मुख्यपृष्ठस्तंभझांकी: ...तो ऐसा होता है!

झांकी: …तो ऐसा होता है!

अजय भट्टाचार्य

जब सक्षम होते हुए भी देश और जनता की आवाज नहीं सुनते, तो ऐसा ही होता है जैसा भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ हो रहा है। कल यानी २२ अगस्त को मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइसेंज का ८६वां दीक्षांत समारोह होना था। मुख्य न्यायाधीश को मुख्य अतिथि बनने का न्योता भी भेज दिया गया। लेकिन अचानक संस्थान ने भारत के सर्वोच्च न्यायाधीश की जगह टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के निदेशक डॉ. सीएस प्रमेश को मुख्य अतिथि बना लिया। टाटा इंस्टिट्यूट ने साफ किया कि इसलिए नहीं बुला रहे क्योंकि संस्थान का माहौल खराब हो सकता है। हमें विरोध और सुरक्षा की चिंता है। जंतर-मंतर के बाद देश बोल रहा है, जो पिछले १०-१२ सालों से चुप्पी साधे था।
रेस के घोड़े
गुजरात कांग्रेस के संदर्भ में राहुल गांधी ने कहा था कि केवल दिखावटी नेताओं के बजाय मेहनती `रेस के घोड़ों’ (दमदार नेताओं) का साथ दिया जाए, इससे पार्टी के अंदर की सारी बहसें खत्म नहीं हुई हैं। २०२७ की दौड़ तो शुरू हो गई है, लेकिन क्या कांग्रेस को अपने धावक मिल गए हैं? खासकर तब जब कांग्रेस के कुछ धड़े पार्टी के अंदर ही लड़ते दिख रहे हैं। उत्तर गुजरात के कुछ नेताओं ने दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मिलकर राज्य संगठन को लेकर अपनी चिंताएं जताई हैं। एक और गुट विधायी मोर्चे पर नाखुश बताया जा रहा है; कांग्रेस विधायक दल के नेता डॉ. तुषार चौधरी से नाराज पार्टी के कुछ लोग इस भूमिका के लिए आदिवासी नेता अनंत पटेल या आक्रामक तेवर वाले जिग्नेश मेवाणी के पक्ष में हैं। स्थानीय निकाय चुनावों में मिली करारी हार के बाद संगठन में कोई बड़ा बदलाव न होने पर भी सवाल उठ रहे हैं।
चुनावी फंड घोटाला
केरल भाजपा में कथित चुनावी फंड घोटाले पर नाराजगी जाहिर करते हुए राजग की सहयोगी पार्टी केरल कामराज कांग्रेस प्रमुख विष्णुपुरम चंद्रशेखरन ने मांग की है कि अगर दोषी पाए जाएं तो भाजपा अपने सदस्यों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। उन्होंने दावा किया कि छह सहयोगी पार्टियों द्वारा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर को पत्र लिखकर राजग की बैठक बुलाने और इन मुद्दों पर चर्चा करने का आग्रह किए हुए एक महीना बीत चुका है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि, फंड के आरोप सिर्फ भाजपा के भीतर ही लगे हैं, लेकिन इससे हमारी विश्वसनीयता पर भी असर पड़ रहा है। यह पत्र १६ जुलाई को भेजा गया था, जो धोखाधड़ी के आरोप सामने आने के एक हफ्ते बाद की बात है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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