पहले तय हो कि दलबदल हुआ या नहीं, पार्टी छोड़ने के दिन से ही गद्दार अपात्र
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
शिवसेना से गद्दारी कर शिंदे गुट में शामिल हुए सभी विधायक दलबदल विरोधी कानून के तहत अपात्र ठहराए जा सकते हैं। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग ने इस मामले को उचित तरीके से नहीं सुना। विधायकों को अयोग्य ठहराने का अधिकार केवल विधानसभा अध्यक्ष के पास ही नहीं है, बल्कि कुछ परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट भी विधायकों को अयोग्य ठहरा सकता है। इसी संबंध में एक के बाद एक जबरदस्त उदाहरण देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने शिवसेना से गद्दारी करनेवाले विधायकों को अपात्र करने के लिए जोरदार दलील दी।
कामत ने दावा किया कि पहले यह तय किया जाना जरूरी है कि दलबदल हुआ है या नहीं। यदि विधायकों ने पार्टी छोड़ी है तो जिस दिन उन्होंने पार्टी छोड़ी, उसी दिन से उनकी अपात्रता प्रभावी मानी जा सकती है।
शिवसेना पार्टी और धनुष-बाण चुनाव चिह्न से संबंधित मामले में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष लगातार आठवें दिन सुनवाई हुई। इस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्ववाली शिवसेना की ओर से दलील पेश करते हुए विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग के पैâसलों में मौजूद खामियों की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया।
कामत ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष द्वारा विधायकों की अपात्रता पर पैâसला दिए जाने से पहले ही चुनाव आयोग ने विधायक बहुमत के आधार पर शिंदे गुट को पार्टी और चुनाव चिह्न दे दिया। यदि शिंदे और उनके साथ गए विधायकों ने पार्टी से दलबदल किया था तो उन्हें अयोग्य ठहराया जा सकता है। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग द्वारा दिया गया फैसला भी अपना आधार खो सकता है, क्योंकि उन्होंने अयोग्य होने के बावजूद पार्टी और चुनाव चिह्न का लाभ उठाया है।
‘राजेंद्र सिंह राणा’ मामले का दिया उदाहरण
देवदत्त कामत ने ऐतिहासिक ‘राजेंद्र सिंह राणा’ मामले का भी हवाला दिया। इस मामले में असाधारण परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने बागी विधायकों को उत्तर प्रदेश विधानसभा से सीधे अयोग्य ठहराया था।
इस मामले में अदालत ने कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष द्वारा दसवीं अनुसूची के महत्व को कमजोर करने की अनुमति न्यायालय नहीं दे सकता। असाधारण परिस्थितियों में, जब विधानसभा अध्यक्ष निर्णय लेने में विफल रहते हैं, तब सुप्रीम कोर्ट स्वयं प्रारंभिक स्तर पर अयोग्यता का पैâसला कर सकता है। राणा मामले में यह दलील दी गई थी कि दलबदल के आरोप वाले विधायक मंत्री बन गए थे। यदि वे दलबदल की तारीख से ही अपात्र हो गए थे तो वे बिना किसी वैध अधिकार के और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए अपने पद पर बने हुए थे। उस समय दलील दी गई कि विधानसभा का कार्यकाल समाप्ति की ओर है और संवैधानिक व्यवस्था तथा मूल्यों की रक्षा के लिए तत्काल निर्णय लेना आवश्यक है। न्यायालय को उस दलील में तथ्य नजर आया था। अंतत: इस मामले को विधानसभा अध्यक्ष के पास वापस भेजने के बजाय न्यायालय ने संबंधित सदस्यों को उसी तारीख से उत्तर प्रदेश विधानसभा से अयोग्य घोषित कर दिया।
नगरसेवकों की अपात्रता के पैâसलों का भी दिया संदर्भ
कामत ने अदालत का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया कि स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के नगरसेवकों के खिलाफ अपात्रता की कार्यवाही से जुड़े कुछ ऐसे पैâसले भी हैं, जिनमें सक्षम प्राधिकरण ने माना था कि अयोग्यता सिद्ध नहीं होती। लेकिन रिट अधिकार क्षेत्र में उच्च न्यायालयों ने संबंधित मानदंडों को लागू किया, अपात्र पाए जाने पर स्वयं ही सदस्यों को अयोग्य घोषित किया।
पीठ ने भी माना, हमें अयोग्य ठहराने का अधिकार है
दलील शुरू करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने सबसे पहले सुभाष देसाई मामले के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं का हवाला दिया। साथ ही विधायकों को अयोग्य ठहराने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिकार होने की बात कहते हुए इस संबंध में कुछ उदाहरण भी पीठ के सामने रखे। इसके बाद पीठ ने भी स्वीकार किया कि विधायकों की अयोग्यता के संबंध में हमारे पास अधिकार हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।
धनुष-बाण चुनाव चिह्न को फ्रीज करें
देवदत्त कामत ने कहा कि विधायक दल का राजनीतिक चुनाव चिह्न से कोई संबंध नहीं है। चुनाव चिह्न राजनीतिक पार्टी का होता है, लेकिन चुनाव आयोग ने विधायक दल के बहुमत को ध्यान में रखा। आयोग एक न्यायाधिकरण की तरह है, वह अंतिम न्याय देने वाली संस्था नहीं है।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर पांच में से तीन विधायक पार्टी से अलग हो जाएं तो क्या पार्टी उन्हें ही पार्टी मान लेगी? क्या राजनीतिक पार्टी की ओर ध्यान नहीं दिया जाएगा? इसी के साथ कामत ने धनुष-बाण चुनाव चिह्न को प्रâीज करने की मांग की।
पार्टी से अलग होना है तो अलग पार्टी बनाएं
कामत ने कहा कि अगर पार्टी से अलग ही होना है तो अलग पार्टी बनानी चािहए। हमने १९ लाख से अधिक हलफनामे जमा किए हैं, जबकि शिंदे गुट ने ४ लाख हलफनामे जमा किए हैं। २०१८ के पार्टी विधान को लेकर इससे पहले किसी ने कोई शिकायत नहीं की थी। इसी पार्टी विधान के अनुसार एकनाथ शिंदे की विभिन्न पदों पर नियुक्ति भी की गई थी।
