जा जमाए बैठी बेटियां दिल की बड़ी नरम और बड़ी दयालु थीं। वैसे आम धारणा भी तो है कि महिलाएं बड़ी दयालु होती हैं। शायद ईश्वर प्रदत्त इस उदार गुण की वजह से बेटियां अपने लखपति पिता के वृद्धाश्रम के खर्च के लिए हर महीने आठ हजार रुपए भेज देती थीं। वैसे यह खर्च भी पिता की एफडी के ब्याज से आता था, जिसे वे स्वाभिमानी बेटियां छूती तक नहीं थीं। सीधे वृद्धाश्रम के खाते में ट्रांसफर करवा देती थीं।
महीने-दो महीने में अपने पिता का हालचाल ले लेती थीं, ताकि पता चल सके कि वे जिंदा हैं या नहीं। आखिर बेटियां अपने पिता से प्यार जो करती थीं!
पिता की मृत्यु से २० दिन पहले वृद्धाश्रम के संचालक ने फोन पर सूचित कर दिया था कि उनके पिता की हालत बहुत नाजुक है, लेकिन बेटियां अपने पिता को देखने नहीं गईं।
अब ४ अगस्त को वृद्धाश्रम में तीन-तीन बेटियों का सौभाग्यशाली पिता चल बसा, लेकिन काम के बोझ तले दबी बेटियों को अपने पिता के अंतिम संस्कार में जाने की फुर्सत भी नहीं मिली। मुंबई से सोनीपत दूर भी तो कितना है… पूरे १,५०० किलोमीटर!
काम के सिलसिले में एक बेटी नेपाल में थी, एक मुंबई में और एक उत्तर प्रदेश में। तीनों ने मिलकर वृद्धाश्रम के संचालक के खाते में पूरे ५,१०० रुपए जैसी बड़ी रकम जमा करवा दी और आदेश दिया कि अपने हिसाब से मृतक पिता का दाह संस्कार संपन्न करवा दिया जाए! अधिक कुछ हुआ तो समय निकालकर दाह-संस्कार की विधि वे वीडियो कॉल पर देख लेंगी। कामचोरी और काम से बचने के बहाने के लिए बदनाम महिलाओं के बीच मझली बिटिया तो एक मिसाल ही है। उसने वीडियो कॉल के दौरान अंतिम संस्कार कर रहे पंडित जी को लगभग घुड़कते हुए कह भी दिया-‘क्या पंडित जी, और कितना टाइम लगेगा? मुझे नहाना भी है।’ मझली बिटिया घुड़कती क्यों नहीं? उसे काम पर भी तो जाना था। पंडित जी खामखा देर किए जा रहे थे। बस, एक लाश ही तो जलानी थी।
