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एशिया के निवेशकों की नजर में भारत सबसे फिसड्डी! … बैंक ऑफ अमेरिका के सर्वे में इंडोनेशिया से भी पिछड़ा भारतीय शेयर बाजार

– ३२ प्रतिशत फंड मैनेजर भारत पर ‘अंडरवेट’, ताइवान और जापान बने पहली पसंद
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था होने के सरकारी दावों के बीच बैंक ऑफ अमेरिका के ताजा एशिया फंड मैनेजर सर्वे ने भारत के लिए असहज तस्वीर पेश की है। सर्वे के मुताबिक, भारतीय शेयर बाजार अब एशिया में फंड मैनेजरों का सबसे कम पसंदीदा बाजार बन गया है। अब तक इस सूची में इंडोनेशिया सबसे नीचे था, लेकिन अगस्त के सर्वे में भारत उससे भी पिछड़ गया।
बैंक ऑफ अमेरिका का यह सर्वे ७ से १३ अगस्त २०२६ के बीच किया गया। इसमें ९८ बड़े संस्थागत फंड मैनेजर और विश्लेषक शामिल हुए, जो कुल २७२ अरब डॉलर से ज्यादा की संपत्ति का प्रबंधन करते हैं। सर्वे में भारत को लेकर शुद्ध ‘अंडरवेट’ रुख बढ़कर ३२ प्रतिशत तक पहुंच गया। दूसरी ओर इंडोनेशिया के प्रति नकारात्मक रुख ३२ प्रतिशत से सुधरकर २७ प्रतिशत रह गया।
यानी वैश्विक निवेशकों के बीच फिलहाल स्थिति यह है कि वे इंडोनेशिया के मुकाबले भारत में कम पैसा लगाने को ज्यादा उचित समझ रहे हैं। इसके ठीक उलट ताइवान और जापान निवेशकों की पहली पसंद बने हुए हैं। सर्वे में ताइवान पर ५५ प्रतिशत और जापान पर ५० प्रतिशत शुद्ध ‘ओवरवेट’ रुख दर्ज किया गया। इसका मतलब है कि फंड मैनेजर इन बाजारों में अपने मानक आवंटन से ज्यादा निवेश करने को तैयार हैं।
भारत के प्रति निवेशकों की बेरुखी के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख भारतीय शेयर बाजार में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर हार्डवेयर से जुड़ी कंपनियों की सीमित मौजूदगी है। वैश्विक निवेश का बड़ा हिस्सा फिलहाल इन्हीं क्षेत्रों की ओर जा रहा है। ताइवान जैसे बाजार को इसका सीधा फायदा मिल रहा है। इसके अलावा भारतीय शेयरों के ऊंचे मूल्यांकन और कॉर्पोरेट आय की रफ्तार को लेकर भी फंड मैनेजरों में सतर्कता दिखाई दे रही है। भारत के शेयर बाजार ने इस वर्ष एशिया के कई प्रमुख बाजारों की तुलना में कमजोर प्रदर्शन किया है, जिससे विदेशी निवेशकों की धारणा और बिगड़ी है।

यह तस्वीर इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि बैंक ऑफ अमेरिका खुद भारत की दीर्घकालिक आर्थिक कहानी को सकारात्मक मानता रहा है। बैंक के एशिया-प्रशांत नेतृत्व ने जून में भारत को क्षेत्र का महत्वपूर्ण विकास इंजन बताते हुए घरेलू मांग, बुनियादी ढांचा निवेश और निजी पूंजीगत खर्च में सुधार का उल्लेख किया था। यानी समस्या भारत की पूरी अर्थव्यवस्था से भरोसा उठने की नहीं, बल्कि फिलहाल भारतीय शेयरों की कीमत, कमाई और भविष्य के निवेश विषयों को लेकर असंतोष की है। लेकिन सरकार के लिए संदेश फिर भी गंभीर है। केवल ऊंची सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि का दावा विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। निवेशक यह भी देख रहे हैं कि भविष्य की तकनीक कहां बन रही है, कंपनियों की कमाई कितनी तेजी से बढ़ रही है और शेयरों की कीमत उस कमाई के मुकाबले कितनी महंगी है।
बैंक ऑफ अमेरिका का यह सर्वे किसी देश की अर्थव्यवस्था की अंतिम रैंकिंग नहीं है, मगर निवेशकों की बदलती सोच का बड़ा संकेत जरूर है। और संकेत यह है,एशिया के निवेश नक्शे पर फिलहाल भारत का आकर्षण फीका पड़ा है, इतना कि कभी सबसे कम पसंद किया जाने वाला इंडोनेशिया भी उससे आगे निकल गया।

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